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सीमा विवाद के बीच फायरिंग: यह सब भारत-नेपाल संबंध के लिए बुरा संकेत है

यह सच है कि शुक्रवार की सुबह ‘नेपाल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स’ की गोली से एक भारतीय की मौत हो गयी है और दो अन्य घायल हो गये हैं। मगर सहमति इस बात पर नहीं है कि आखिर नेपाली सिपाहियों को गोली क्यों चलानी पड़ी? क्या इस घटना को नेपाली सिपाहियों की “ज्यादती” कहना उचित है? या फिर अपने ऊपर हो रहे पथराव से बचने और बिगड़ते हुए हालात को काबू करने के लिए नेपाली सिपाहियों ने फायरिंग की?

मीडिया की खबर के अनुसार मृतक का नाम विकास यादव है, जबकि उमेश राम और उदय ठाकुर के पैरों में गोली लगी हुई है। फायरिंग की यह घटना नेपाल के दक्षिण में स्थित सर्लाही ज़िले में सामने आई। यह बिहार के सीतामढ़ी ज़िले से करीब है और ‘सेंट्रल डेवलपमेंट रीजन’ के जनकपुर ज़ोन का हिस्सा है।

मगर इस बात पर आम सहमति नज़र आती है कि इस घटना के बाद सीमा पर तनाव और भी बढ़ गया है और यह सब कुछ भारत-नेपाल के आपसी संबंध के लिए बुरा संकेत है।

भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इस घटना के लिए नेपाली सिपाहियों को कसूरवार ठहराया है। दैनिक जागरण की सुर्खी बहुत कुछ बयान कर जाती है, “नेपाल पुलिस की अंधाधुंध फायरिंग में एक भारतीय की मौत, सीमा पर तनाव।” अपनी रिपोर्टिंग में दैनिक जागरण आगे लिखता है कि “शुक्रवार की सुबह करीब 8:30 बजे सीतामढ़ी के सोनबरसा थाना क्षेत्र की पीपरा परसाइन पंचायत की लालबंदी जानकीनगर सीमा पर नेपाल आर्म्‍ड फोर्स (नेपाल पुलिस) ने भारतीयों को निशाना बनाते हुए अंधाधुंध फायरिंग की।

नेपाल पुलिस ने सीमा से एक व्यक्ति को बंधक भी बना लिया। ग्रामीणों की मानें तो नेपाल की ओर से 18 राउंड फायरिंग की गई। मृतक की पहचान जानकी नगर टोला लालबंदी निवासी नागेश्वर राय के 25 वर्षीय पुत्र विकास कुमार के रूप में हुई है। वहीं, विनोद राम के पुत्र उमेश राम व सहोरवा निवासी बिंदेश्वर शर्मा के पुत्र उदय शर्मा घायल हैं। बंधक बनाया गया व्यक्ति जानकी नगर का लगन राय है। नेपाल पुलिस की इस कार्रवाई के बाद बॉर्डर पर तनाव बढ़ गया है।”

‘दैनिक जागरण’ ने जहाँ नेपाली पुलिस को “अंधाधुंध” गोलीबारी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया, वहीं उसने यह भी दावा किया कि इस घटना से पहले भी अर्थात पिछली 16 मई को नेपाली पुलिस ने किसनगंज बार्डर पर फायरिंग की थी। हालाँकि इस में किसी के हताहत होने की ख़बर नहीं मिली। अगले रोज़ दोनों देशों के पुलिस अधिकारियों की बैठक के बाद मामले को सुलझा लिया गया।

हिंदी न्यूज़ चैनल ज़ी न्यूज़ एक क़दम आगे जाते हुए आरोप लगाया कि यह सब कुछ नेपाल चीन के इशारे पर कर रहा है। इस प्रोग्राम में ‘ज़ी न्यूज़’ ने इस पूरी घटना को “बोर्डर पर नेपाल की ‘पाकिस्तानी’ हरकत” कहा। प्रोग्राम का सार यह है कि भारत के खिलाफ बॉर्डर पर जो तनाव पाकिस्तान और नेपाल की तरफ से दिख रहे हैं उसकी ‘पटकथा’ चीन ने तैयार की है।

घटना में घायल युवक।

वहीं अंग्रेजी अख़बार “इंडियन एक्सप्रेस” ने अपनी ख़बर का स्रोत भारत के सशत्र सीमा बल (एसएसबी) को बनाया है। ख़बर में अख़बार लिखता है कि यह सब कुछ सुबह 8:40 पर पेश आया जब सीतामढ़ी का एक परिवार नेपाल की सीमा के अन्दर दाख़िल हो गया था। जब उसे नेपाली पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो इस घटना ने विवाद की शक्ल अख्तियार कर लिया। अख़बार ने एसएसबी के डीजी राजेश चन्द्र का भी बयान प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने कहा है कि यह “लोकल” मामला है, जिस का दोनों देशों या दोनों की सेनाओं के संबंध पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।

आखिर इतनी बड़ी घटना को डीजी राजेश चन्द्र क्यों “लोकल” कह कर हैं? दरअसल वे मीडिया के सवालों से भाग रहे हैं। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति की बड़ाई करते सत्ता वर्ग और उनसे जुड़ा मीडिया थकता नहीं था, लेकिन आज वह इन सवालों से भाग रहा है कि आखिर क्यों भारत के संबंध अपने पड़ोसी मुल्कों जैसे पाकिस्तान, चीन और नेपाल से ख़राब हो रहे हैं?

पाकिस्तान और चीन से रिश्ते पहले भी ख़राब रहे हैं, मगर जिस तरह नेपाल से भारत के विवाद बढ़ रहे हैं उसने मोदी सरकार की कूटनीतिक विफलताओं की कलई खोल दी है।

दूसरी तरफ नेपाली मीडिया का पक्ष यह है कि नेपाली फ़ौज को गोली चलाने के लिए तब मजबूर होना पड़ा जब भारतीय नागरिकों की तरफ से पत्थर बाज़ी शुरू हो गयी। नेपाल के मशहूर अंग्रेजी डेली काठमांडू पोस्ट ने लिखा है कि ‘नेपाल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स’ ने गोली तब चलाई जब “एक भीड़ ने सुरक्षा बल पर हमला बोल दिया”। जिस भारतीय को क़ब्ज़े में लेने की बात भारतीय मीडिया में कही गयी है उसके बारे में ‘काठमांडू पोस्ट’ लिखता है कि नवल किशोर राय को तब कब्ज़े में लिया गया जब उसने नेपाली सिपाहियों से हथियार छीनने की कोशिश की।

मकामी एसपी (नेपाली पुलिस) गंगा राम श्रेष्ठ के बयान को भी प्रकाशित किया गया है जिसमें उन्होंने दावा किया है कि जब चार भारतीय व्यापारियों को नेपाल आने से रोक दिया गया तो ये लोग सैकड़ों लोगों को जमा कर सीमा पर प्रदर्शन करने लगे और फिर सभी ने मिलकर नेपाली पुलिस पर हमला बोल दिया। इस अख़बार ने यह भी दावा किया है कि कुछ रोज़ पहले संदिग्ध तस्करों के एक समूह ने नेपाली पुलिस पर इसी सर्लाही जिले में आक्रमण किया था।

इंटरनेशनल मीडिया अल-जज़ीरा ने भी गंगाराम श्रेष्ठ के बयान को ही अपनी खबर का आधार बनाया है। ख़बर के मुताबिक़, 30 भारतीय लगभग 100 मीटर अन्दर नेपाल की सीमा में आ गए थे। जब पुलिस ने उनसे रुकने को कहा तो वे पुलिस से झगड़ पड़े। और आखिर में जब भीड वहां जमा हो गयी तो उसने पुलिस पर पत्थर और रोड़े मारने शुरू कर दिए। साथ ही नेपाली पुलिस की एक ‘गन’ भी छीन ली गयी तब पुलिस ने हवाई फायरिंग की। “हथियार की बरामदगी के लिए पुलिस को पांच राउंड गोली चलानी पड़ी, जिसमें तीन लोग ज़ख़्मी हो गए। हमें यह जानकारी मिली है कि एक की मौत इलाज के दौरान भारत में हो गयी।” श्रेष्ठ ने अल-जज़ीरा से कहा।

घायल को अस्पताल ले जाते लोग।


विभिन्न ख़बरों को पढ़ कर यह बात तो साफ है कि दोनों देशों की बीच असहमति बढ़ती जा रही है। दोनों देशों का मीडिया इस पूरी घटना का कसूरवार एक दूसरे देश को बना रहा है।

दोनों देशों के बीच सीमा विवाद बढ़ता चला जा रहा है, इस तरह के हिंसक के हालात मामले को और विस्फोटक बना सकते हैं। मगर अफ़सोस कि अभी तक इस घटना को ले कर ‘टॉप लेवल’ से कोई बयान जारी नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप मीडिया में अटकलों का बाज़ार अधिक गर्म हो सकता है।

याद रहे कि भारत और नेपाल आपस में 1750 किलोमीटर लम्बा बॉर्डर शेयर करते हैं। जो दोनों देशों के नागरिकों के लिए लगभग खुले हैं। दोनों देशों के बीच आने जाने और रहने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा हासिल करने की भी ज़रूरत नहीं है। नेपाल का आयत किया हुआ सामान भारत की सीमा से ही गुज़रता है।

ऐतिहासिक तौर पर दोनों देशों के संबंध करीब के रहे हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच पारिवारिक समबन्ध हैं। उनके दरम्यान आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते भी मज़बूत रहे हैं। एक अनोखी बात यह है कि नेपाली गोरखा भारतीय फ़ौज में बड़ी तादाद में हैं। जाने माने विद्वान उमर खालिदी ने अपनी किताब खाकी एंड एथनिक वायलेंस इन इन्डिया (2003) में लिखा है कि नेपाली गोरखा भारतीय फ़ौज में 5 प्रतिशत हैं, जिनकी न्यूक्ति के लिए भारत सरकार ने नेपाल के धरान और पोखरा में सेंटर खोला है। जहाँ भारतीय फ़ौज में नौकरी पाकर नेपाली गोरखों को रोज़गार का अवसर प्राप्त होता है, वहीं यह भी सच है कि गोरखों के भारतीय सेना में काम करने को लेकर नेपाल में भी विरोध सामने आने लगा है।

मगर दोनों देशों के झगड़े के भी कई बिंदु हैं। उनमें से एक है सीमा विवाद को लेकर। विवाद यह है कि सीमा पर भारत एक रोड बना रहा है। ‘हिमालयन रोड लिंक’ कालापानी से हो कर गुज़रने वाला है। नेपाल ने इस रोड का विरोध किया है क्यूोंकि उनकी राय है कि यह रोड नेपाल के कुछ भूभाग पर बनाया जा रहा है। इस संबंध में नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने एक नया नक्शा जारी किया है जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखलाया गया है। भारत ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि नेपाल द्वारा जारी नया नक्शा भारत के कुछ हिस्सों को अपने देश में शामिल कर लिया है।

विवाद गहराता जा रहा है। नेपाल की संसद ने अब इस नए नक्शे को कुछ रोज़ पहले मंज़ूरी दे दी है। इससे सम्बंधित संविधान संशोधन विधेयक भी पारित हो गया है, जिसे राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के पास ‘अप्रूवल’ के लिए भेज दिया गया है। जैसे ही उन्होंने इस पर हस्ताक्षर कर दिए, वैसे ही यह कानून बन जायेगा।

इसी विवाद के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक गैर जिम्मेदाराना बयान दे दिया। अमर उजाला में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी ने “नेपाल सरकार को चेतावनी दी और कहा कि राजनीतिक सीमा तय करने से पहले देखना चाहिए कि तिब्बत का क्या हश्र हुआ।” इसके फ़ौरन बाद नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने पलटवार करते हुए कहा कि “उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ जी ने नेपाल को लेकर कुछ कहा है। उनकी टिप्पणी उचित नहीं है। केंद्र सरकार को उन्हें सलाह देनी चाहिए कि वह उन मुद्दों पर ना बोलें जो उनकी जिम्मेदारी नहीं है। उन्हें यह भी बताया जाए कि नेपाल को धमकी देने वाले बयान की निंदा की जाएगी।”

इन तमाम घटनाओं को देखते हुए दोनों देशों को चाहिए कि वह अपने संबंधों को ज्यादा न बिगड़ने दें। भारत और नेपाल को चाहिए कि वे अपने तमाम विवाद आपस में मिल बैठकर हल कर लें। हिंसा और भड़काऊ बातें बने हुए रिश्तों को बिगाड़ सकती हैं और बिगड़े हुए रिश्तों को जलाकर खाक कर सकती हैं। दोनों देशों के डिप्लोमैट की यह कठिन परीक्षा है कि वे कैसे इस विवाद का हल निकाल पाते हैं। नेताओं और मीडिया को भी जज्बाती बनने और देशभक्ति से लबरेज़ उन्माद में बहने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इन सब से काम बनने के बजाय बिगड़ जाता है।

(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं। आप अपनी राय इन्हें debatingissues@gmail.com पर भेज सकते हैं।)

This post was last modified on June 13, 2020 9:17 am

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