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ज्ञानवापी भी अब बाबरी के रास्ते! जज आशुतोष तिवारी ने तबादले से एक दिन पहले दिया ASI सर्वेक्षण का आदेश

9 नवंबर, 2019 को बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर राम मंदिर बनाये जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद लगा इस देश में मंदिर-मस्जिद का झगड़ा अब खत्म हो गया। कम से कम प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के रहते तो ऐसा मानने का कारण भी था। क्योंकि ये एक्ट कहता है कि 15 अगस्त, 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था और जिस समुदाय का था, भविष्य में भी उसी का रहेगा। अयोध्या का मामला अपवाद (चूंकि हाई कोर्ट में था, इसलिए उसे इस क़ानून से अलग रखा गया) था।

लेकिन वाराणसी की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने कल 8 अप्रैल गुरुवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वेक्षण की अनुमति दे दी है। साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वेक्षण की लागत वहन करने का निर्देश दिया। अब अयोध्या की तरह ज्ञानवापी मस्जिद की भी खुदाई कर ASI मंदिर पक्ष के दावे की प्रामाणिकता को परखेगी। गौरतलब है कि इसी तरह की प्रक्रिया अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का निपटारा करने के लिए अमल में लाई गई थी। ASI की रिपोर्ट के आधार पर ही कोर्ट ने विवादित जगह पर मंदिर होने को मान्यता दी थी। एएसआई रिपोर्ट के आधार पर ही 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि विवादित जगह पर राम मंदिर बनना चाहिए। और मस्जिद के लिए दूसरी जगह पर ज़मीन दी जाये।

जिला अदालत का ये आदेश सर्वेक्षण की मांग को लेकर हरिहर पांडे की याचिका और वकील विजय रस्तोगी की पैरवी पर आया है। उन्होंने मांग की थी कि ज्ञानवापी मस्जिद में प्रवेश करने वाली भूमि हिंदुओं के हवाले की जाए। उन्होंने दावा किया कि 1664 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने 2000 वर्षीय काशी विश्वनाथ मंदिर के एक हिस्से को मस्जिद बनाने के लिए नीचे खींचा था। रस्तोगी ने दिसंबर 2019 में स्वंयभू ज्योतिर्लिंग भगवान विशेश्वर की ओर से दीवानी अदालत में मस्जिद परिसर के सर्वेक्षण का अनुरोध करते हुए एक आवेदन दायर किया था।

बता दें कि ज्ञानवापी परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण की याचिका पर सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट में 2 अप्रैल को बहस पूरी हुई थी। कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति ने याचिका का विरोध किया था। इसके विरोध में अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतेज़ामिया कमेटी ने तर्क दिया था कि याचिका धार्मिक पूजा अधिनियम 1991 की जगहों के तहत बनाए रखने योग्य नहीं है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के पक्षकार और वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने बताया कि वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज आशुतोष तिवारी की अदालत में 2019 में मंदिर पक्ष की ओर से प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया था और यह निवेदन भी किया गया था कि पूरे ज्ञानवापी परिसर में पुरातन विश्वनाथ मंदिर मौजूद था और उसे 1669 में गिराकर एक विवादित ढांचा तैयार कर दिया गया था और पुरातन मंदिर के उस परिसर में सारे अवशेष यथा स्थान मौजूद हैं। साथ ही यह भी कहा गया था कि इस ढांचे के नीचे स्वयंभू विशेश्वर का 100 फीट का ज्योर्तिलिंग भी है और उसे पत्थर के पटिये से ढक दिया गया है।

रस्तोगी ने फास्ट ट्रैक कोर्ट से कहा कि पुरातत्व विभाग इसका सर्वे करके उत्खनन करके यथा स्थान पर प्रकट करे और उसके बारे में जो कुछ भी पुरातात्विक साक्ष्य है वह न्यायालय में प्रस्तुत करे। इस पर हुई बहस के बाद न्यायालय ने मंदिर पक्ष के पुरातात्विक सर्वेक्षण के प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और यूपी सरकार को निर्देशित किया है कि वे अपने खर्चे से पुरातात्विक सर्वेक्षण करके आख्या न्यायालय में प्रस्तुत करे कि इस विवादित ढांचे के पूर्व पहले कभी कोई मंदिर का अवशेष था कि नहीं?

वकील रस्तोगी ने बताया कि यह हिंदू पक्ष के लिए बहुत बड़ी जीत है क्योंकि सारा मुद्दा इसी पर निर्भर करता था क्योंकि मुस्लिम पक्ष का दावा था कि ग्राउंड पर हमेशा से ही मस्जिद चली आ रही है, जबकि हिंदू पक्ष का दावा था कि मंदिर तोड़कर मस्जिद उस स्थान पर बनी है। अगर यह साक्ष्य आ जाएगा कि मंदिर के अवशेष वहां थे और हैं अगर उसे तोड़कर यह ढांचा बनाया गया है तो वादी के पक्ष में फैसला आने में देर नहीं लगेगी। सर्वेक्षण रिपोर्ट आने के बाद वादी पक्ष की ओर साक्ष्य दिए जाएंगे।

वहीं इस मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ के वकील मोहम्मद तैहीद खान ने मीडिया को बताया है कि विश्वनाथ मंदिर की ओर से पुरातात्विक सर्वे का आदेश कोर्ट ने पारित कर दिया है। जजमेंट की कॉपी मिलने के बाद और स्टडी करने के बाद ही रिवीजन करना है कि रिट करना है यह तय होगा। उन्होंने बताया कि इस स्टेज पर साक्ष्य जुटाने के लिए सर्वे नहीं कराना चाहिए था, लेकिन कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए आगे का लीगल एक्शन लिया जाएगा।

संबंधित सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट आशुतोष तिवारी का ट्रांसफर ऑर्डर वाराणसी से शाहजहांपुर आ चुका है। उन्हें 9 अप्रैल को अपना चार्ज हैंडओवर करना है। हैंडओवर देने से पहले जज आशुतोष तिवारी ने इस मामले पर अपना फैसला सुना दिया है।

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This post was last modified on April 9, 2021 8:48 pm

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