कॉर्पोरेट-हिंदुत्व की सांठगांठ को राष्ट्रहित का पर्याय बना दिया है मोदी-अडानी ने

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गौतम अडानी द्वारा अपने खिलाफ धोखाधड़ी के हिंडनबर्ग के आरोपों को भारतीय राष्ट्र पर हमला कहना एक महत्वपूर्ण मामला है। इस प्रकरण से ठीक पहले, मोदी पर बीबीसी के वृत्तचित्र को सरकार द्वारा औपनिवेशिक मानसिकता का उत्पाद करार दिया गया था और इसी आधार पर इसे भारतीय राष्ट्र पर हमला भी माना गया था। जिस तरह मोदी ने राष्ट्र से खुद की बराबरी कर डाली, वैसी ही बराबरी करने की हिम्मत अडानी नहीं कर पाये होते, जब तक कि उन्हें इस बात का यकीन नहीं होता कि मोदी इस तरह की तुलना से सहमत होंगे।

संक्षेप में, मोदी और अडानी दोनों अपने-अपने को और एक-दूसरे को राष्ट्र के अवतार के रूप में देखते हैं। मोदी-अडानी गठबंधन, जो कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठबंधन का मूल है, उनकी धारणा में यही राष्ट्र है। यह धारणा यहां तक ले जाती है कि मोदी का राजनीतिक रूप से सर्वोच्च बने रहना और अडानी का आर्थिक क्षेत्र में फलना-फूलना राष्ट्र की क़िस्मत के लिए जरूरी है। राष्ट्र इससे इतर किसी रास्ते पर चलने का खतरा मोल नहीं ले सकता!

वास्तव में मोदी की विचारधारा इसी उल्टे तर्क में निहित है। इसका मतलब है कि मोदी-अडानी की जोड़ी पर कभी भी अनैतिक या नियम-विरुद्ध काम करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि वे जो कुछ भी करते हैं, इस तर्क के अनुसार वह वास्तव में राष्ट्र के हित में होता है, और राष्ट्र का हित हमेशा सर्वोच्च होता है। केवल “राष्ट्र-विरोधियों” या “राष्ट्र के शत्रुओं” की निगाहों में वह राष्ट्रहित नहीं होता है।

इसलिए कभी भी मोदी-अडानी पर अनैतिकता या नियम-विरुद्ध आचरण का आरोप नहीं लगाया जा सकता। अडानी द्वारा राष्ट्रवाद की दुहाई देने को हिंडनबर्ग ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि अगर कोई धोखेबाज खुद को राष्ट्रवादी लबादे में छिपा लेता है तो धोखाधड़ी गायब नहीं हो जाती।

यदि राष्ट्रहित को किसी तरह स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ रूप से परिभाषित किया जाता तो यह बात सही होती, लेकिन यदि मोदी-अडानी की जोड़ी के हित को ही राष्ट्रहित मान लिया जाए, तो यह आरोप अपनी वैधता खो देता है। अडानी द्वारा अपने बचाव में दिया गया बयान उनकी खुद की राष्ट्र के रूप में इसी पहचान पर आधारित था।

मोदी सरकार की आर्थिक नीति के ऊपर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि यह जनता के प्रति पूरी तरह से कठोर और अपने “सांठगांठ वाले पूंजीपतियों” के हितों की सेवा करने के लिए पूरी तरह से समर्पित रहती है। यह आरोप सही भी है। इस बात की भी आलोचना होती रही है कि भारतीय स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम जैसे राष्ट्रीयकृत वित्तीय संस्थानों का खुलेआम इस्तेमाल एक निजी साम्राज्य के निर्माण की परियोजना को बढ़ावा देने के लिए किया गया है।

यह भी तथ्य है कि बड़ी पूंजी को टैक्स छूटें दी जाती रही हैं जबकि इस तरह की छूटों से हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई गरीबों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में कटौती करके की जाती रही है। यह स्पष्ट रूप से एक उच्चवर्ग-हिमायती नीति है जिसे बुर्जुआ सरकारें भी खुलेआम आगे बढ़ाने में संकोच महसूस करती हैं। इस तरफदारी के कारण ही इसे “क्रोनीवाद” यानि “सांठगांठ वाले पूंजीवाद” के रूप में देखा जाता है।

लेकिन इस “सांठगांठ वाले पूंजीवाद” में एक अंतर है। इस पर एक विचारधारा का लेबल लगाया गया है कि यह “राष्ट्र” के निर्माण में मदद कर रहा है (हालांकि वास्तव में इनका “राष्ट्र” केवल बहुसंख्यकों के नजरिये वाला राष्ट्र है)।

संक्षेप में, यह ऐसा “सांठगांठ वाला पूंजीवाद” है, जिसे एक (हिंदू) “राष्ट्र” के निर्माण के विचार का जल छिड़क कर पवित्र घोषित कर दिया गया है।

इसलिए मोदी सरकार के लिए “सांठगांठ वाला पूंजीवाद” वह नहीं है जो आमतौर पर समझा जाता है, जो कुछ चुने हुए और पसंदीदा पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का एक विकृत और अवैध प्रयास होता है, जिसे हर कोई मानता है कि गलत है लेकिन जो फिर भी इस वजह से चलता रहता है कि या तो कोई जवाबदेही नहीं निर्धारित हो पाती है या इसलिए कि यह काफी छिपे तौर पर होता है।

इसके विपरीत मोदी व्यवस्था के तहत “सांठगांठ वाले पूंजीवाद” को एक आर्थिक रणनीति का रुतबा दे दिया गया है और इसे “राष्ट्रीय हित” के रूप में आत्मविश्वास के साथ खुलेआम आगे बढ़ाया जा रहा है।

कुछ लोग हैरानी में यह विचार रखते हैं कि क्या दक्षिण कोरियाई सरकार द्वारा शायबोल्स को बढ़ावा देने की रणनीति से मोदी सरकार द्वारा अडानी और अंबानी को बढ़ावा देने की तुलना की जा सकती है (जैसा कि इतिहासकार एडम टूज़ ने ‘द वायर’ में किया है)?

हालांकि दोनों मामलों में एक बुनियादी अंतर है। युद्ध के बाद के जापान के मामले की ही तरह से दक्षिण कोरिया के मामले में भी सरकारी संस्थानों का एक पूरा नेटवर्क था जो एकाधिकार समूहों के साथ सहयोग कर रहा था। यह नेटवर्क इन एकाधिकार समूहों को निर्णय लेने में भी, और व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा करने में भी मदद कर रहा था।

संक्षेप में, यह एक संस्थागत व्यवस्था थी। जबकि भारत के मामले में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, बस सुप्रीमो और इस बिजनेस दिग्गज के बीच एक करीबी सांठगांठ है जो उसके लिए सारे दरवाजे खोल देती है।

भारत के मामले और नाजी जर्मनी के मामले में भी यही अंतर है। वहां भी सत्ताधारी दल के नेताओं और व्यापारिक घरानों के बीच घनिष्ठ सांठगांठ थी। लेकिन नाजी जर्मनी में भी युद्ध के दौरान, निश्चित रूप से, विभिन्न इकाइयों में उत्पादन को समन्वित किया जाना था और विशिष्ट लक्ष्यों को पूरा किया जाना था, जिसके लिए एक हद तक “योजनाएं” बनायी गयी थीं। ॉ

लेकिन  युद्ध से पहले तो वहां भी विभिन्न नाजी नेताओं की ऐसे अलग-अलग व्यावसायिक घरानों के साथ नजदीकियां थीं जिनके बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता थी। जिन नेताओं के साथ उनकी नजदीकियां थीं, उनके राजनीतिक प्रभाव खत्म होने के साथ उनसे जुड़े हुए व्यापारिक घराने भी लुप्त हो गए। लुचिनो विस्कॉन्टी की फिल्म ‘द डैम्ड’ में इस चीज को बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया है।

वहां का परिदृश्य भारत से बिल्कुल अलग था। यहां तो एक शीर्षस्थ नेता का एक विशेष व्यावसायिक घराने के साथ निर्विवाद रूप से घनिष्ठ गठजोड़ है जो इसकी बदौलत सनसनीखेज गति से बढ़ोत्तरी कर रहा है।

इस प्रकार, हालांकि राजनीतिक नेतृत्व और बड़ी कॉरपोरेट पूंजी के बीच घनिष्ठ गठजोड़ सभी फासीवादी सत्ताओं और फासीवादी रुझान वाली सरकारों की एक सामान्य विशेषता है, जिसके कारण माना जाता है कि मुसोलिनी ने फासीवाद को “राज्य और कॉर्पोरेट शक्ति के विलय” के रूप में परिभाषित किया था, फिर भी इस व्यापक तस्वीर के भीतर भारत का मामला अपनी तरह की एक विशिष्ट परिघटना का प्रतिनिधित्व करता है।

हालांकि पूंजीवाद को भी कुछ शीर्ष व्यावसायिक घरानों और राजनीतिक प्रभुत्वके आपसी गठजोड़ की तिकड़म द्वारा पूरा-पूरा अपने अधीन करके चलाते रहने की संभावना बहुत ज्यादा नहीं रहती। यदि पूंजीवाद को पूरी तरह से किसी एक देश के भीतर बंद किया जा सकता हो, तो यह तर्क दिया जा सकता है कि इस घेरेबंदी के दायरे में उस राजनेता और उस व्यावसायिक दिग्गज के गठजोड़ की हुकूमत पूंजीवाद के प्रवाह से बाधित हुए बिना बेरोकटोक चलती रह सकती है।

फिर भी पूंजीवाद की ऐसी बाड़ेबंदी यों भी हमेशा मुश्किल होती है, लेकिन एक वैश्वीकृत व्यवस्था से निपटने के दौरान तो यह बिल्कुल भी असंभव हो जाती है। वह बिजनेस दिग्गज खुद भी घरेलू अर्थव्यवस्था तक ही सीमित रहने के लिए अनिच्छुक रहता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में अन्य प्रतिस्पर्धियों की तुलना में दौड़ में पिछड़ जाने, और अंततः उनके द्वारा निगल लिए जाने का खतरा उसके ऊपर मंड़राता रहता है। और जिस क्षण उस राजनेता से निकटता के कारण घरेलू दायरे में ही सीमित रह गया वह दिग्गज अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में कदम रखने का उपक्रम करता है, उसकी व्यावसायिक गतिविधियों का विवरण अन्य दिग्गजों द्वारा करीबी पर्यवेक्षण के दायरे में आसानी से आ जाता है।

अब अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा प्रभावी हो जाती है, और पूंजीवादी व्यापार-नैतिकता के किसी भी उल्लंघन पर न केवल सबका ध्यान आकर्षित हो जाता है बल्कि दंडित किये जाने के लिए भी रास्ता खुल जाता है। इस तरह की नैतिकता के लिए किसी सम्मान के कारण ऐसा नहीं होता, बल्कि विभिन्न व्यापारिक दिग्गजों के बीच प्रतिद्वंद्विता के कारण ऐसा होता है। अडानी परिवार के साथ ठीक यही हुआ है।

इस व्यापार घराने को राज्य का समर्थन देकर बचाया जा सकता है। हालांकि ऐसा समर्थन भी उस समय मुश्किल हो जाता है जब उस व्यापारिक घराने के मामले अंतरराष्ट्रीय “राय” की चकाचौंध के अधीन होते हैं। यह कठिनाई तब बहुत बढ़ जाती है जब किसी देश की अर्थव्यवस्था को अपने भुगतान संतुलन का प्रबंधन करने के लिए पर्याप्त मात्रा में विदेशी वित्तीय प्रवाह की आवश्यकता होती है।

जब विदेशी वित्तीय निवेशक यह देखते हैं कि किसी देश की नियामक संस्थाएं धोखाधड़ी पूर्वक धन इकट्ठा करने वालों को रोकने और दंडित करने में अक्षम हैं तो वे निवेश करने से डरने लगते हैं इससे देश में आने वाला वित्तीय प्रवाह सूखने लगता है।

लेकिन अगर यह कारोबारी घराना टिक भी जाता है तो मोदी सरकार का अहंकार चला जाएगा। अडानी साम्राज्य के मामलों की जांच शुरू नहीं करना असंभव होगा, क्योंकि यह वैश्विक वित्तीय हलकों में विश्वसनीयता पर पूरी तरह से बट्टा लगा देने वाला क़दम होगा।

इसी तरह, ऐसी जांच जो अडानी को शुद्ध और बिल्कुल साफ-पाक साबित करेगी, उसकी भी वैश्विक वित्तीय हलकों में कोई विश्वसनीयता नहीं होगी। इसलिए अडानी बंधुओं को कुछ न कुछ दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा चाहे वह कितनी भी हल्की क्यों न हो।

जब “क्रोनी, यानि सांठगांठ वाले पूंजीपति” को दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, तो “बॉस” को उस विशेष क्रोनी के साथ संबंध को उसी तरह जारी रख पाना मुश्किल हो जाता है। साथ ही सरकार के लिए अब यह दावा करना भी मुश्किल होगा कि मोदी-अडानी गठबंधन द्वारा, यानि कि इस कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठबंधन द्वारा “राष्ट्र” की अच्छी तरह से सेवा की जा रही है।

यह पूरा प्रकरण पूंजी के वैश्वीकरण और राष्ट्र-राज्य (चाहे वह हिंदू राष्ट्र ही क्यों न हो) की किसी भी अवधारणा के बीच के विरोधाभास की एक खास अभिव्यक्ति रहा है। यह विरोधाभास इसलिए नहीं पैदा होता है कि वैश्वीकरण कोई सुधारात्मक प्रक्रिया है जो किसी गलत काम को सहन नहीं करती है, बल्कि यह इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि वैश्वीकरण के तहत पूंजियों के बीच की प्रतिस्पर्धा एक ऐसे स्तर पर होती है जहां कोई भी राष्ट्र-राज्य इसकी अवज्ञा नहीं कर सकता है।

( प्रभात पटनायक के लेख “क्रोनी कैपिटलिज्म” ऐज ऐन इकोनॉमिक स्ट्रेटेजी” का हिंदी अनुवाद। अनुवाद: शैलेश। एमआरऑनलाइन.ओआरजी और पीपुल्स डेमोक्रेसी से साभार। प्रभात पटनायक एक मार्क्सवादी अर्थशास्त्री और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। उन्होंने 1974 से 2010 में अपनी सेवानिवृत्ति तक, नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज’ में ‘सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग’ में अध्यापन किया है। )

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