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चौटाला जेल से बाहर आए, हरियाणा का राजनीतिक तापमान बढ़ा

नई दिल्ली। पूर्व मुख्यमंत्री और इनेलो सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला शुक्रवार को तिहाड़ जेल से बाहर आ गए। अब वो आज़ाद पंछी हैं। अगर वो राजनीतिक रूप से सक्रिय हुए तो हरियाणा में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। हरियाणा की राजनीति आने वाले दिनों में बहुत दिलचस्प होने जा रही है। भाजपा की सहयोगी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) में तोड़फोड़ हो सकती है या जेजेपी का इनेलो में विलय हो सकता है। 

कोरोना की वजह से वह जेल से पहले ही बाहर थे। जेबीटी शिक्षक भर्ती घोटाले में उनकी सजा 23 जून को ही पूरी हो चुकी थी। तिहाड़ जेल से उनकी रिहाई की औपचारिकता शुक्रवार को पूरी हो गई। वह सुबह ही तिहाड़ पहुंचे। एक फ़ॉर्म भरा और अपना सामान वग़ैरह वहाँ से लेकर गुड़गाँव अपने घर के लिए रवाना हो गए। उनके साथ एक लंबा क़ाफ़िला था।

जेल से बाहर आने के बाद चौटाला ने मीडिया से कहा कि वो पार्टी कार्यकर्ताओं की इच्छाओं के अनुरूप चलेंगे। हरियाणा की जनता के हितों के लिए मैं हर पाबंदी तोड़ दूँगा। 

जाट राजनीति प्रभावित होगी

हरियाणा में चार दशक से जाट-गैर जाट की राजनीति होती रही है। इस समय जाट राजनीति भूपेंद्र सिंह हुड्डा, ओमप्रकाश चौटाला और उनके पुत्र अभय चौटाला और पौत्र दुष्यंत चौटाला के इर्दगिर्द घूम रही है। पहले भजनलाल को और अब  हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को गैर जाट राजनीति के चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। 

इसी सोच के साथ राजनीति में नये चेहरे मनोहर लाल खट्टर पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्यमन्त्री बनाने का दांव खेला था। पहले टर्म में उनका यह दांव फिट भी बैठा। दूसरे टर्म यानि पिछले विधानसभा चुनाव में पर्याप्त सीटें नहीं जीतने के बावजूद मोदी और शाह ने मात्र ग़ैर जाट राजनीति का रुतबा बरकरार रखने के लिए खट्टर को लगातार दूसरी बार मुख्यमन्त्री बनाया। करनाल से विधायक बने मनोहर लाल को उत्तरी हरियाणा की उपेक्षा होने और साथ गैर जाट होने का फ़ायदा भी मिला।

अब प्रदेश की राजनीति में जाट वोटों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की होड़ मच गई है। जाट बिरादरी के लोगों का अधिकतर झुकाव भूपेन्द्र हुड्डा की तरफ होने के कारण इनेलो और जेजेपी नेता अक्सर हुड्डा को टरगेट कर अपनी राजनीतिक चालें चलते रहते हैं। 

कांग्रेस और इनैलो में होगा राजनीतिक युद्ध

अब ओमप्रकाश चौटाला की रिहाई के साथ ही कांग्रेस और इनेलो में राजनीतिक युद्ध शुरू होने की वजह भी यही गिनवाई जा रही है। हुड्डा ने कांग्रेस संगठन पर क़ब्ज़े के लिए मुहिम शुरू कर दी है। हुड्डा समर्थक विधायकों ने गुरूवार को दिल्ली में कांग्रेस के हरियाणा प्रभारी विवेक बंसल से मिलकर पार्टी संगठन के लचर होने का आरोप लगाया। यह अप्रत्यक्ष रूप से हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा पर हमला था। हुड्डा की इस मुहिम को चौटाला की सक्रियता से जोड़ा जा रहा है। हुड्डा ख़ेमे का मानना है कि चौटाला का सामना करने के लिए हमें अब पार्टी कैडर और संगठन की ज़रूरत पड़ेगी।

इनेलो के नेता हुड्डा पर चौटाला को जेल करवाने और भाजपा से साठगांठ के आरोप लगा कर हुड्डा के जनता में लगाव को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इसीलिए हुड्डा को संगठन की ज़रूरत पड़ रही है।

पिछले विधानसभा चुनाव में जाट मतदाता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस और इनेलो से टूट कर बनी दुष्यंत चौटाला की जेजेपी के बीच बंट गए थे।

पिछले दो चुनावों में क्या हुआ था

इनेलो को इससे तगड़ा नुकसान हुआ था, क्योंकि इनेलो के अधिकतर नेता एवं कार्यकर्ता जेजेपी के पाले में खड़े हो गए थे। इनेलो की हालत यह हो गई थी कि अभय चौटाला ही केवल विधानसभा पहुंच सके। जबकि 2014 में इनेलो ने अभय चौटाला के नेतृत्व में चुनाव लड़कर 19 सीटें जीतकर 24 फीसदी से अधिक मत हासिल किए थे और कांग्रेस 20 फीसदी से अधिक मत हासिल कर 15 सीटें जीती पाई थीं। भाजपा को 33 फीसदी से अधिक मत मिले थे और वह 47 सीटें लेकर मोदी नाम के सहारे सत्ता में आ गई थी।

तिहाड़ जेल के बाहर चौटाला।

भाजपा को 2019 के चुनाव में गैरजाटों का समर्थन मिला और वह पिछले चुनाव की अपेक्षा सवा तीन फीसदी की बढ़ोतरी कर 36 फीसदी से अधिक मत हासिल करने में सफल रही। यह बात अलग है कि उसकी सात सीटें घट गईं। फिर भी वह चालीस सीटें ले आई और दुष्यंत की जेजेपी के साथ उसने गठबंधन कर सरकार बना ली।

पिछले विधानसभा चुनाव में इनेलो के वोट बैंक से बहुत बड़ा हिस्सा जेजेपी के खाते में चले जाने से उसे 18 फीसदी वोट मिले व उसके दस विधायक जीते। इस चुनाव में सबसे अधिक फायदा कांग्रेस का हुआ। पिछले चुनाव की अपेक्षा उसका मत प्रतिशत सात फीसदी से भी अधिक बढ़कर 28 फीसदी के करीब पहुंच गया।

अब इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला के बाहर आने के बाद वह अपनी पूरी ताकत लगाने की रणनीति बना चुके हैं। इनेलो से जेजेपी में गए नेताओं व कार्यकर्ताओं की वापसी के साथ दूसरे दलों के नेताओं को इनेलो के पाले में खड़ा कर ओमप्रकाश चौटाला हरियाणा में फिर से इनेलो का डंका बजाने का प्रयास करेंगे। 

किस तरफ़ जाएगा जाट मतदाता

हरियाणा में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं लेकिन इनेलो अगर उसकी तैयारी शुरू करेगी तो बाक़ी दलों को भी जुटना पड़ेगा।

इनेलो को मजबूती मिलने से हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस के जाट वोट बैंक में भी सेंधमारी की सम्भावनाएं बढ़ गई हैं। जैसे इनेलो के वोट बैंक को जेजेपी नेता हड़प गए थे, वैसे ही अब दुष्यंत के वोट बैंक पर इनेलो डाका डालने का प्रयास करेगी। कांग्रेस के जो वोट ओमप्रकाश चौटाला के कारण इनेलो में शिफ्ट होंगे, उससे कांग्रेस की सीटें घट सकती हैं। जाट वोट से इनेलो को फायदा होने के साथ भाजपा को भी कुछ गैर जाट वोट बैंक जुड़ जाने से फायदा होने की उम्मीद है। इसी उम्मीद में भाजपा नेता हरियाणा में इनेलो की मजबूती में अपना फ़ायदा देख रहे हैं। देखना है कि हरियाणा में नये राजनीतिक समीकरण बदलने से किस को फायदा व नुकसान होगा, लेकिन ओमप्रकाश चौटाला की जेल से रिहाई से राजनीति गर्मी जरूरी बढ़ गई है।

क्या आज सचमुच दीवाली है

चौटाला का अतीत बहुत विवादास्पद रहा है। लेकिन आज जेल से रिहाई मिलने के बाद जब उनका क़ाफ़िला गुड़गाँव के लिए चला तो हज़ारों कार्यकर्ता और सैकड़ों गाड़ियाँ क़ाफ़िले में थीं। सोशल मीडिया पर हरियाणा से उन्हें लेकर सुखद प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोगों ने ट्वीट किया – हरियाणा में आज दीवाली है। कोई भी चौटाला के अतीत को याद करने को तैयार नहीं है।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

This post was last modified on July 2, 2021 2:24 pm

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