Wednesday, October 20, 2021

Add News

टूट की डगर पर सपा!

Janchowkhttps://janchowk.com/
Janchowk Official Journalists in Delhi

ज़रूर पढ़े

प्रदीप सिंह

लखनऊ/ नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी पर पारिवारिक कलह भारी पड़ती दिख रही है। कुछ महीने पहले सैफई कुनबे में शुरू हुई कलह की कीमत पार्टी को विधानसभा चुनाव में चुकानी पड़ी। सपा को मिली करारी शिकस्त के बाद यह चर्चा आम हुई कि शायद अब झगड़ा समाप्त हो जाएगा। और सत्ता जाने के बाद सत्ता में हिस्सेदारी मांगने वाले शांत बैठ जाएंगे।

सपा में मची घमासान फौरी तौर पर भले ही शांत दिख रही हो लेकिन पर्दे के पीछे खेल जारी है। सभी गुट अपने-अपने एजेंडे के साथ हर दांव पेच आजमा रहे हैं। जिससे विधानसभा चुनाव के पूर्व की घटना मात्र एक अध्याय साबित हुई है। ताजा घटनाक्रम ये संकेत देते हैं कि अब समाजवादी पार्टी विघटन के कगार पर पहुंच गयी है। दोनों गुट इसकी तैयारी में लगे हैं।

समीक्षा बैठक में उठे सवाल

विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव ने हार के कारणों को जानने के लिए एक समीक्षा बैठक बुलाने की घोषणा की। उसके दो दिन बाद मुलायम सिंह यादव ने समीक्षा बैठक करने का ऐलान कर दिया। हालांकि दबाव पड़ने पर मुलायम सिंह यादव ने अपनी समीक्षा बैठक रद्द कर दी।

पार्टी की समीक्षा में अखिलेश यादव इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विधानसभा चुनाव हारने की वजह पारिवारिक कलह है जिसका विपक्षी पार्टियों ने लाभ उठाया।

इसके पहले मुलायम सिंह की छोटी बहू अपर्णा यादव ने बयान देकर सुर्खियां बटोरीं थीं। उन्होंने कहा था कि भाजपा ने नहीं अपनों ने हराया है।

जबकि शिवपाल यादव ने कहा कि ये सपा की नहीं बल्कि अखिलेश के घमंड की हार है।

मुलायम सिंह यादव ने अमित शाह के बयान का हवाला देते हुए कहा कि आज विपक्षी यह कह रहे हैं कि जो अपने बाप का नहीं हुआ वह दूसरों का क्या होगा। अखिलेश के कर्मों ने दूसरों को ऐसा कहने का अवसर दिया।

ऐसे बयानों से यह साफ जाहिर होता है कि अभी भी सपा में आपसी जंग थमी नहीं है। एक दूसरे पर हार का तोहमत लगाने का खेल जारी है। दोनों पक्षों में अविश्वास चरम पर है।

दो खेमे में बंटी समाजवादी पार्टी

मोटे तौर पर समाजवादी पार्टी में दो खेमा आमने-सामने है। एक अखिलेश यादव का है जिसमें पार्टी और परिवार के ज्यादातर सदस्य शामिल हैं। मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और पार्टी महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव, सांसद धर्मेन्द्र यादव और तेजप्रताप यादव अखिलेश के साथ लामबंद हैं। संगठन पर भी इसी गुट का नियंत्रण है और प्रदेश में राजनीतिक रूप से भी यह गुट प्रभावी है। सपा के अधिकांश नेता भी अखिलेश यादव के साथ हैं। ऐसे में हार के बाद भी अखिलेश यादव का पलड़ा भारी है।

दूसरा खेमा शिवपाल यादव का है जिसमें शिवपाल और साधना परिवार के अलावा कुछ समर्थक शामिल हैं। शिवपाल समर्थकों का मानना है कि संगठन निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिसको अखिलेश नजरंदाज कर रहे हैं।

इस खेमे की खूबी और खामी एक है। एकमात्र मुलायम सिंह यादव ही उनकी पूंजी हैं। शिवपाल को यह भ्रम है कि वे मुलायम सिंह यादव के लक्ष्मण और हनुमान हैं।

इस भ्रम को बनाये रखने में मुलायम सिंह का महत्वपूर्ण योगदान है। वक्त बेवक्त वे शिवपाल को आशीर्वाद देते रहते हैं। मुलायम के आशीर्वाद का घोड़ा जैसे ही राजनीति के रास्ते पर दौड़ लगाता है मुलायम घोड़े की लगाम अखिलेश को पकड़ा देते हैं।

अभी तक चले शह मात के खेल का कुल परिणाम यही है कि मुलायम की पैंतरेबाजी से सपा बंटने से बची रही। लेकिन अब जंग खुलकर लड़ी जा रही है।

मुलायम की दोहरी भूमिका

इस कलह में सबसे विचित्र स्थिति मुलायम सिंह यादव की है। साधना यादव मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी हैं। इस समय मुलायम अपनी इसी पत्नी के परिवार के साथ रह रहे हैं। ऐसे में स्वभाविक है कि उन पर उसका ज्यादा प्रभाव रहेगा। लेकिन इस कारण वे अखिलेश यादव को सार्वजनिक रूप से डांट तो सकते हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं करना चाहते कि जिससे समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव का राजनीतिक नुकसान हो।

साधना और समाजवादी पार्टी

साधना गुप्ता के मुलायम परिवार में शामिल होने के बाद से ही सैफई परिवार के फौलादी दीवार में दरार देखी जाने लगी। साधना ने धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी के अंदर अपना एक सिंडीकेट तैयार किया जिसके नेता शिवपाल यादव हैं। शिवपाल के माध्यम से साधना अपने आर्थिक साम्राज्य का विस्तार करती रहीं। इसका दूसरा चरण राजनीतिक विस्तार था। जिसमें वे अपने बेटे प्रतीक और बहू को राजनीति में स्थापित करना चाहती हैं।

अखिलेश खेमा उनके आर्थिक हितों को पूरा करने में मदद करता रहा। लेकिन राजनीतिक मंसूबों के सामने आने पर सतर्क हो गया। साधना गुप्ता के अंदरखाने इस कदम को अखिलेश ने परिवार के अंदर प्रतिद्वंदी तैयार करना माना। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अखिलेश ने शिवपाल और साधना खेमे के पर कतरने शुरू कर दिए। जिससे पार्टी और परिवार में तकरार शुरू हो गई जो थमने का नाम नहीं ले रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि साधना के इस खेल में शिवपाल मात्र मोहरा बन कर रह गए हैं। जिससे उनका राजनीतिक भविष्य डांवाडोल हो गया है।

शिवपाल खेमे की भावी रणनीति

शिवपाल यादव अब समाजवादी पार्टी में अपनी स्थिति को समझ चुके हैं। ऐसे में वे अपनी भावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। इटावा से लेकर मथुरा तक में वे रह-रह कर अपने बयानों से अपना दर्द जताते रहते हैं।

इटावा में 11 मार्च के बाद अलग पार्टी बनाने की घोषणा तो मथुरा में एक कार्यक्रम के दौरान अपने समर्थकों से श्रीकृष्ण योगपीठ बनाने का आहवान किया।

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपर्णा उनसे तीन बार मिल चुकी हैं। शिवपाल अपने पुत्र आदित्य यादव के साथ योगी आदित्यनाथ से मिलने गए। इससे सपा की राजनीति में उबाल आ गया है।

सपा के कुछ नेताओं ने शिवपाल यादव पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मांग तक कर डाली। प्रदेश की राजनीति में यह चर्चा है कि परिवार में न खत्म होने वाले झगड़े के बीच शिवपाल अपने और बेटे आदित्य के लिए कुछ नई सियासी संभावनाएं तलाश रहे हैं।

प्रतीक और अपर्णा भी अपनी राजनीतिक संभावनाओं की खोज के साथ आर्थिक साम्राज्य बचाने के लिए सक्रिय हैं। एक चर्चा यह भी है कि अपर्णा यादव अपने सियासी वजूद को बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।

ऐसे में प्रदेश में यह चर्चा आम है कि अपर्णा यादव मेनका गांधी की राह पर हैं।

शिवपाल यादव और अपर्णा यादव के भाजपा में भी शामिल होने की अटकलें लगायी जा रही हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा 2019 आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए शिवपाल यादव और अपर्णा पर दांव लगाने पर विचार कर सकती है ?

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

हिरासत में ली गयीं प्रियंका गांधी, हिरासत में मृत सफाईकर्मी को देखने जा रही थीं आगरा

आगरा में पुलिस हिरासत में मारे गये अरुण वाल्मीकि के परिजनों से मिलने जा रही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -