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Tuesday, September 21, 2021

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सुप्रीम कोर्ट ने ‘द वायर’ को यूपी पुलिस की तीन एफआईआर पर अंतरिम सुरक्षा दी

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उच्चतम न्यायालय ने बुधवार 8 अगस्त, 21 को कहा कि वह नहीं चाहता कि प्रेस की स्वतंत्रता कुचली जाए लेकिन पत्रकारों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियों को रद्द कराने के लिए सीधे उसके पास चले जाने के लिए वह उनके लिए एक अलग व्यवस्था नहीं बना सकता है। जस्टिस एल. नागेश्वर राव, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की तीन सदस्यीय पीठ ने ‘द वायर’ का प्रकाशन करने वाले फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म और उसके तीन पत्रकारों के खिलाफ प्राथमिकियां रद्द कराने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पास जाने के लिए कहा और उन्हें गिरफ्तारी से दो माह का संरक्षण दिया।

पीठ ने कहा कि सीधे मामले पर विचार करने पर “भानुमति का पिटारा” खुलेगा और उन्हें प्राथमिकी रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा। जस्टिस राव ने कहा कि हम मौलिक अधिकारों के बारे में जानते हैं और नहीं चाहते कि प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया जाए। जबकि पत्रकारों को सीधे उच्चतम न्यायालय में आने से पहले उच्च न्यायालय का रुख करना चाहिए था। पीठ फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट और पत्रकार सिराज अली, मुकुल सिंह चौहान और इस्मत आरा द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में ‘द वायर’ द्वारा प्रकाशित कुछ रिपोर्टों पर यूपी पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज 3 प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की गई है।

जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तो पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन से पूछा कि उच्च न्यायालय का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया गया। जस्टिस राव ने पूछा कि रिट याचिका क्यों और आप (धारा) 482 के तहत एक आवेदन दायर क्यों नहीं करते? इस पर रामकृष्णन ने बताया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पत्रकारिता का काम करने के लिए तीन प्राथमिकी दर्ज की गई हैं।

जस्टिस राव ने कहा कि आप उच्च न्यायालय के समक्ष एक आवेदन दायर कर सकते हैं और हम आपको कुछ अंतरिम सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। क्योंकि क्या होगा, इससे भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। हम यहां सभी मामलों को नहीं उठा सकते हैं। रामकृष्णन उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए तैयार हो गईं लेकिन अंतरिम सुरक्षा के लिए प्रार्थना की। पीठ ने याचिकाकर्ताओं को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति दी और उन्हें प्राथमिकी से दो महीने के लिए सुरक्षा प्रदान की।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने बाराबंकी में एक मस्जिद को अवैध तरीके से ध्वस्त करने की रिपोर्टिंग को लेकर जून महीने में द वायर और इसके दो पत्रकारों सिराज अली और मुकुल सिंह चौहान के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। यह मस्जिद कथित तौर पर स्थानीय प्रशासन द्वारा 17 मई, 2021 को ध्वस्त की गई थी, जिसके बारे में भारत और विदेशों में ‘द वायर’ सहित और कई अन्य मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट किया था। एफआईआर आईपीसी की धारा 153 (दंगा करने के इरादे से जानबूझकर उकसाना), 153ए (विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना), 505 (1) (बी) (समाज में डर फैलाना), 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 34 (आम मंशा से कई लोगों द्वारा किया गया काम) के तहत दर्ज की गई है।

इससे पहले 14 जून को एक ट्वीट को लेकर द वायर के खिलाफ गाजियाबाद में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। दरअसल यह ट्वीट गाजियाबाद में एक मुस्लिम शख्स पर हमले को लेकर था। वहीं, फरवरी 2021 में रामपुर पुलिस ने 26 जनवरी 2021 को किसान प्रदर्शन के दौरान एक युवा किसान की मौत पर उनके दादा के दावों की रिपोर्टिंग को लेकर ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और पत्रकार इस्मत आरा के खिलाफ रामपुर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। किसान के दादा ने अपने बयान में कहा था कि उनके पोते की मौत दुर्घटना में नहीं बल्कि गोली लगने से हुई है।

एडवोकेट शादान फरासत के माध्यम से दायर रिट याचिका में कहा गया है कि रिकॉर्ड और सार्वजनिक डोमेन में मामलों से संबंधित रिपोर्ट और प्राथमिकी प्रेस की स्वतंत्रता को दबाने का एक प्रयास है। याचिका में कहा गया है कि पुलिस ने रामपुर प्राथमिकी के संबंध में मुख्य संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को तलब किया था। यह तर्क दिया गया था कि एफआईआर को अंकित मूल्य पर स्वीकार किए जाने पर भी कोई भी अपराध नहीं बनता है।

प्रकाशित मामले का कोई भी हिस्सा दूर से भी अपराध नहीं है, हालांकि यह सरकार या कुछ लोगों के लिए अप्रिय हो सकता है। संबंधित समाचार रिपोर्टों के कारण कोई अशांति नहीं हुई या परिणाम की संभावना नहीं थी। इन प्राथमिकियों में मौलिक धारणा यह है कि ‘द वायर’ और उसके पत्रकारों ने सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने के इरादे से रिपोर्ट किया है।

याचिका में कहा गया है कि यह सबसे घातक है, और अभिव्यक्ति को अपराधीकरण करने का यह तरीका इस न्यायालय से राहत और उपचारात्मक उपायों का हकदार है, अन्यथा कोई भी पत्रकार निडर होकर रिपोर्ट नहीं कर पाएगा और मीडिया केवल अपना काम करने के लिए आपराधिक प्रक्रिया में फंस जाएगा। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही कानून की उचित प्रक्रिया के दुरुपयोग के बराबर है, और वे अपने बोलने और अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ पत्रकारिता के अपने पेशे को जारी रखने के अधिकार को भी गंभीर रूप से कम करती हैं।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य सामाजिक गलतियों और अन्याय की रिपोर्टिंग के लिए आपराधिकता को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता है। याचिका में कहा गया है कि राज्य के इस तरह के कृत्य न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बल्कि कानून के शासन के लिए भी एक सीधा खतरा हैं। यह मीडिया पुलिसिंग है, और इसलिए उच्चतम स्तर पर हस्तक्षेप की मांग होती है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के टीवी चैनल के पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कानून के दुरुपयोग के मुद्दे पर ध्यान दिया है और दो लोगों द्वारा दायर मामलों में धारा 153-ए और 505 आईपीसी जैसे प्रावधानों की रूपरेखा को ठीक से परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। चूंकि उच्चतम न्यायालय ने पहले ही उस मुद्दे का संज्ञान ले रखा है इसलिए उन्होंने पहली बार में उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना उचित समझा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार हैं। और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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