हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लाया गया यह विधेयक अदालत में नहीं टिक पाएगा: चिदंबरम

नई दिल्ली। (नागरिकता संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान आज कांग्रेस की तरफ से मोर्चा वरिष्ठ नेताओं ने संभाला। इसमें पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने का भाषण बेहद उम्दा था। पेश है उनका पूरा भाषण-संपादक)

पी चिदंबरम ने कहा कि हम लोगों के पास एक नागरिकता कानून है जिसके तहत छह तरीके से किसी को नागरिकता दी सकती है। जिसमें जन्म से नागरिकता, खानदान के आधार पर नागरिकता, रजिस्ट्रेशन के जरिये नागरिकता, प्राकृतिक तरीके से नागरिकता और भौगोलिक क्षेत्रों के मिलाए जाने के बाद दी जाने वाली नागरिकता शामिल है। उन्होंने कहा कि ये सार्वभौमिक सिद्धांत हैं। अब सरकार इसमें एक नयी श्रेणी शामिल कर रही जिसमें उसने सत्ता द्वारा उत्पीड़ित और भय के सताए लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान बनाया है।

और अब सरकार संसद से एक ऐसे विधेयक को समर्थन देने की मांग कर रही है जो पूरी तरह से असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि हम जनता  द्वारा चुने लोग हैं। संविधान खुद हमसे किसी विधेयक की संवैधानिकता के बारे में पूछता है। क्योंकि हमारी उसी चीज को पास करने की जिम्मेदारी है जो संवैधानिक हो। हम में से सब लोग वकील नहीं हैं और सभी को वकील होना भी नहीं चाहिए। हममें सभी क्षेत्रों से जुड़े लोग होने चाहिए। और जब हर क्षेत्र के लोग होते हैं तो हमारे पास यह परखने का एक सामूहिक विवेक और चेतना होती है कि यह संवैधानिक है भी या नहीं।

उन्होंने कहा कि हम इस सदन में क्या कर रहे हैं? या दूसरे सदन में जो किया और अब यहां कर रहे हैं। वह यह कि अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी से बच रहे हैं और उसे तीन दूसरी संस्थाओं के हवाले कर दे रहे हैं। हम जो यहां कर रहे हैं वह यह कि इस मुद्दे को जजों की गोदी में सौंप दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि क्या यह चीज यहीं रुक जाएगी? बिल्कुल नहीं। यह निश्चित रूप से जजों के पास जाएगी। और यह बात सही है कि जज लोग सम्माननीय हैं लेकिन वे चुने गए लोग नहीं हैं। और फिर गैर चुने हुए जज और गैर चुने गए वकील आखिरी तौर पर इस बात का फैसला करेंगे कि जो हम कर रहे हैं वह संवैधानिक है या नहीं? यह संसद के गाल पर तमाचा होगा। उन्होंने कहा कि सांसदों से असंवैधानिक चीज को पारित करने के लिए कहा जाएगा और उसके बाद बेबी को न्यायपालिका के पास भेज दिया जाएगा और उसके बाद जज और वकील तय करेंगे कि आप ने जो किया है वह संवैधानिक है भी या नहीं।

यह जानते हुए कि यह विधेयक असंवैधानिक है सरकार इसको सिर्फ इसलिए ले आयी है जिससे हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके। यह बेहद दुखद दिन है। अच्छी बात यह है कि आप संविधान में संशोधन नहीं कर रहे हैं और केवल एक कानून बना रहे हैं। और मुझे इस बत का पूरा भरोसा है और मेरे दिमाग में भी बिल्कुल साफ है कि ये कानून गिर जाएगा।

मेरे पास कुछ सवाल हैं और मैं यह जानना चाहता हूं कि सरकार में कौन ऐसा है जिसने इनका जवाब हासिल किया। क्या कानून विभाग ने इसका जवाब दिया है? तो कृपया गृहमंत्री से कहिए कि कानून मंत्रालय के विचार सदन के पटल पर रखें। और अगर गृहमंत्रालय ने खुद इन सवालों के उत्तर ढूंढ लिए तो कृपया उसके नोट सदन के पटल पर रखें जिसे सचिव ने गृहमंत्री के सामने पेश किया था। उन्होंने कहा कि अगर एटार्नी जनरल से संपर्क किया गया था तो संविधान में एटार्नी जनरल को बुलाए जाने का प्रावधान है, लिहाजा उन्हें सदन में बुलाइये और उनसे इसका उत्तर देने के लिए कहिए। हम उनसे इन सवालों को पूछेंगे। लेकिन किसी को इन सवालों के उत्तर देने की जिम्मेदारी लेनी होगी। ये सवाल सबको पता हैं मैं उनको बहुत तेजी से पढ़ दे रहा हूं।

नंबर-1, आप किस आधार पर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक ग्रुप में बना सकते हैं और दूसरे पड़ोसियों को छोड़ देंगे।

नंबर-2, आप कैसे केवल छह धार्मिक समूहों को चिन्हित कर सकते हैं हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी और दूसरे जैसे अहमदिया, हजारा और रोहिंग्या को छोड़ सकते हैं।

नंबर-3, अब्राहम धर्म केवल तीन हैं। ईसाई, यहूदी और इस्लाम। आप क्यों केवल ईसाई को शामिल किए और बाकी दो को छोड़ दिए।

नंबर-4, आपने क्यों श्रीलंका के हिंदू और भूटान के ईसाइयों को छोड़ दिया। शामिल करने और बाहर करने के तरीकों को केवल देखिए। श्रीलंका को बाहर कर दिया गया है लेकिन हिंदुओं को शामिल कर लिया गया है। भूटान को बाहर कर दिया गया है लेकिन ईसाइयों को शामिल किया गया है। श्रीलंकाई हिंदुओं को बाहर किया गया है और भूटान के ईसाइयों को भी बाहर किया गया है। शामिल करने और बाहर करने में न कोई कामन सेंस है और न ही उसके पीछे कोई तर्क।

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नंबर-5, क्यों केवल धार्मिक उत्पीड़न? क्या लोग राजनीतिक कारणों से नहीं प्रताड़ित किए जाते? क्या भाषाई आधार पर लोगों का उत्पीड़िन नहीं होता है? क्या लोग आपस में होने वाले युद्धों के चलते नहीं उत्पीड़ित किये जाते हैं? क्यों केवल धार्मिक उत्पीड़न को ही शामिल किया गया है? क्यों हर तरह का उत्पीड़न नहीं है? क्या यह विधेयक अनुच्छेद 14 के तीन बुनियादी बातों का उल्लंघन नहीं करता है?

पहला, कानून के सामने समानता

दूसरा, गैरतार्किक आधार पर वर्गीकरण

तीसरा, यह खुद अपने आप में पक्षपाती है जो पूरे विधेयक में दिखता है।

और मैं जानना चाहता हूं कि इन सवालों का कौन उत्तर देगा। कृपया मुझे बताइये। आप सांसदों से ऐसा क्यों कहेंगे कि आप इन सवालों का उत्तर नहीं देंगे और आप कोर्ट जाइये और वहां से उत्तर हासिल करिए। यहां सवालों के उत्तर दीजिए या फिर कोई शख्स इस बात की जिम्मेदारी ले और कहे कि भारत के एटार्नी जनरल ने इन सवालों का यह जवाब दिया है और वो ये हैं।

मैं सरकार को चुनौती देता हूं कि क्या वह विधि विभाग की सलाह को सदन के पटल पर रखने का साहस करेगी? क्या इस बात का साहस कर सकती है कि वह एटार्नी जनरल को सदन में बुलाए और उनसे इन सवालों का जवाब देने के लिए कहे। इसलिए आज जो हम कर रहे हैं वह संविधान को उसके भीतर से ही तोड़ रहे हैं। संविधान के एक छोटे हिस्से को इस कपटी विधेयक के जरिये तोड़ कर जमींदोज कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सौभाग्य से हमारे पास स्टेट के तीन आर्गन हैं। कार्यपालिका ने विधायिका को साठ-गांठ करने के लिए आमंत्रित किया है लेकिन मुझे आशा है कि न्यायपालिका इसे खारिज कर देगी।

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