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न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट: मुसलमानों के ख़िलाफ़ कैसे हुई दिल्ली पुलिस गोलबंद

नई दिल्ली। दिल्ली हिंसा पर न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट किसी की भी आँखें खोल देने वाली है। रिपोर्ट में न केवल मोदी सरकार की कलई खोली गयी है बल्कि उसमें दिल्ली पुलिस को बिल्कुल नंगा कर दिया गया है। इसके अलावा ज़मीन पर किस तरह से हिंदू बलवाइयों का कब्जा था इसमें उसकी पूरी एक ज़िंदा तस्वीर पेश की गयी है।

शुरुआत उसने उस चर्चित वीडियो और उसके पीछे के वाक़ये से किया है जो सोशल मीडिया समेत तमाम प्लेटफ़ार्मों पर वायरल हो चुका है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि घरों की पुताई का काम करने वाला कौशर अली काम ख़त्म करने के बाद अपने घर जा रहा था तभी वह उस भीड़ में फँस गया जहां हिंदू-मुस्लिम मॉब एक दूसरे पर पत्थर फेंक रहे थे। इस दौरान उन लोगों ने एक सड़क को जाम कर दिया था। सड़क पार कर अपने घर बच्चों के पास जाने की उसे जल्दी थी। लिहाज़ा सहायता के लिए वह पास खड़े कुछ पुलिस अफ़सरों के पास गया। यह उसकी सबसे बड़ी गलती थी। ऐसा उसका कहना था।

सहायता करने की जगह अफ़सरों ने उसे ज़मीन पर पटक कर उसका सिर फोड़ दिया। दूसरे कई मुसलमानों के साथ उन लोगों ने उसकी भी पिटाई शुरू कर दी। उन सभी के शरीर में जगह-जगह से खून बहने लगा। उन लोगों ने पुलिस से दया की भीख माँगनी शुरू कर दी। लेकिन उन पर किसी तरह की रहम दिखाने की जगह अफ़सर उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए उन्हें डंडों से गोदना शुरू कर दिया। उन्हें राष्ट्रगान गाने के लिए कहा। और जमकर गालियाँ दीं। आपको बता दें कि हिंसा के शिकार इन युवाओं में से एक की दो दिन बाद अंदरूनी चोट के चलते मौत हो गयी। 

अली का कहना था कि पुलिस के लोग उसके साथ खेल रहे थे। एक पुलिस की कही बात को याद करते हुए उसने बताया कि “यहां तक कि अगर हम तुम्हारी हत्या भी कर दें तो हमें कुछ नहीं होगा।”

जहां तक उसकी बात है तो वे सही ही कह रहे थे।

भारत सालों बाद इतने भीषण सांप्रदायिक खूनी दंगों की चपेट में है। बहुत सारे लोग इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तहत फलने-फूलने वाले अतिवादी हिंदुत्व के निश्चित नतीजे के तौर पर देख रहे हैं। उनकी पार्टी ने हिंदू राष्ट्रवाद के एक मिलिटेंट ब्रांड को अपना लिया है और उसके नेता खुलेआम मुसलमानों को अपमानित करने का अब कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं। हाल के महीनों में मोदी ने ढेर सारी ऐसी नीतियों को पास कराया है जो अपने कोर में मुस्लिम विरोधी हैं। भारत के एक मात्र मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे का ख़ात्मा इसी का हिस्सा है। जिसे चंद महीनों पहले ही अंजाम दिया गया है।

अब ढेर सारे ऐसे प्रमाण सामने आ रहे हैं जिनमें यह बात दिखी है कि दिल्ली पुलिस ने संगठित तौर पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ काम किया है और कई बार तो उस हिंदू दंगाई भीड़ का सक्रिय रूप से साथ दिया जो दिल्ली में मुस्लिम घरों और मुस्लिम परिवारों को निशाना बनाकर उन पर हमले कर रही थी। आपको यहां याद दिला दें कि दिल्ली पुलिस सीधे मोदी सरकार के तहत काम करती है।

ढेर सारे ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें पुलिस अफ़सरों को मुस्लिम प्रदर्शनकारियों पर पत्थर फेंकते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही उसमें पुलिस द्वारा हिंदू भीड़ की तरफ़ हाथ हिलाते हुए उन्हें आमंत्रित करने के भी फ़ुटेज हैं।

एक पुलिस कमांडर ने न्यूयार्क टाइम्स को बताया कि जैसे ही हिंसा की शुरुआत हुई- उस समय ज़्यादातर इसको हिंदू उपद्रवियों ने शुरू किया- प्रभावित इलाक़ों के अफ़सरों को अपनी रायफलों को थाने में जमा करने का आदेश दे दिया गया। बहुत अफ़सरों को एक दूसरे से यह कहते हुए पाया गया कि हिंसा के दौरान उनके पास सिर्फ़ लाठियाँ थीं। जबकि भीड़ और दंगाइयों को नियंत्रित करने के लिए उन्हें गन की ज़रूरत थी। कुछ शोधकर्ता पुलिस फ़ोर्स पर इस बात का आरोप लगा रहे हैं कि सड़कों पर जान-बूझ कर कम अफ़सरों की तैनाती की गयी थी। साथ ही उनके पास गन भी अपर्याप्त मात्रा में थी।  यह उस समय हुआ जब प्रतिद्वंदियों की आपस में लड़ाई के बाद झगड़ा निशाना बनाकर मुसलमानों की हत्याओं में तब्दील हो गया था।

मौत के शिकार 50 से ज़्यादा लोगों में दो तिहाई की पहचान मुस्लिम के तौर पर की गयी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे संगठित जनसंहार करार दे रहे हैं।

हालाँकि भारत में मुसलमानों की आबादी 14 फ़ीसदी है। लेकिन दिल्ली में यह आंकड़ा 13 फीसदी का है। जबकि दिल्ली पुलिस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 2 फ़ीसदी से भी कम है।

भारत की पुलिसिंग संस्कृति बहुत लंबे समय से बर्बर, पक्षपाती और अल्पसंख्यक विरोधी रही है और अपने चरित्र में वह पूरी तरह से औपनिवेशिक है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर की उसकी जेहनियत अभी भी बरकरार है जिसमें पुलिस को इस तरह का कोई भ्रम नहीं था कि उसे जनता की सेवा करनी है। उसे केवल विक्षुब्ध आबादी को ताक़त के बल पर दबाना था।

लेकिन इस समय उससे अलग जो चीज हो गयी है वह यह कि क़ानून को लागू करने वाली भारत की इस बड़ी मशीनरी का पीएम मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के हिस्से द्वारा बड़े स्तर पर राजनीतिकरण कर दिया गया है।

पुलिस के कर्मचारी और ख़ासकर मोदी की पार्टी के नियंत्रण वाले राज्यों में अपने निशाने को लेकर बेहद सेलेक्टिव हैं। जैसे कर्नाटक में एक मुस्लिम स्कूल के प्रधानाचार्य को अपने छात्रों द्वारा नये बने क़ानून के विरोध में खेले गए एक नाटक के चलते देशद्रोह के आरोप में दो महीने के लिए जेल जाना पड़ा। पुलिस अफसरों का कहना है कि स्कूल का प्रधानाचार्य मोदी को लेकर बेहद आलोचक था।

कुछ जज भी इस हिंदू राष्ट्रवादी लहर की चपेट में आ गए।

दिल्ली के एक जज के मोदी की पार्टी के एक नेता के भड़काऊ भाषण की जाँच न होने  पर अचरज ज़ाहिर करने पर न केवल उनसे केस ले लिया गया बल्कि उनका दूसरे राज्य में तबादला भी कर दिया गया। और ठीक उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में कई मज़बूत व्यवस्थाएँ दीं। उन्हीं जजों में से एक अरुण मिश्रा ने विजनरी जीनियस बता कर मोदी की सार्वजनिक तौर पर तारीफ़ की।

यह सब कुछ सड़क पर हिंदू अतिवाद का झंडा बुलंद करने वालों को मज़बूती दे रहा था।

धार्मिक रूप से मिला-जुला और आबादी के हिसाब से बेहद सघन उत्तर-पूर्वी दिल्ली का यह इलाक़ा अब शांत है। लेकिन कुछ हिंदू नेताओं को तथाकथित शांति मार्च निकालते देखा जा सकता है जिनमें उनके सिर सफ़ेद मेडिकल टेप से ढके हो सकते हैं। यह पूरे नरेटिव को बदलने की कोशिश का हिस्सा है। जिसमें हिंदुओं को पीड़ित के तौर पर पेश करने की साज़िश छुपी हुई है। इसका मूल उद्देश्य मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा को और गहरा करना है।

पुलिस से अपना पूरा विश्वास खो चुके कुछ मुस्लिम अपने घरों को छोड़ कर जा रहे हैं। आंतरिक रूप से विस्थापित तक़रीबन 1000 लोग एक कैंप में शरण लिए हुए हैं।

मुस्लिम नेता हिंसा को उन्हें सबक़ सिखाने के लिए राज्य प्रायोजित एक अभियान के तौर पर देखते हैं। हिंदू भीड़ द्वारा मुसलमानों की लिंचिंग में बेबर्दी से हत्या और मोदी सरकार द्वारा उनकी राजनीतिक शक्ति छीन लिए जाने के बाद भारत की मुस्लिम आबादी दिसंबर में जागी। और नये नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ दूसरे भारतीयों के साथ वह सड़कों पर उमड़ पड़ी। यह क़ानून मुस्लिम को छोड़कर दक्षिण एशिया में रहने वाले सभी धर्मों के लोगों को भारत में नागरिकता हासिल करने का अधिकार देता है।

मुस्लिम नेता कहते हैं कि मोदी सरकार पूरे समुदाय को पीछे धकेल कर उन्हें बिल्कुल शांत कर देना चाहती है।

एक मुस्लिम एक्टिविस्ट उमर ख़ालिद ने बताया कि “इस पागलपन का एक तरीक़ा है।” “सरकार पूरे मुस्लिम समुदाय को उसके घुटनों के बल खड़ा कर देना चाहती है। जिसमें वह उससे अपने जीवन और रोजी-रोटी की भीख मांगे।”

हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा लिखी गयीं उनकी बुनियादी किताबों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यह सब कुछ आप उनकी किताबों में पढ़ सकते हैं। वे इस बात में विश्वास करते हैं कि भारत के मुसलमानों को स्थायी रूप से भय में जीना चाहिए।

अपने कुछ ट्वीट में शांति की अपील के अलावा नरसंहार के बाद से मोदी ने बहुत ज़्यादा कुछ नहीं कहा है। दिल्ली पुलिस ने अपने ऊपर लगे मुस्लिम विरोधी पक्षपात के आरोप को ख़ारिज करते हुए कहा कि क़ानून और व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए उन लोगों ने पूरी मज़बूती के साथ प्रयास किया। जिसे पड़ोस में रहने वाले हिंदू और मुस्लिम दोनों सही नहीं मानते हैं।

पुलिस के एक प्रवक्ता एमएस रंधावा ने एक लिखित उत्तर में बताया कि पुलिस ने बग़ैर किसी धार्मिक या अन्य भेदभाव के अपनी प्रतिक्रिया दी।

पुलिस के अधिकारियों ने बताया कि अली और दूसरे मुस्लिमों को चोट प्रदर्शनकारियों ने पहुँचायी है। और पुलिस ने उनका बचाव किया है।- जबकि वीडियो में बिल्कुल साफ-साफ पुलिस अफ़सरों द्वारा उनको चोट पहुँचाए जाने की बात दिखाई गयी है- पुलिस अधिकारी एक पुलिस अफ़सर के मरने और 80 से ज़्यादा के घायल होने पर ज़ोर देते हैं। एक वीडियो में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों की एक भीड़ द्वारा ढेर सारे पुलिस अफ़सरों पर हमले को देखा जा सकता है।

एक्सपर्ट बताते हैं कि नई दिल्ली की हिंसा एक पैटर्न पर फ़िट बैठती है जिसमें कुछ दिनों के लिए पूरी अराजकता की छूट दी जाती है- जिसमें भारी तादाद में अल्पसंख्यकों की हत्या निहित है- उसके बाद सरकार द्वारा उस पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है।

1984 में कांग्रेस शासन के दौरान भी दिल्ली पुलिस ने कुछ दिनों के लिए ख़ुद को पीछे खींच लिया था। जबकि उस दौरान भीड़ ने 3000  से ज़्यादा सिखों की हत्या कर दी थी।

उसी तरह से 1993 में मुंबई में भी कांग्रेस के शासन के दौरान यही हुआ। जब दंगों में 100 से ज़्यादा मुसलमानों की हत्या कर दी गयी थी।

2002 में गुजरात में भी मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान दंगाई हिंदुओं की भीड़ ने सैकड़ों मुसलमानों को मार डाला था। तब मोदी पर दंगाइयों के साथ साँठगाँठ का आरोप लगा था लेकिन बाद में कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट दे दी थी।

बहुत सारे रिटायर्ड पुलिस अफ़सरों ने कहा है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान नियम यह है कि ज़्यादा से ज़्यादा फ़ोर्स की तैनाती की जाए और ढेर सारी गिरफ़्तारियाँ हों। लेकिन दिल्ली में इनमें से किसी का पालन नहीं हुआ।

एक पूर्व कमिश्नर अजय राज शर्मा ने पुलिस के प्रदर्शन को किसी व्याख्या से परे  बताया। इसको माफ़ नहीं किया जा सकता है।

जब 23 फ़रवरी को हिंसा शुरू हुई- जैसा कि हिंदू भीड़ इकट्ठा होकर शांतिपूर्ण तरीक़े से धरना दे रहे मुसलमानों को जबरन हटाने की कोशिश की- तब इसमें बहुत कुछ दोतरफ़ा था। दिन के अंत में हिंदू और मुस्लिम दोनों पर हमले हुए थे। और दर्जनों को देसी कट्टा से गोलियाँ लगी थीं।

लेकिन 25 फ़रवरी तक दिशा बिल्कुल बदल गयी थी। हिंदू दंगाई बिल्कुल उन्माद में थे और निशाना बनाकर मुस्लिम परिवारों पर हमले कर रहे थे। और सारी जगहों पर हिंसा थी।

हिंदू भीड़ जब अपने माथे पर भगवा पट्टा बांधकर, हाथों में बेसबाल बैट और लोहे के राडों को लेकर हत्या के लिए मुसलमानों को ढूँढ रही थी तब पुलिस अफ़सर मूक दर्शक बने हुए थे। पूरा आकाश धुएँ से भर गया था। मुसलमानों के घर, दुकानें और मस्जिदें आग के हवाले कर दी गयी थीं।

उस दिन जब न्यूयार्क टाइम्स के एक रिपोर्टर ने पुलिस अफ़सर के पास खड़े एक स्थानीय निवासी से बात करने की कोशिश की तो कुछ लोगों की एक भीड़ ने घूरते हुए उसके हाथ से नोटबुक छीन कर उसे फाड़ दिया। जब रिपोर्टर ने पुलिस अफ़सर से सहायता माँगी तो उनमें से एक ने कहा कि “मैं नहीं कर सकता। ये युवा लड़के बहुत ख़तरनाक हैं।”

पुलिस की इस नाकामी के लिए अमित शाह के गृहमंत्रालय की बहुत आलोचना हो रही है। हालाँकि पुलिस इस बात से इंकार कर रही है कि दंगाइयों के ख़िलाफ़ कड़ाई से न पेश आने का उन्हें कोई ऊपर से निर्देश मिला था। इस मामले में न्यूयार्क टाइम्स ने जब गृहमंत्रालय से कई बार संपर्क करने की कोशिश की तो उसने उसका कोई जवाब नहीं दिया।

गुरुवार को अमित शाह ने संसद में बोलते हुए सभी अपराधियों के ख़िलाफ़ बग़ैर किसी धर्म, जाति या फिर राजनीतिक संबंध से जुड़ा भेदभाव किए कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया। उन्होंने पुलिस का बचाव किया और हिंसा को बिल्कुल षड्यंत्र करार दिया। इसके साथ ही यह भी कह डाला कि जाँच में इस्लामिक स्टेट से भी संबंध के बारे में पता चला है।

दूसरे लोगों ने भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीक़ी ने कहा कि भारतीय पुलिस धुर औपनिवेशिक और जातिवादी है। पुलिस का व्यवहार कमजोरों के प्रति बेहद हिंसक और हमलावर रहता है।

भारत की आबादी में तक़रीबन 80 फ़ीसदी हिंदू हैं। और हिंदुओं के गैंग दिल्ली के कई इलाक़ों में घूम-घूम कर होली से पहले मुसलमानों को दिल्ली छोड़ देने की धमकी दिए।

बेबी नाम की एक मुस्लिम महिला ने कुछ दिनों पहले खटखटाए जाने पर जब अपना दरवाज़ा खोला तो उसने 50 लोगों को एक नोटबुक के साथ सामने खड़ा पाया जो घर-घर जाकर मुसलमानों के पते लिख रहे थे। उसने अपना सामान रखा और शायद वह जल्द ही दिल्ली छोड़ दे।

उसने कहा कि “ओ अल्लाह तुमने मुझे क्यों एक हिंदू नहीं बनाया?” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “क्या यह मेरी गलती है कि मैं एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुई”?

(न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on March 13, 2020 10:17 pm

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