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एक नशेड़ी अभिनेता की लाश पर चुनावी रोटियां सेंकने की तैयारी

बिहार का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बाढ़ से उपजी समस्याओं से जूझ रहा है। वहां कोरोना का संक्रमण तेजी फैलना जारी है, जबकि उसका मुकाबला करने में राज्य सरकार पूरी तरह नाकाम साबित हो चुकी है। सूबे में पहले से ही बने हुए रोजगार के संकट को लाखों प्रवासी मजदूरों की वापसी ने और ज्यादा गहरा कर दिया है। सूबे की आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन नसीब नहीं हो रहा है।

लेकिन ये सारी समस्याएं किसी भी राजनीतिक दल की चिंता के दायरे में नहीं हैं, खासकर सत्तारूढ़ जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी की चिंता के दायरे में तो कतई नहीं। सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए इस समय सबसे अहम मुद्दा है उस अभिनेता सुशांत राजपूत की मौत, जिसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की जांच में नशीले पदार्थों के सेवन का आदी करार दिया जा चुका है।

बिहार में चुनाव की घड़ी नजदीक आ गई है। हालांकि चुनाव आयोग की ओर से अभी औपचारिक तौर पर चुनाव का ऐलान नहीं हुआ है लेकिन राजनीतिक दलों की चुनावी गतिविधियां तेज हो गई हैं। सूबे की गठबंधन सरकार में साझेदार और भाजपा ने सुशांत सिंह राजपूत की तस्वीर के साथ एक पोस्टर तैयार किया है, जिसका शीर्षक है- ”जस्टिस फॉर सुशांत: ना भूले हैं ना भूलने देंगे!’’ इस पोस्टर पर सुशांत की तस्वीर के साथ ही भाजपा का चुनाव चिन्ह भी अंकित है। पोस्टर के अलावा वाहनों पर लगाने के लिए भी इसी तरह के स्टिकर और घर-घर बांटने के लिए पर्चे तैयार किए गए हैं। यही नहीं, इस अभिनेता की मौत की जांच को लेकर महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देने वाली अभिनेत्री कंगना राणावत को भी भाजपा ने हाथों हाथ ले लिया है।

कंगना ने जैसे ही मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से करते हुए अपनी जान को खतरा बताया, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बगैर देरी किए उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करा दी। जाहिर है कि भाजपा बिहार के चुनाव में एक नशेड़ी अभिनेता की मौत को क्षेत्रीय और जातीय अस्मिता का मुद्दा बनाकर भुनाएगी और वाई श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त वह अभिनेत्री उसकी स्टार प्रचारक होगी, जो खुद भी नशीले पदार्थों का सेवन करते रहने की बात कुबूल कर चुकी है।

भाजपा की यह रणनीति उसके सहयोगी और बिहार में सरकार का नेतृत्व कर रहे जनता दल (यू) को भी रास आ रही है, क्योंकि सुशांत की मौत के शोर में बिहार के तमाम बुनियादी मुद्दे दब गए हैं। वैसे भी चुनाव में लोगों को उपलब्धि के नाम पर दिखाने के लिए उसके पास भी कुछ ठोस नहीं है। राज्य सरकार कोरोना महामारी से निबटने में पूरी तरह नाकाम रही है, जिसकी वजह से संक्रमण तेजी से बढ़ता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न महानगरों और बड़े शहरों से लौटे करीब 50 लाख प्रवासी मजदूरों ने सूबे में पहले से ही जारी रोजगार के संकट को बेहद गंभीर बना दिया है, जिससे निबटने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है।

राज्य की आबादी के एक बड़े हिस्से को बाढ़ ने हर साल की तरह इस साल भी तबाह किया है। लाखों लोग बेघर हो गए हैं, उनकी खेतीबाड़ी और मकान बर्बाद हो गए हैं। हालात अभी भी सामान्य नहीं हुए हैं। सूबे की कानून व्यवस्था की स्थिति दिन ब दिन बदतर होती जा रही है।

लेकिन इन तमाम अहम और बुनियादी सवालों की न तो सत्तारूढ़ गठबंधन के दोनों दलों को फिक्र है और न ही विपक्षी दलों को। सभी जी जान से सुशांत राजपूत के परिवार को इंसाफ दिलाने में जुटे हैं। हर कोई सुशांत राजपूत को बिहार का बेटा बता कर बिहारी अस्मिता की रक्षा के लिए ताल ठोक रहा है। यह सब हो रहा है बिहार के 5.2 फीसद राजपूत वोटों और अन्य सवर्ण तबकों के युवाओं के वोटों की खातिर जो सुशांत को सिर्फ फिल्मी पर्दे का नहीं बल्कि अपनी असल जिंदगी का भी हीरो मानते थे।

यहां यह बता देना भी लाजिमी होगा कि बिहार में 17 फीसद सवर्ण मतदाताओं में 5.2 फीसद हिस्सा राजपूत समुदाय का है। बिहार की जाति आधारित राजनीति में भूमिहार और राजपूत कभी भी साथ नहीं रहते हैं। चूंकि भूमिहार समुदाय पारंपरिक रूप से भाजपा से जुड़ा है, इसलिए राजपूत समुदाय का समर्थन हर चुनाव में आम तौर पर राष्ट्रीय जनता दल को मिलता है। इसी वजह से राष्ट्रीय जनता दल भी यह दावा कर रहा है कि सुशांत सिंह के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए उनकी पार्टी ही सबसे पहले सड़कों पर उतरी और उसकी वजह से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा नेताओं की नींद खुली और उन्होंने मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की। भाजपा और नीतीश कुमार की रणनीति भी इसी बहाने राजपूत समुदाय को राष्ट्रीय जनता दल के पाले से खींच कर अपने साथ जोड़ने की है।

केंद्र सरकार और भाजपा तो सुशांत की मौत को अपने लिए राजनीतिक लाभ के दोहरे अवसर के रूप में देख रही हैं। उसे बिहार में तो इसका चुनावी लाभ लेना ही है, साथ ही वह सुशांत की मौत की जांच के मुद्दे को महाराष्ट्र सरकार को नीचा दिखाने और उसे जलील करने के अवसर के तौर पर भी देख रही हैं। इसीलिए पहले तो सुशांत के परिजनों की मांग पर बिहार पुलिस से मामले की एफआईआर पटना में दर्ज करवाई गई और फिर बिहार सरकार की सिफारिश पर पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंप दी।

केंद्र सरकार के इस फैसले को सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती और महाराष्ट्र सरकार ने इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी कि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय होता है, इसलिए बिहार सरकार की सिफारिश पर इस मामले की जांच सीबीआई को नहीं सौंपी जा सकती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण सवाल को आश्चर्यजनक रूप से नजरअंदाज करते केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराया और ‘सत्यमेव जयते’ कहते हुए उम्मीद जताई कि सीबीआई की जांच से सच सामने आएगा।

केंद्र सरकार ने सीबीआई के साथ ही प्रवर्तन निदेशालय, आयकर और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो आदि अपनी तमाम एजेंसियों को भी सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के पीछे लगा दिया। केंद्र सरकार के भोंपू बने हुए तमाम टीवी चैनल भी भूखे कुत्तों की तरह महाराष्ट्र सरकार को जलील करने और रिया चक्रवर्ती को नोंचने में लग गए।

सीबीआई के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी यह हैरानी की बात रही कि आखिर उनकी ऐसी कौन सी पुण्याई है, जो केंद्र सरकार, बिहार सरकार, सुशांत के परिजन, सुप्रीम कोर्ट, मीडिया आदि सभी सीबीआई से इंसाफ की उम्मीद कर रहे हैं। वाकई सीबीआई के लिए यह ऐतिहासिक अवसर है, जब एक साथ इतने लोग उससे इंसाफ की आस लगाए हुए हैं।

इससे पहले कभी ऐसा नहीं सुना गया कि इतनी संख्या में लोग कहें कि सीबीआई को जांच सौंपने का मतलब इंसाफ मिलना है। इस मामले में तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद तक ने मीडिया से कहा कि सीबीआई को जांच सौंपने का औचित्य सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भी साबित हो गया है और सुशांत के परिजनों, उसके चाहने वालों और हम सबको यकीन है कि अब इस मामले में न्याय होगा।

जिस सीबीआई का इस्तेमाल सरकारें अपने राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए करती हैं, जिस सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने ही सरकार का तोता करार दिया हो, जिस सीबीआई का रिकॉर्ड आमतौर पर मामलों पर लीपापोती करने का ही रहा है, उस सीबीआई से सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय कानून मंत्री, मुख्यमंत्री, मीडिया और तमाम दूसरे लोग अगर न्याय मिलने की उम्मीद करें तो सीबीआई के अधिकारियों के लिए इससे बड़ी और क्या गर्व की बात हो सकती है!

लेकिन गौरतलब है कि जिन मामलों में सीबीआई को पहले से अपराधी नहीं मिले होते हैं, उनकी जांच में आमतौर पर वह नाकाम होती हैं। इस सिलसिले में नरेंद्र दाभोलकर और आरुषि हत्याकांड को याद किया जा सकता है, जिनके गुनहगारों का आज तक पता नहीं चल पाया है। जेएनयू के लापता छात्र नजीब के मामले की जांच दो साल तक करने के बाद भी सीबीआई के हाथ कुछ नहीं लगा है। नजीब आज तक लापता है। बिहार के मुजफ्फरपुर में मासूम बच्ची नवारुणा चक्रवर्ती के लापता होने की जांच भी सीबीआई कई वर्षों से कर रही है। ऐसे अनगिनत मामले हैं, जिनकी जांच सालों से चल रही है और ये मामले ऐसे हैं जिनमें अपराधी पहले से पता नहीं हैं।

चूंकि सुशांत मामले में जांच शुरू करने से पहले ही सीबीआई को मामले का ‘गुनहगार’ मिल गया है, इसलिए अब उसे ज्यादा कुछ नहीं करना होगा। उसे तो अब सिर्फ उस ‘गुनहगार’ के खिलाफ ‘सबूत’ जुटाना (तैयार करना) है, ताकि सुशांत के परिजनों तथा कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की ‘न्याय’ पाने की सामूहिक इच्छा को संतुष्ट किया जा सके। मीडिया ट्रायल के जरिए यह नैरेटिव बना दिया गया है कि सुशांत को या तो आत्महत्या के लिए उकसाया गया है या फिर उसकी हत्या की गई है। रिया चक्रवर्ती को अपराधी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि पहली नजर में उसके खिलाफ न तो हत्या का मामला बनता है और न ही आत्महत्या के लिए उकसाने का।

सीबीआई को मामले की जांच शुरू करे तीन सप्ताह हो गए हैं लेकिन अभी तक वह भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है। वैसे भी आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों की जांच के बाद सजा दिलाने में भी सीबीआई का रिकॉर्ड जीरो है। इनकम टैक्स और ईडी को भी रिया चक्रवर्ती के खिलाफ कुछ नहीं मिला है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने जरूर पहले रिया के भाई को फिर रिया को ड्रग खरीदने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया है।

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के फैसले को जायज ठहराने वाला फैसला दिया था, उसी दिन फैसले के तुरंत बाद भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने ट्वीट किया था- ”पहले महाराष्ट्र सरकार सो ‘रिया’ था, संजय राउत सुशांत के परिवार को धो ‘रिया’ था, अब मुंबई में सरकार रो ‘रिया’ है और दोस्तों जल्दी ही सुनेंगे कि महाराष्ट्र सरकार जा ‘रिया’ है।’’

केंद्र और बिहार में सत्तारूढ पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता का यह बेहद नफरत भरा और स्तरहीन ट्वीट यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सुशांत मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के पीछे क्या मकसद है, सीबीआई से न्याय की उम्मीद क्यों जताई गई है और बिहार चुनाव में इस पूरे मामले को किस तरह भुनाया जाएगा। अगर सीबीआई न्याय चाहने वालों की अपेक्षा के अनुरूप निष्कर्ष पर पहुंचने में नाकाम रहती है, तो उस स्थिति में इस मामले को चुनाव तक इसी तरह लटका कर ‘न्याय’ दिलाने का माहौल बनाया जाएगा।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 11, 2020 2:11 pm

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