Tuesday, December 7, 2021

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भारत में उच्च जाति के शीर्ष न्यायाधीशों का रवैया अपने दलित सहयोगियों के प्रति पक्षपातपूर्ण: यूएस बार एसोसिएशन रिपोर्ट

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प्रभावशाली अमेरिकन बार एसोसिएशन (एबीए) सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स द्वारा, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारतीय गणराज्य के 70 साल के इतिहास में, केवल छह दलित न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया है, तैयार की गयी रिपोर्ट में कानूनी पेशे और न्यायपालिका में दलितों के प्रतिनिधित्व की कमी पर कड़ा प्रतिवाद किया है।

कानूनी विद्वानों अनुराग भास्कर और नील मोदी द्वारा तैयार ‘दक्षिण एशिया के कानूनी समुदाय में दलितों के लिए चुनौतियां’ शीर्षक रिपोर्ट को इस महीने प्रकाशित किया गया है। यह 74 साक्षात्कारों पर आधारित है, जिनमें से 32 उत्तरदाता दलित समुदाय के हैं, तीन आदिवासी हैं, चार अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं, तीन मुस्लिम हैं, और 32 अन्य गैर-दलित हैं । रिपोर्ट में एक प्रतिवादी को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि “सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था की विश्वसनीयता संवैधानिक लोकतंत्र में तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि हाशिए पर रहने वाले समुदाय स्पष्ट रूप से संस्था पर अपना भरोसा व्यक्त नहीं करते हैं।

आधिकारिक स्रोतों का हवाला देते हुए, करिया मुंडा समिति, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर एक संसदीय समिति (2000) द्वारा रिपोर्ट; संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग, न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया (2002); डॉ ईएम सुदर्शन नचियप्पन (2006) की अध्यक्षता में संसदीय स्थायी समिति; और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (2016), रिपोर्ट में कहा गया है कि 2011 तक, सभी 21 उच्च न्यायालयों में कुल 850 न्यायाधीशों के मुकाबले अनुसूचित जाति (एससी) / अनुसूचित जनजाति (एसटी) के केवल 24 न्यायाधीश थे। रिपोर्ट में खेद व्यक्त किया गया है कि आज, जबकि उच्चतम न्यायालय के 33 न्यायाधीशों में से केवल दो दलित हैं। उच्च न्यायालयों और निचली जिला न्यायपालिका में एससी / एसटी न्यायाधीशों के अनुपात के संबंध में सार्वजनिक डेटा नहीं मिल सका।

एक लीगल वेबसाइट ‘लीफलेट’में अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट में उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति में पूर्वाग्रह का आरोप लगाया गया है। दलित समुदाय के अपने सहयोगियों के प्रति उच्च जाति के न्यायाधीशों के निहित पूर्वाग्रहों की दृढ़ता पर उच्च न्यायालय के उच्च जाति के न्यायाधीशों का हवाला देते हुए, रिपोर्ट उनमें से एक का उल्लेख करते हुए कहती है कि कैसे एक उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान जब भी उन्होंने उस उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए एक दलित वकील के नाम पर विचार किया, तो उन्हें अपने उच्च-जाति के सहयोगी न्यायाधीशों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त उच्च जाति के न्यायाधीश का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि निचली न्यायपालिका में दलित न्यायाधीशों को आरक्षण / कोटा के माध्यम से नियुक्त किया जाता है, उच्च न्यायपालिका में उनके खिलाफ एक पूर्वाग्रह है कि वे कम मेधावी हैं, और इस प्रकार उन्हें आसानी से पदोन्नत नहीं मिलती है। इस जज का मानना था कि आरक्षण दलित उम्मीदवारों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जो पिछले एक दशक में लगभग दो वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का हिस्सा थे, ने कहा कि पदोन्नति पर विचार करने के लिए मुख्य मानदंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के राज्य-व्यापी प्रतिनिधित्व और सभी स्तरों पर उनकी वरिष्ठता को बनाए रखना होता है। उन्होंने कहा, चूंकि उनके समय में उच्च न्यायालयों में वरिष्ठता वाले कोई दलित न्यायाधीश नहीं थे, इसलिए उच्चतम न्यायालय में दलितों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के मुद्दे पर कॉलेजियम के हिस्से के रूप में चर्चा नहीं की गई थी।

रिपोर्ट में भारत के लिए एक पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को उसी भावना को साझा करते हुए उद्धृत किया गया है। तथ्य यह है कि अपने अस्तित्व के 70 वर्षों में, भारत के उच्चतम न्यायालय ने केवल आठ महिला न्यायाधीशों और एक दलित मुख्य न्यायाधीश को देखा है। यह इस वास्तविकता का वसीयतनामा है कि हमारी न्यायपालिका की संरचना का प्रतिनिधित्व दलित आबादी नहीं करती है।

रिपोर्ट में भारत एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व सॉलिसिटर जनरल का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि 1980 के दशक के बाद स्थितिकाफी बदल गई है, और आज हम दलित समुदाय से आने वाले वकीलों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि देखते हैं। हालांकि, उन्हें इस बात का भी अफसोस है कि दलित और आदिवासी समुदायों के सदस्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है क्योंकि कोई प्रणालीगत समावेशी व्यवस्था संस्थागत नहीं थी।

उच्च जातियों के तीन मौजूदा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का हवाला देते हुए, जिन्होंने स्वीकार किया कि निचली अदालतों में जाति क्लाइंट प्राप्त करने में भूमिका निभा सकती है, रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्सर, दलित समुदाय के कुछ वकील मामलों को प्राप्त करने के लिए अपनी पहचान छुपाते हैं। इस तथ्य की दलित समुदाय के एक अन्य प्रतिवादी द्वारा पुष्टि की गई, जिन्होंने साझा किया कि उनके एक रिश्तेदार ने मुवक्किल प्राप्त करने के लिए अपना उपनाम बदलकर ब्राह्मण उपनाम कर लिया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि “चूंकि दलित सबसे वंचित सामाजिक समूहों में से एक हैं, इसलिए उन्हें गुणवत्तापूर्ण कानूनी शिक्षा तक पहुंच में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट कहती है कि भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि उनके समय में अधिकांश दलित वकील अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अध्ययन नहीं करते थे। इसके परिणामस्वरूप, वे निचली अदालतों में प्रैक्टिस करने तक ही सीमित थे क्योंकि उच्च न्यायालयों को अंग्रेजी में उन्नत दक्षता की आवश्यकता होती है। क्योंकि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में सुनवाई का माध्यम अंग्रेजी है, दलित समुदाय के अधिकांश वकीलों के पास यह विकल्प नहीं था कि वे इन संवैधानिक अदालतों के समक्ष अपनी वकालत शुरू करें।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कानूनी पेशे में दलित समुदाय के सामने आने वाली मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होती हैं । रिपोर्ट में इंगित किया गया है कि भारत में बार एसोसिएशनों में ऐतिहासिक रूप से उच्च जाति के पुरुषों का वर्चस्व रहा है। वर्तमान पद धारकों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अन्य अधिकारियों के प्रोफाइल की समीक्षा से पता चलता है कि इसमें मुख्य रूप से उच्च जाति की पृष्ठभूमि के व्यक्ति शामिल हैं। शुरुआती सालों में दलित वकीलों को समर्थन देने वाली बीसीआई या किसी बार एसोसिएशन की कोई योजना नहीं मिली।

रिपोर्ट कहती है कि भेदभाव के परिणामस्वरूप युवा दलित वकीलों के पास कानूनी क्षेत्र में समान अवसरों तक पहुंच नहीं है, उनके पास केवल सीमित विकल्प हैं, जिससे वे दलित समुदाय के अधिकारों की वकालत करने वाले अपने स्वयं के जमीनी स्तर के संगठन बनाने के लिए प्रेरित होते हैं। इससे भी बदतर स्थिति यह है कि दलित/आदिवासी समुदाय के लिए जमीनी स्तर पर मानवाधिकार मामलों पर काम करने वाले वकीलों को माओवादी या नक्सली के रूप में ब्रांडेड किया जा रहा है, ताकि उन्हें राज्य प्रशासन के अनुरूप बनाया जा सके।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एससी/एसटी अत्याचार के मामलों के प्रति असंवेदनशीलता है। जबकि आपराधिक न्याय प्रशासन प्रणाली के साथ काम करने वाले मानवाधिकारों के लिए राष्ट्रीय अभियान और न्याय के लिए राष्ट्रीय दलित आंदोलन जैसे संगठनों के माध्यम से दलित वकीलों की क्षमता को बढ़ावा देने के प्रयास किए गए हैं, जो अत्याचार और हिंसा से प्रभावित लोगों के न्याय तक पहुंच के मुद्दों को हल करने के लिए काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिला स्तर पर अधिकांश सरकारी अभियोजकों को न तो अत्याचार कानून का ज्ञान है और न ही वे पीड़ितों की पृष्ठभूमि के प्रति संवेदनशील हैं।

एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचार से संबंधित मामलों का जिक्र करते हुए, रिपोर्ट में एक दशक से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे एक दलित वकील को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि अक्सर वह दलितों से संबंधित मामलों को संभालने में वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोणों में अंतर अनुभव करता है ।रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे ही एक उदाहरण में उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों, जिन्हें उनके दृष्टिकोण में उदार माना जाता था, ने उन्हें अत्याचारों और सकारात्मक कार्रवाई के मामलों में अपनी बात रखने से रोक दिया। एक अन्य उदाहरण में उन्हें अत्याचार के मामले में तथ्यों को पढ़ने के लिए न्यायाधीश द्वारा रोका गया था।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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