Saturday, July 2, 2022

दलित पैंथर ने दलित साहित्य का भूमंडलीकरण किया: दलित पैंथर के संस्थापक जेवी पवार

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जेवी पवार दलित-पैंथर के संस्थापकों में एक रहे हैं। इस संगठन ने 1970 के दशक के शुरूआती वर्षों में अपनी गतिविधियों से भारत ही नहीं, दुनिया भर का ध्यान खींचा था। इसी संगठन को दलित-साहित्य का जनक भी माना जाता रहा है। लेकिन तथ्य यह है कि “दलित-साहित्य” ही “दलित-पैंथर” का जनक रहा है। पवार एक कौंध की तरह यह ध्यान दिलाते हैं कि संगठन और आंदोलन से पहले साहित्य है, इसलिए दलित-साहित्य को अधिक अहमियत दी जानी चाहिए। यह सब कैसे शुरू हुआ, कैसे तत्कालीन सरकार ने इस संगठन को पंगु बना डालने के लिए सुनियोजित अभियान चलाया और दलित साहित्य की मूल अवधारणा क्या रही है, आदि प्रश्नों पर दलित साहित्य अध्येता व युवा आलोचक राजश्री सैकिया ने जेवी पवार से बातचीत की। पेश है मुख्य अंश :

राजश्री सैकिया: पवार सर, आप दलित पैंथर के संस्थापकों में से एक रहे हैं, यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसने देश की राजनीति ही नहीं, साहित्य को भी गहराई से प्रभावित किया था, इसीलिए इस बातचीत के पहले प्रश्न के रूप में आपसे यही जानना चाहूंगी कि ऐसी क्या परिस्थिति हुई जिसकी वजह से दलित पैंथर की स्थापना करनी पड़ी?

जेवी पवार: जब तक बाबासाहेब आंबेडकर जीवित थे तब तक उस जमाने के जितने भी नेतागण थे, उनको बाबासाहेब के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं थी। बाबा साहेब के महापरिनिर्वाण के बाद दलितों के ऊपर फिर से अन्याय-अत्याचार शुरू हो गए। उस जमाने में हमारी समस्याएं बाबा साहेब की कलम के कारण दिखने लगी थीं। उससे पहले तो हमें अपना विचार, अपना दर्द रखने की अनुमति ही नहीं थी। बाबा साहेब की जो लड़ाई थी वह ब्रेन और पेन (बौद्धिकता और कलम) की थी। लेकिन, इस सब के बावजूद 1960 के बाद भी दलितों पर अत्याचार हो रहा था।

जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं, उस जमाने में शासन ने दलितों का साथ दिया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक कमेटी स्थापित की और उसका एक अध्यक्ष नियुक्त किया। इस समिति को जिम्मेदारी दी गई कि पूरे भारत में जहां-जहां दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं उन पर एक रिपोर्ट तैयार करें। यह रिपोर्ट 3 जनवरी 1972 को संसद में पेश होने वाली थी, पर यह रिपोर्ट इतनी मजबूत और शक्तिशाली थी कि उसकी वजह से सरकार को खतरा था। इस वजह से यह रिपोर्ट 3 महीने तक ऐसे ही पड़ी रही, उसको संसद में पेश होने नहीं दिया गया। कुछ नेताओं के जोर देने पर 1974 में इसे संसद में पेश किया गया।

जिस प्रकार के अत्याचार दलितों पर भारत में हो रहे थे ठीक वैसे ही अत्याचार अमेरिका में काले लोगों के ऊपर हो रहे थे। जिसकी वजह से काले लोग सड़कों पर उतरे और ‘ब्लैक पैंथर’ नामक संगठन शुरू किया। वह सब देखने के बाद हमने विचार किया कि हमें कलम की ही नहीं, लड़ाकू संगठन की भी जरूरत है, ऐसे लेखकों और कार्यकर्ताओं की जरूरत है, जो लड़ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर  उस समय मुंबई के बड़वानी जिले के ब्राह्मण गांव में दो दलित स्त्रियों की परछाई कुएं पर पड़ने की वजह से गांव के ब्राह्मण लोगों ने उन्हें निर्वस्त्र कर पूरे गांव में उनका जुलूस निकाला। यह खबर अखबारों में भी छपी।

यह घटना सुनकर हमारा एक दम से खून खौल उठा। नामदेव ढसालजी और मैंने इन सब का विरोध किया कि क्यों बार-बार लोगों के सामने उन दो स्त्रियों को लाया जाए। इस तरह से दलितों पर बहुत अत्याचार हो रहा था। मैंने और नामदेव ढसालजी ने विचार किया कि कुछ ऐसा किया जाए कि दलितों के ऊपर हो रहे अत्याचार को रोका जा सके। हम ने विचार किया कि हमें आंदोलन करना चाहिए, मगर आंदोलन का नाम क्या रखें। जिस प्रकार अमेरिका में ब्लैक लोगों ने अपने लिए ‘ब्लैक पैंथर’ नाम को चुना, उसी प्रकार हम भी पैंथर जैसा कोई संगठन शुरू करें। वहां पर काले लोग थे तो उन्होंने ‘ब्लैक पैंथर’ को चुना, यहां हम दलित थे तो हमने विचार किया कि यहां हम ‘दलित पैंथर’ नाम रखेंगे। इस तरह मैंने और नामदेव ढसालजी ने दलित पैंथर की नींव रखी। वैसे तो आजकल बहुत लोग बोलते रहते हैं कि हमने दलित पैंथर की स्थापना की, लेकिन सच्चाई यह है कि मैंने और ढसाल जी ने दलित पैंथर की स्थापना की और यह लड़ाई शुरू हुई।

राजश्री सैकिया: आपके अनुसार दलित पैंथर आंदोलन कहां तक सफल हुआ है? क्या आप इसकी सफलता से संतुष्ट है?

जेवी पवार: हमारा जो दलित पैंथर आंदोलन था वो 1972 के 9 मई से 1975 के 12 जून तक चला। केवल 3 साल हमने कार्य किया। जैसे ब्लैक पैंथर ने भी 3 साल या 4 साल ही काम किया। असल में कितने साल काम किया उससे ज्यादा जरूरी है कि क्या काम किया। हमने अन्याय-अत्याचार के खिलाफ खूब काम किया। सरकार भी हमसे डरने लगी। उस समय दलित लोगों को यह लगने लगा कि उनके लिए लड़ने वाला कोई तो है। हमने किसी को मारा नहीं, हमने किसी के ऊपर हमला नहीं किया, हमने शस्त्र नहीं उठाए। उस जमाने में दलित पैंथर के नाम जो भी पत्र आता था सब मेरे पास ही आता था। इतने बड़े मुंबई शहर में जेवी पवार, दलित पैंथर के नाम से जो भी पत्र आता था बराबर मेरे पास ही आता था, चाहे वह कहीं से भी लिखा हुआ हो, चाहे अमेरिका से भी, मेरे पास ही आता था। इस तरह से संगठन उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ। हमने 3 वर्ष में जो भी कार्य किया उससे मैं संतुष्ट हूं, अगर वह आगे चलता तो आज उत्तर भारत, महाराष्ट्र में हर जगह जो अन्याय-अत्याचार हो रहे हैं, वह नहीं होता।

राजश्री सैकिया: दलित पैंथर के विघटन के मुख्य कारण क्या थे? क्या इस संगठन के पुनर्जीवित होने की कोई संभावना आप देखते हैं?

जेवी पवार: राजनैतिक पार्टियां दलितों को साथ लेकर तो चलना चाहती हैं लेकिन वे यह सुनिश्चित करती हैं कि किसी भी प्रकार से दलितों को सत्ता नहीं मिले। दलितों को वहां बस निम्न स्तर का काम करना होता है। लेकिन जैसे ही दलित पैंथर सामने आया, दलितों को एक आवाज मिल गई। तब जितनी भी राजनैतिक पार्टियां थीं, सबको यह लगा कि अब दलित पैंथर की आवाज बंद होनी चाहिए। उस समय सरकार में कांग्रेस पार्टी थी। तब सरकार को लगा कि संगठन आगे नहीं बढ़ना चाहिए, इसको यहीं बंद करना चाहिए। इसलिए सरकार ने उस संगठन को बंद करने के लिए पुलिस आदि की सहायता ली।

उदाहरण के तौर पर अगर हम पर एक केस किसी जिले में हो रहा है तो दूसरा केस लगभग 400 किलोमीटर दूरी पर बना दिया जाता था। हमारे पास पैसे तो थे। सरकार को हमने बोला कि हम नहीं डर रहे हैं, अगर केस करना है तो एक ही जगह करो, धारा 153 (भारतीय दंड संहिता की यह धारा ‘उपद्रव कराने के आशय से जनता को भड़काने’ से संबंधित है) का जो केस है वह एक ही जगह में डालो। सरकार ने कोर्ट में बहुत सारे केस डाले और इस तरह से हमें परेशान किया कि हम कोर्ट में न जा सकें। इसी का फायदा उठाकर वे हमें जेल में डाल देते थे। सरकार ने संगठन को कमजोर करने के लिए सुनियोजित तरीके से काम किया। हमारे साथ के कार्यकर्ताओं को अपने साथ मिला लिया और संगठन को विघटित करने का काम किया।

राजश्री सैकिया: अगर दलित पैंथर का जन्म नहीं हुआ होता तो क्या मराठी दलित साहित्य का विकास इतनी तेजी से हो पाता? दलित पैंथर और साहित्य के रिश्ते को आप कैसे दिखते हैं?

जेवी पवार: दलित पैंथर से पहले हम दलित साहित्य कर रहे थे। दलित साहित्य पहले हुआ, उसके बाद दलित पैंथर हुआ। दलित साहित्य के कई युग ऐसे थे जब कोई लड़ने के लिए तैयार नहीं था, सब केवल कलम से राज लेने की बात करते थे, रास्ते पर उतरने के लिए कोई तैयार नहीं था। बड़े-बड़े लेखक दलित साहित्य में थे। वे लिखते थे कि हम लड़ाकू हैं, हमको लड़ना चाहिए लेकिन जब लड़ने का समय आता था तो भाग जाते थे। ऐसे सभी नहीं थे, हममें से कुछ लोग थे जो लड़ने का समय आता तो भागते नहीं थे।

बहरहाल, दलित साहित्य की धारणा तो पहले से ही मौजूद थी। बाबासाहेब के विचार दलित साहित्य के विचार थे। जब हमने दलित पैंथर की स्थापना की तो एक तरह का दबाव-कक्ष बन गया। दलित-पैंथर की हर जगह चर्चा होने लगी तो उसी के साथ दलित साहित्य की भी चर्चा होने लगी। इस तरह से दलित-पैंथर जैसे-जैसे अमेरिका, लंदन जैसे देशों में पहुंचा, उसी के साथ-साथ दलित साहित्य भी हर जगह पहुंचा। दलित पैंथर के कारण दलित साहित्य का भूमंडलीकरण हुआ। अगर दलित पैंथर नहीं होता तो इतनी जोर से दलित साहित्य भी नहीं आता, यह बात सच है। लेकिन हम से पहले दलित साहित्य था, उसके बाद दलित पैंथर हुआ। हम लोग मानते हैं दलित साहित्य पहले था इसलिए उसे ज्यादा अहमियत देनी चाहिए। भले ही कुछ लोग भागने वाले थे फिर भी जो पहले लड़ते थे, उनमें दलित पैंथर आने से और ताकत आ गई। लेकिन एक बात कहूंगा कि अब हम ‘दलित’ नहीं रहे। जैसे कि अमेरिका में जो काले लोग थे उनका नारा ‘ब्लैक इज ब्यूटी’ था, अब वह नारा बदल कर “ब्लैक इज पावर” हो गया है। ऐसे ही हम भी अब विचार कर रहे हैं अब हम भी ‘दलित’ नहीं रह गए। अब हम दलित साहित्य नहीं कहते, अंबेडकरवादी साहित्य कहते हैं।

राजश्री सैकिया: हिंदी दलित साहित्य के विकास में मराठी दलित साहित्य का क्या योगदान है?

जेवी पवार: हिंदी साहित्य ने मराठी दलित साहित्य का अनुवाद तो किया। लेकिन हम जैसा बोलते हैं वैसा अनुवाद नहीं हो पाता। आजकल ऐसा है कि वहां के लोग ही खुद लिखते हैं, इसीलिए उनका साहित्य मराठी साहित्य तक सीमित नहीं है। वे अब अपने अनुभव लिखते रहते हैं। हमारा साहित्य जो था वह कल्पना आधारित साहित्य था किंतु वह लोग जो लिखते हैं वह साक्ष्य पर आधारित लिखते हैं। इसीलिए उनका जो साहित्य है वह सशक्त साहित्य है। यह सच है कि दलित साहित्य का आरंभ मराठी दलित साहित्य ने ही किया, लेकिन आज की बात की जाए तो हमसे भी अच्छा दलित-आंबेडकरवादी साहित्य का निर्माण हिंदी, तेलुगु,  कन्नड़, पंजाबी इन सब में हो रहा है। मुझे विश्वास है कि एक दिन ऐसा होगा जब केवल अंबेडकरवादी साहित्य ही होगा।

राजश्री सैकिया: क्या आप मानते हैं कि दलित साहित्य का सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं मैं इस संबंध में आपकी राय विस्तार से सुनना चाहूंगी।

जेवी पवार: हमारे बुजुर्गों ने बोला है कि दलितों ने दलितों के संबंध में दलितों के लिए जो भी लिखा वह दलित साहित्य है। लेकिन हम ऐसा नहीं मानते। जैसे अब्राहम लिंकन ने बोला, ‘ ऑफ द पीपुल, फॉर द पीपुल, बाइ द पीपुल”,ठीक वैसे ही शुरू में हमारा दलित साहित्य “फॉर द दलित, ऑफ द दलित, बाइ द दलित” था। पर अब जब हम देखते हैं तो ऐसा नहीं रह गया। अब दलित साहित्य में ब्राह्मण स्त्री भी आने लगी हैं। कोई भी जात की स्त्री हो वह चाहे ब्राह्मण हो या किसी अन्य जाति की, आखिर है तो दलित ही है। उन लोगों पर भी अन्याय होते हैं, अत्याचार होते हैं। वे इन मुद्दों पर लिखती हैं तो उनका साहित्य भी आंबेडकरवादी साहित्य है। अंबेडकर ने संवैधानिक रूप से सभी को न्याय देने का प्रयास किया। संविधान में जो कुछ लिखा है जैसे- समता, समानता, बंधुत्व, एकता आदि के बारे में जो भी लिखेगा उसको हम अंबेडकरवादी साहित्य कहेंगे। यह बात गलत है कि दलितों ने दलितों के लिए ही जो लिखा वह दलित साहित्य है।

राजश्री सैकिया: क्या आपको लगता है कि दलित वर्ग और उच्च वर्ग के स्त्रियों की समस्या अलग-अलग होती है?

जेवी पवार: हर जाति की अलग-अलग परिस्थिति होती है। देखा जाए तो समस्या भी अलग अलग है। मगर आप मनुस्मृति देखोगी तो मनुस्मृति में स्त्री को कोई महत्व नहीं दिया गया है। कुछ समय पहले ब्राह्मण स्त्री दलित स्त्री पर हो रहे अत्याचार पर चुप रहती थी। उस पर अन्याय हो रहा है वह तो दलित है, उसको नंगा किया जा रहा है, हमारा क्या लेना देना, हमारी ब्राह्मण जाति में थोड़ी न हो रहा है – वह इस प्रकार से विचार करती थी। पर अब समय बदल गया है। जैसे कि आज अगर किसी भी दलित स्त्री के ऊपर अत्याचार हो रहा है तो ब्राह्मण स्त्री सोचती है कि वह दलित औरत है, वह मेरी जैसी औरत है, वह किसी भी जात या किसी भी पक्ष की हो उस पर अत्याचार मैं सहन नहीं करूंगी। आज की स्त्री यह चर्चा करती है तो यह अच्छी बात है और उसका हमें स्वागत भी करना चाहिए। पहले वह अपने घरों के बाहर निकलती नहीं थी, बस्ती के बाहर क्या ही हो रहा है उनको मालूम नहीं होता था। अब प्रौद्योगिकी के कारण ये सब संभव हो रहा है। कल जो घर से बाहर नहीं निकलती थी आज बीच रास्ते में भी लड़ने के लिए खड़ी होती है। वह आधुनिक स्त्री है, जो बाबा साहेब के विचारों के लिए लड़ रही है।

(राजश्री सैकिया असम विश्वविद्यालय के दीफू परिसर से दलित साहित्य पर शोध कर रही हैं।)

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