दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)। बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना के विरोध में रविवार को दो जिलों दंतेवाड़ा और बीजापुर ज़िले की सरहद पर बसे हिताल कुड़ुम गांव में 1000 से भी अधिक ग्रामीण एकत्र हुए। डुबान क्षेत्र की 18 पंचायतों के 56 गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने परियोजना का विरोध करते हुए कहा कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। परिचर्चा के दौरान ग्रामीण अपने पारंपरिक देवी-देवताओं के साथ पहुंचे और परियोजना के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन किया।
इस दौरान ग्रामीणों ने भावुक स्वर में कहा, “जान दे देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे। यदि सरकार परियोजना लागू करना चाहती है तो पहले डुबान क्षेत्र के सभी ग्रामीणों को एक साथ खड़ा कर गोली मार दे।” उल्लेखनीय है कि इस परियोजना को चालू करने के लिए बीते कई दशकों से कांग्रेस और बीजेपी दोनों राजनीतिक दलों ने जब – जब सत्ता हासिल की तब – तब इस परियोजना को चालू करने का प्रस्ताव रखा लेकिन कभी भी सफ़ल नहीं हो पाए।
इससे पूर्व सन 1979 से केंद्र ने इस परियोजना की नींव रखी थी और 80 के दशक में इस परियोजना का खूब विरोध चला और पर्यावरण स्वीकृति नहीं मिलने के कारण अधूरी ही रही। अब फिर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की बीजेपी सरकार ने इसको चालू करने का प्रस्ताव केंद्र के सामने रखा है और धरातल पर लाना चाह रही है। लेकिन इस परियोजना को लेकर प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों में विरोध के स्वर तेज़ हो गए है।
इसी के विरोध में रविवार को प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों ने बैठक रखा था और बैठक के अंत में महामहिम राष्ट्रपति के नाम से तहसीलदार को ज्ञापन भी सौंपा गया है। ग्रामीणों के तरफ़ से दिये गये ज्ञापन में ग्रामीणों ने लिखा है कि –
“यह परियोजना इन्द्रावती नदी पर दंतेवाड़ा में प्रस्तावित है, जिसमें 300 मेगावाट बिजली उत्पादन और दंतेवाड़ा , सुकमा , बीजापुर जिलों में सिंचाई का पानी पहुँचाने का दावा किया जा रहा है। इसकी अनुमानित लागत 49 हजार करोड़ रुपये है। 1980 के दशक में ग्रामीणों द्वारा इस परियोजना का पुरजोर विरोध किया गया था, जिसके कारण इसे रोक दिया गया था। लोग इस परियोजना के प्रस्तावित होने के बाद से पिछले 50 वर्षों से इसका विरोध कर रहे हैं।
हाल ही में इसकी पुनरारंभ की खबर आई और लोगों ने अपना असंतोष व्यक्त किया। इतने विरोध के बाद भी ग्रामीणों से बात करने का कोई प्रयास क्यों नहीं किया जाता? अब बिना किसी गाँव या प्रभावित व्यक्ति से बात किए आदिवासी क्षेत्र की ग्रामसभा की अनुमति के बगैर, केन्द्र सरकार द्वारा इसे पुनः अनुमति क्यों दी गई है? स्पष्ट है कि यह परियोजना बस्तर के आदिवासियों के लिए नहीं बल्कि औद्योगिक घरानों के लिए बनाई जा रही है”
परियोजना के तहत पीने के पानी के लिए मात्र 30,000 मिलियन लीटर पानी उपलब्ध होगा, जबकि औद्योगिक उपयोग के लिए 500,000 मिलियन लीटर (15 गुणा अधिक) पानी आरक्षित है। इसमें 18 ग्राम पंचायत के 56 गाँवों के उजड़ने की संभावना है, तथा अन्य गाँव भी प्रभावित होगा। इस प्रकार का ज्ञापन बनाकर ग्रामीणों ने राष्ट्पति के नाम से तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा है।
बीते दिनों दंतेवाड़ा जिलें के चेरपाल में सुशासन तिहार के शिविर में पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी बोधघाट परियोजना को लेकर कहा था कि –
“बहुत पुराने समय से इसकी परिकल्पना की गई है। लेकिन अब उससे कई फायदा भी होगा लगभग 7 लाख हेक्टेयर में सिंचाई होगी, 200 मेगावाट में बिजली उत्पादन होगी और 4 हज़ार टन से भी ज्यादा मत्स्य पालन भी होगा। लेकिन हम पहले वहां के लोगों से बात करेंगे और उनका पुनर्स्थापन करेंगे उसके बाद ही अगला कदम उठाएंगे।”
इसके बाद से प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीण दहशत में है।
आंदोलन को समर्थन देने कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी के साथ कांग्रेस के चार पूर्व विधायक रेखचंद जैन, राजमन बेंजाम, देवती कर्मा, चंदन कश्यप, एवं कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी कार्यक्रम में शामिल हुए। नेताओं ने ग्रामीणों की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि प्रभावित लोगों की सहमति के बिना परियोजना लागू नहीं की जानी चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना के लागू होने से 18 पंचायतों के 56 गांव डुबान क्षेत्र में आ जाएंगे तथा लगभग 16 हजार हेक्टेयर जंगल प्रभावित होगा। इससे हजारों ग्रामीणों के विस्थापन और उनकी आजीविका पर संकट खड़ा हो जाएगा।
गौरतलब है कि इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बोधघाट जल विद्युत परियोजना वर्ष 1979 से विभिन्न कारणों से लंबित है। पिछले चार दशकों से राज्य और केंद्र सरकार समय-समय पर इस परियोजना को आगे बढ़ाने का प्रयास करती रही हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर लगातार विरोध के कारण मामला विवादों में बना हुआ है। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाने का हर स्तर पर विरोध किया जाएगा।
परिचर्चा के दौरान बोधघाट संघर्ष समिति के अध्यक्ष शिव कुमार मंडावी ने कहा कि प्रस्तावित बोधघाट परियोजना से 18 पंचायतों के 56 गांव प्रभावित होंगे। उनका कहना है कि यह केवल कुछ गांवों का नहीं, बल्कि पूरे बस्तर के अस्तित्व और संस्कृति का सवाल है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि यह परियोजना लागू हुई तो बस्तर का बड़ा हिस्सा विनाश की चपेट में आ जाएगा, इसलिए स्थानीय ग्रामीण लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे को लेकर रायपुर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से भी मिला था। उनके अनुसार मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया था कि इस विषय पर प्रभावित ग्रामीणों से कई दौर की चर्चा की जाएगी और उनकी सहमति के बिना परियोजना आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। मंडावी ने कहा कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है, बल्कि सरकार को परियोजना पर रोक संबंधी लिखित आश्वासन देना चाहिए।
शिव कुमार मंडावी ने कहा कि सरकार यदि विस्थापन का विकल्प भी दे, तब भी यह स्वीकार्य नहीं होगा। उनका कहना है कि गांव केवल रहने की जगह नहीं हैं, बल्कि उनके पूर्वजों, देवी-देवताओं, पेन-पुरखों और आस्था के केंद्र जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक स्थलों से जुड़े हुए हैं। इन सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों को किसी दूसरे स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता। उन्होंने कहा कि दूसरे गांव में बसने की स्थिति में उनकी परंपराएं और पहचान प्रभावित होगी तथा उन्हें पराधीन जीवन जीना पड़ेगा।
बीजापुर ज़िले के कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी ने कहा अगर बोधघाट परियोजना फिर से चालू होती है तो 56 गांवों के लगभग 45 से 50 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। इस परियोजना को बंद करना चाहिए, बोधघाट परियोजना को बंद करने के लिए मैं यहां समर्थन देने आया हूं और मेरे साथ बस्तर संभाग के चार विधानसभाओं के पूर्व कांग्रेस विधायक भी समर्थन में पहुंचे हैं। साथ बस्तर संभाग के सभी पूर्व विधायकों और वर्तमान के विधायकों का भी समर्थन है।
उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार एक और विकास की बात करती है तो दूसरी ओर विकास के नाम पर विनाश भी कर रही है। बोधघाट परियोजना को सरकार तत्काल बंद करे आदिवासियों और यहां के ग्रामीणों के मांग पर इस परियोजना को बंद करे अगर यह चालू करने की स्थिति में तो तुरंत बंद करे यह मांग हम कर रहे है।अगर यह परियोजना को सरकार बंद नहीं करती है तो आने वाले समय में हम यहां के ग्रामीणों के साथ मिलकर बोधघाट परियोजना के विरोध में एक बड़ी जन आंदोलन करेंगे।
(दंतेवाड़ा से स्वतंत्र पत्रकार रिकेश्वर राना की रिपोर्ट)