Friday, April 19, 2024

25 नवंबर 2023 को महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया अध्याय लिखते-लिखते रह गया

नई दिल्ली। यह अवसर था वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) के द्वारा मुंबई में ‘संविधान सम्मान महासभा’ का, जिसके लिए वीबीए प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी को सम्मेलन में आने के लिए आमंत्रण भेजा था। यह घटना भले ही एक सामान्य औपचारिकता एवं शिष्टाचार की बात लग सकती है, लेकिन इससे महाराष्ट्र की राजनीति ही नहीं बल्कि समूचे उत्तर भारत में भी राजनीति के एक नई करवट लेने के सूत्रपात के तौर पर लिया जा सकता था।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले से जब यह सवाल एक मराठी चैनल के संवाददाता ने पूछा तो उनका कहना था कि राहुल गांधी इस समय तेलंगाना चुनावों में व्यस्त होने के कारण आने में असमर्थ हैं। उनकी जगह पर मैं इस महासभा में शामिल होने के लिए तैयार हूं।

बता दें कि वंचित बहुजन अघाड़ी का महाविकास अघाड़ी के घटक दल शिवसेना (उद्धव) के साथ पहले से तारतम्य है, लेकिन पार्टी को अभी तक इंडिया गठबंधन में स्थान नहीं मिल सका है। इसके लिए पिछले दिनों प्रकाश आंबेडकर की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखा गया था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलने के कारण वीबीए में असंतोष और एक बार फिर से स्वंतत्र चुनाव लड़ने का जोर पड़ने लगा है।

दो दिन पहले, मंगलवार को एक बार फिर वंचित बहुजन अघाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर ने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) को जल्द से जल्द सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप देने के लिए अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वीबीए सभी 48 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है।

2019 में एक दर्जन सीटों पर वंचित अघाड़ी ने विपक्ष को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी

2019 के लोकसभा चुनावों में वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) और एआईएमआईएम गठबंधन ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा प्रभाव उत्पन्न किया था। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के प्रपौत्र, प्रकाश आंबेडकर ने ऐन चुनावों से पूर्व अकोला सहित कुछ संसदीय सीटों पर चुनाव लड़ने की परंपरा को तोड़ते हुए, पूरे महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने का फैसला किया, और इसके लिए उन्होंने कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठजोड़ करने से बेहतर ओवैसी की पार्टी से नाता जोड़ना बेहतर समझा।

2019 के चुनावों में पार्टी को कोई सफलता हाथ नहीं लगी, जबकि एआईएमआईएम के हाथ औरंगाबाद सीट आई थी। लेकिन वीबीए ने यूपीए घटक दलों को बड़ा भारी नुकसान पहुंचाया था।

महाराष्ट्र में 2019 में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 8 करोड़ 87 लाख थी, जिसमें से 5.36 लाख लोग मतदान में शामिल हुए थे। सीटों के लिहाज से उत्तर प्रदेश के बाद यदि दूसरे स्थान पर कोई राज्य सबसे महत्वपूर्ण है, तो वह है महाराष्ट्र, जहां से 48 सांसद चुने जाने हैं। अर्थात, गुजरात और केरल जैसे दो राज्यों के बराबर लोकसभा सांसद अकेले महाराष्ट्र चुनकर भेजता है।

2019 के बाद जिन राज्यों में समीकरण काफी हद तक बदल गये थे, उनमें से एक राज्य महाराष्ट्र भी है। यही वजह है कि राज्य में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा-शिवसेना गठबंधन तोड़कर उद्धव ठाकरे ने जब कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाने का फैसला लिया तो भाजपा के लिए आगे की राह काफी मुश्किल हो गई।

इसी असंतुलन को साधने के लिए पहले चरण में शिवसेना में विभाजन कर उद्धव ठाकरे की सरकार गिराई गई, और इनाम के तौर पर राज्य की बागडोर शिवसेना-शिंदे गुट को दे दी गई। लेकिन तमाम सर्वेक्षण बता रहे थे कि अभी भी शक्ति संतुलन बड़े पैमाने पर महाविकास अघाड़ी के पक्ष में ही झुका हुआ है, और महाराष्ट्र से 2024 का गणित बिगड़ सकता है।

इसलिए शिवसेना के बाद अबकी बार एनसीपी में सेंधमारी की बारी थी। शिवसेना की तुलना में एनसीपी नेतृत्व अभी तक खुद को संभालने की स्थिति में नहीं है। दूसरा, दो-दो विभाजन की मार झेलकर महाविकास अघाड़ी निश्चित रूप से कमजोर स्थिति में है।

ऐसे में कांग्रेस, जिसके बारे में कहा जाता था कि उनकी पार्टी के नेता सबसे आसानी से भाजपा में प्रविष्ठ हो जाते हैं, राज्य में अपवाद बनी हुई है। इसका फायदा उन्हें 2024 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे में मिल सकता है।

2019 के आम चुनावों में विभिन्न पार्टियों को हासिल मत प्रतिशत और सीटें बेहद दिलचस्प आंकड़े पेश करते हैं। मसलन भाजपा के खाते में 1.49 करोड़ मत के साथ लोकसभा की 23 सीटें आई थीं, जबकि शिवसेना 1.26 करोड़ वोट के साथ 18 सीटों पर काबिज होने में सफल रही थी। इसका अर्थ है कुल 48 सीटों में से 41 सीटों पर एनडीए गठबंधन का कब्जा था।

आइये देखते हैं कि विपक्ष के हिस्से में क्या आया था? एनसीपी के खाते में 4 सीटें आई थीं, जबकि उसके पक्ष में 83.87 लाख मत प्राप्त हुए थे, और इस प्रकार उसे 15.66% वोट हासिल करने में सफलता प्राप्त हुई थी। इसके उलट कांग्रेस को एनसीपी से अधिक 87.92 लाख वोट प्राप्त होने के बावजूद सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा था।

दूसरी तरफ एआईएमआईएम को भी एक सीट पर कामयाबी हासिल हुई थी, लेकिन मात्र 0.73% वोट और 3.89 लाख मत हासिल कर उसे यह कामयाबी प्राप्त हो गई थी। इसे हाल ही में मिजोरम विधानसभा चुनाव में भी देखा गया, जिसमें तकरीबन 5% मत हासिल कर भाजपा ने 20% वोट वाली कांग्रेस के 1 सीट की तुलना में 2 सीटें जीतने में कामयाब रही है।

ऐसे में प्रकाश आंबेडकर की पार्टी वीबीए की भूमिका बेहद अहम हो जाती है, 2019 के लोकसभा चुनावों में वंचित बहुजन अघाड़ी ने अपने प्रदर्शन से सभी को हैरान कर दिया, जब उसके खाते में 37.43 लाख से अधिक वोट प्राप्त हुए थे। उसे इस चुनाव में 6.99% वोट हासिल हुए थे, जो किसी भी लिहाज से अच्छी खासी संख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं।

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि पार्टी एक भी लोकसभा की सीट जीत पाने में नाकामयाब रही। लेकिन इसके साथ ही वीबीए खुद तो कोई सीट नहीं ही जीत पाई, किंतु उसने कांग्रेस-एनसीपी को भी दर्जनों सीटों पर जबर्दस्त चोट पहुंचाकर भाजपा-शिवसेना के उम्मीदवारों के लिए राह आसान जरूर करने का काम कर दिया था।  

महाराष्ट्र की 48 में से 47 सीटों पर इसके द्वारा अपने उम्मीदवार खड़े किये गये थे। कम से कम 17 सीटों पर वंचित बहुजन अघाड़ी के उम्मीदवारों को 80,000 या उससे अधिक मत प्राप्त हुए थे। अकोला संसदीय सीट पर दो बार जीत दर्ज कर चुके प्रकाश आंबेडकर को दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा था।

“जय भीम-जय मीम’ के नारे के साथ पहली बार 2019 में यह गठबंधन भले ही एक सीट जीतने में कामयाब रहा हो, लेकिन इसने तुलनात्मक रूप से बेहद कम प्रचार के बावजूद महाराष्ट्र की राजनीति पर अपना गहरा असर डाला था। कारवां पत्रिका में अप्रैल 2019 में नेयाज फारुखी ने गठबंधन का विश्लेषण करते हुए इसे दलितों एवं अल्पसंख्यकों के एकजुट होने के कदम के रूप में दर्शाया था। हालांकि यह गठबंधन आगे जारी नहीं रह सका।

चुनावों के दौरान इस गठबंधन को भाजपा-आरएसएस की बी टीम तक कहा गया, और यदि चुनाव परिणामों को देखें तो यह आरोप काफी हद तक सटीक भी बैठता है। वीबीए के उम्मीदवारों ने नांदेड़, सोलापुर, हत्कानंगले, बीड, परभनी, यवतमाल, गढ़चिरोली-चिमूर, सांगली लोकसभा सीटों पर विपक्षी मतों में विभाजन कर भाजपा गठबंधन के लिए जीत की राह आसान करने का ही काम किया था।

ये वे सीटें हैं जिनमें वीबीए तीसरे स्थान पर रहीं। कई सीटों पर वीबीए के द्वारा डॉक्टर, शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुनावी मैदान में उतारकर प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं के लिए असमंजस की स्थिति उत्पन्न कर दी थी। 

प्रकाश आंबेडकर ने इस चुनाव में दो सीटों पर लड़ने का फैसला किया, इसमें अकोला उनका पुराना गढ़ था। लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में वे यह सीट हार गये और उन्हें 2,78,241 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। कांग्रेस पार्टी के हिदायतुल्ला बरकतउल्ला पटेल तीसरे स्थान पर रहे, जबकि भाजपा के संजय धोत्रे को जीत हासिल हुई थी।

इसी प्रकार सोलापुर में करीब 1.69 लाख से अधिक वोट पाकर प्रकाश आंबेडकर तीसरे स्थान पर रहे। भाजपा के जय सिधेश्वर ने इस सीट पर जीत दर्ज की जबकि कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्य मंत्री सुशील कुमार शिंदे दूसरे स्थान पर रहे। भाजपा उम्मीदवार एवं शिंदे के बीच हार का अंतर 1.57 लाख का था, जो कि आंबेडकर को हासिल मतों से कम बैठता है। 

इसी प्रकार एक और कांग्रेस के नेता और प्रदेश के मुखिया होने के साथ-साथ पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान भी भाजपा उम्मीदवार से मात्र 40,000 मतों के अंतर से अपनी सीट गंवा बैठे थे। इस सीट पर वीबीए के उम्मीदवार को तकरीबन 1.65 लाख वोट हासिल हुए थे। 

इसके अलावा शेतकरी संगठना के अध्यक्ष राजू शेट्टी को भी हत्कांगले सीट पर वंचित अघाड़ी उम्मीदवार के चलते भाजपा के उम्मीदवार से 95,500 मतों के अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा था, क्योंकि वीबीए उम्मीदवार को इस सीट पर भी करीब 10% वोट हासिल हुए थे।

शेतकारी को इसी प्रकार सांगली सीट पर भी वीबीए के कारण भाजपा से शिकस्त का सामना करना पड़ा था। इस सीट पर वीबीए के गोपीचंद पड़ालकर को 2.97 लाख (25.13%) वोट प्राप्त हुए थे। हिंगोली सीट पर कांग्रेस को शिव सेना से मात मिली, वहीँ इस सीट पर वीबीए उम्मीदवार मोहन राठोड़ को 1.73 लाख से अधिक वोट हासिल हुए थे।

इसी प्रकार बीड, ओस्मनाबाद, परभनीम यवतमाल एवं बुल्धाना में भी वीबीए ने बड़ी संख्या में अपने पक्ष में विपक्षी मतों का विभाजन कर भाजपा-शिवसेना की राह को काफी हद तक आसान बना दिया था। वीबीए-एआईएमआईएम गठबंधन को जिस एकमात्र सीट पर जीत दर्ज हुई, वह थी औरंगाबाद जहां पर एआईएमआईएम के इम्तियाज जलील ने शिव सेना सासंद चंद्रकांत खैरे को 5,025 मतों के अंतर से हराकर गठबंधन की झोली में जीत डालने का काम किया था।

महाराष्ट्र विधानसभा की 25 सीटों पर वीबीए ने निर्णायक भूमिका अदा की थी

2019 में जब विधानसभा चुनाव की बारी आई तो उसमें भी वंचित बहुजन अघाड़ी ने बड़ी संख्या में अपने उम्मीदवार उतारे। 235 सीटों पर अकेले दम पर चुनाव लड़कर पार्टी एक भी सीट अपने नाम नहीं कर पाई, लेकिन तमाम विश्लेषणों से पता चलता है कि इस चुनाव में भी कम से कम 25 सीटें ऐसी थीं, जिसपर वीबीए उम्मीदवारों ने निर्णायक भूमिका अदा कर कांग्रेस-एनसीपी को एक बार फिर हराने में अपनी भूमिका निभाई थी।

16 सीटों पर जिसमें कांग्रेस के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे, उन सीटों पर भाजपा-शिवसेना बनाम कांग्रेस के बीच जीत का जितना अंतर था, उससे अधिक वोट वंचित बहुजन अघाड़ी के उम्मीदवारों को प्राप्त हुए थे।

इसी प्रकार 9 सीटों पर यही काम वीबीए ने एनसीपी को हराने में किया था। इसके बावजूद वीबीए को एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हो पाई। अकोला वेस्ट, अकोट, बालापुर, बुल्ढाना, कलमनुरी, लोहा, मुरिजापुर, सोलापुर सिटी नॉर्थ सहित वाशिम विधानसभा की 9 सीटों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही।

प्रकाश आंबेडकर को भी राजनीतिक संघर्ष और चुनावी राजनीति में निश्चित ही अब यह आभास हो गया होगा कि इस लड़ाई में एकला चलो की नीति बहुत आगे नहीं ले जाने वाली है। कांग्रेस पार्टी ने भारत जोड़ो यात्रा के बाद से ही ऐसे तमाम संगठनों को स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वह अपने अभी तक के ट्रैक को छोड़ एक नई राह अपनाने और ज्यादा लोकतांत्रिक होने की ओर बढ़ रही है।

पिछले कुछ महीनों से राहुल गांधी-मल्लिकार्जुन खड़गे के जाति-सर्वेक्षण की मांग के साथ-साथ कर्नाटक की जीत ने इस अहसास को और भी मजबूत किया है। ऐसे में प्रकाश आंबेडकर के निमंत्रण को स्वीकार करने पर एक नए अध्याय का सूत्रपात किया जा सकता था।

लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस को अभी भी इसको लेकर लंबा रास्ता तय करना बाकी है। केंद्र में काफी हद तक तस्वीर साफ़ हो चुकी है, लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों के हाथों में आज भी संगठन पर मजबूत पकड़ इसमें बाधा बनी रहने वाली है।  

(रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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