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सिंगूर की बलिबेदी पर चढ़ गए युवाओं के सपने

सिंगूर (पश्चिम बंगाल)। पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से सिंगूर भी एक है। अब यह बात दीगर है कि सिंगूर को पूरे देश के लोग जानते हैं। क्योंकि सिंगूर सूर्योदय के साथ ही सूर्यास्त हो जाने की एक दास्तान है। सिंगूर 90 के दशक में माकपा की सोच में आई बदलाव का एक दस्तावेज है। सिंगूर राजनीति की बेदी पर युवाओं के सपने का बलि चढ़ जाने का एक इतिहास है। साथ ही हुक्मरानों के लिए एक सीख भी है कि आम लोगों के भले के लिए किए जाने वाले कार्य उन्हें साथ लेकर और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करके ही किया जा सकता है। सिंगूर बंगाल में लाल दुर्ग के ढह जाने की एक कहानी भी है।

पश्चिम बंगाल में 1977 में जब वाममोर्चा की सरकार बनी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने भूमि सुधार कानून को लागू किया। पूरे देश में पहली बार बरगादारो, बटाई पर खेती करने वाले, का नाम जमीन के पट्टे पर चढ़ गया। इस तरह वाम मोर्चा सरकार की जमीन पुख्ता हो गई। इसके बाद जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने माकपा की सोच में आए बदलाव का मसीहा बन गए। वे समझ गए कि बंगाल में पार्टी को सरकार में बने रहने के लिए नौजवानों को रोजगार भी देना पड़ेगा। इसीलिए उन्होंने नारा दिया कि कृषि हमारा आधार है और उद्योग हमारा भविष्य है। उन्होंने नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने के लिए जमीन का अधिग्रहण किया। लेकिन बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी इस नई सोच में उन किसानों को भागीदार नहीं बना पाए जिनकी जमीन अधिग्रहण की जानी थी।

इसे उन्होंने क्षेत्रीय नेताओं पर छोड़ दिया। यह इन नेताओं का अहंकार ही था कि उन्होंने किसानों से बात किए बगैर भूमि अधिग्रहण किए जाने का फरमान जारी कर दिया। लिहाजा इसके खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया और पुलिस फायरिंग में 8 लोग मारे गए। केमिकल हब बनाए जाने की परियोजना की बलि चढ़ गई। इसके बावजूद बुद्धदेव का हौसला पस्त नहीं हुआ। उन्होंने सिंगूर में टाटा को नैनो कार बनाने का कारखाना लगाने के लिए राजी कर लिया। इसके लिए जमीन अधिग्रहण करने के बाद कारखाने के निर्माण कार्य भी काफी हद तक पूरा हो गया। बहुत सारी मशीनें भी लग गईं और कई सेड बनाने का निर्माण कार्य पूरा हो गया। युवाओं का चयन करके उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण देने का कार्य भी शुरू हो गया। इसके बाद किसानों के एक छोटे से गुट ने आंदोलन शुरू कर दिया और हालात इस कदर बिगड़ गए कि टाटा ने सिंगूर छोड़कर जाने का एलान कर दिया। इसके साथ ही बंगाल के औद्योगीकरण और युवाओं का रोजगार पाने का सपना बिखर गया।

यह स्थिति दो कारणों से बनी। पहला 30 साल तक सत्ता में बने रहने के कारण हुक्मरान तानाशाह बन गए थे। क्षेत्र के बाहुबली नेताओं ने जमीन अधिग्रहण किए जाने का ऐलान कर दिया और जमीन अधिग्रहित कर भी ली गई। दूसरा किसानों को विश्वास में नहीं लिया गया और वह आंदोलन पर उतर आए। इधर तृणमूल कांग्रेस को सत्ता में आने की बेचैनी थी और उन्होंने किसानों के इस आंदोलन को लपक लिया। तत्कालीन राज्यपाल राजमोहन गांधी का सुलह कराने का सारा प्रयास विफल रहा। नतीजतन टाटा ने बंगाल छोड़कर जाने का ऐलान कर दिया, इसके बाद चुनाव में बंगाल का लाल दुर्ग भी बिखर गया और युवाओं का रोजगार पाने का सपना भी ध्वस्त हो गया।

आइए अब नजर डालते हैं सिंगूर की उस जमीन पर जो युवाओं के सपनों का कब्रगाह बन कर रह गई है।  दुर्गापुर एक्सप्रेस हाईवे पर सोनापाड़ा और जयगोला के बीच में सैकड़ों एकड़ जमीन टाटा के इस कारखाने के लिए अधिग्रहित की गई थी। अब इस बंजर जमीन पर टाटा द्वारा बनाई गई चहरदीवारी के अलावा और कुछ नहीं बचा है। यहां बनाई गई इमारतें और कारखाने के लिए बनाए गए सेड सब गिरा दिए गए। उस जमाने में इस क्षेत्र में छोटी-छोटी दुकानें खुल गई थीं। सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल गया था। पूरक उद्योग लगाने के लिए लोगों ने यहां जमीन खरीद ली थी। अब बंजर जमीन के अलावा कुछ नहीं बचा है। इस जमीन पर पश्चिम बंगाल सरकार की कृषि विभाग के बेशुमार बोर्ड लगे हुए हैं। यानी यह जमीन अब सरकारी है। जहां से कभी नैनो को निकलना था वहां दिन भर चरने के बाद शाम को बकरिया निकलती हैं।

अब विधानसभा चुनाव के समय नेता फिर युवाओं को आश्वासन का झुनझुना थमाने लगे हैं। भाजपा की तरफ से कहा जा रहा है कि अगर उनकी सरकार बनी तो टाटा को फिर लाएंगे। उनके इस वादे पर भला कैसे भरोसा  कर ले। भाजपा सिंगूर को लेकर पिछले सात वर्षों में न तो कोई आंदोलन कर पाई और न हीं सिंगूर में नौजवानों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक उम्मीदवार की तलाश कर पाई। उसने तृणमूल कांग्रेस से खारिज किए गए 88 वर्षीय रविंद्र नाथ भट्टाचार्य को अपना उम्मीदवार बनाया है। यही टाटा को फिर सिंगूर ले आएंगे। रही बात तृणमूल कांग्रेस की तो उनकी सरकार तो सिंगूर के इस कब्रिस्तान पर ही बनी थी। उस ने बाजू के विधायक बेचा राम मन्ना को अपना उम्मीदवार बनाया है। लिहाजा वे सिंगूर में नया उद्योग लगाने की जमीन तैयार कर पाएंगे यह सोचना ही बेकार है। संयुक्त मोर्चा ने माकपा के युवा नेता सृजन भट्टाचार्य को अपना उम्मीदवार बनाया है। उनकी आंखें बुद्धदेव भट्टाचार्य के  औद्योगीकरण के सपने को देख रही हैं। अब इसका हश्र क्या होगा यह दो मई को आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करता है। अस्वस्थ होने के कारण बुद्धदेव भट्टाचार्य चुनाव प्रचार में शामिल तो नहीं हो पाए, लेकिन उन्होंने एक ऑडियो कैसेट जारी करके फिर अपील की है कि कृषि हमारा आधार है और उद्योग भविष्य।

(वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह की सिंगूर से रिपोर्ट।)

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This post was last modified on April 6, 2021 11:02 am

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