Friday, December 9, 2022

सुप्रीम कोर्ट ने तलब किए चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति के दस्तावेज, आज होगी फिर सुनवाई

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चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त हो गया है। कोर्ट ने बुधवार (23 नवंबर, 2022) को केंद्र से उनकी नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज तलब किए हैं। जस्टिस केएम जोसेफ, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार की 5 जजों वाली संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान केंद्र ने गोयल की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज दिखाने पर आपत्ति जताई। केंद्र का कहना था कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, लेकिन कोर्ट ने दो टूक कहा कि आप दस्तावेज पेश कीजिए। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि हम देखेंगे कि नियुक्ति में कहीं कुछ गलत तो नहीं हुआ। वहीं इस मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को करेगा।

दरअसल गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सेवानिवृत्त नौकरशाह अरुण गोयल को शनिवार को चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया था। गोयल पंजाब कैडर के पूर्व अधिकारी हैं। नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के एक दिन बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था। पोल पैनल ने कहा कि गोयल ने सोमवार को पदभार ग्रहण किया। जिसके बाद 1985 बैच के पंजाब कैडर के अधिकारी अरुण गोयल मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडे के साथ चुनाव पैनल में शामिल हो गए।

इससे पहले अरुण गोयल भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव थे। उन्होंने कैबिनेट की नियुक्ति समिति के एक आदेश के अनुसार स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी, जिसने उनकी जगह उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी कामरान रिजवी को नियुक्त किया था। पहले उनके 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त होने की उम्मीद थी। 2019 में भारी उद्योग सचिव के रूप में नियुक्त होने से पहले, गोयल संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे। उन्होंने दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के रूप में भी काम किया है।

देश के शीर्ष चुनाव निकाय में तीसरा पद छह महीने से खाली था। देश के तीन सदस्यीय आयोग में एक चुनाव आयुक्त का पद 15 मई से खाली था। जब तत्कालीन चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने सुशील चंद्रा के पद से सेवानिवृत्त होने पर मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला था।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र तंत्र की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही संविधान पीठ ने कहा कि यह उचित होता, अगर मामले की सुनवाई के दौरान नियुक्ति नहीं की जाती। पीठ ने अटॉर्नी जनरल से कल फाइलें पेश करने को कहा। याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि अरुण गोयल को गुरुवार को सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी गई थी और उनकी नियुक्ति 21 नवंबर को अधिसूचित की गई ।

याचिकाकर्ता की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा कि अरुण गोयल की नवीनतम नियुक्ति उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति देकर की गई है। चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किए गए सभी लोग सेवानिवृत्त लोग हैं। लेकिन वह सरकार में वर्तमान सचिव थे। गुरुवार को इस अदालत ने दलीलें सुनीं। शुक्रवार को उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी गई थी। उनका नियुक्ति आदेश शनिवार या रविवार को जारी किया गया था। और सोमवार को उन्होंने काम करना शुरू कर दिया।

प्रशांत भूषण ने कहा कि पद मई से खाली पड़ा हुआ था और उन्होंने नियुक्ति के खिलाफ अंतरिम आदेश की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया था। भूषण ने कहा कि तो प्रक्रिया क्या है? तो प्रोसिज़र क्या है? एक दिन में आप उन्हें वीआरएस देते हैं…।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि आम तौर पर वीआरएस के लिए कर्मचारी को 3 महीने का नोटिस देना होता है। भूषण ने जवाब दिया कि उन्हें संदेह है कि नोटिस दिया गया है या नहीं। इसीलिए अदालत को रिकॉर्ड मांगना चाहिए।

अटार्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने इस मामले में गोयल की नियुक्ति के मुद्दे पर आपत्ति जताई, जहां अदालत एक बड़े मुद्दे पर विचार कर रही है। एजी ने कहा कि मैं दृढ़ता से विरोध करता हूं। उन्होंने कहा, भूषण द्वारा अनुमानित नियुक्ति के पीछे “कोई डिजाइन नहीं” है।

इसके जवाब में जस्टिस जोसेफ ने कहा कि हमने मामले की सुनवाई पिछले गुरुवार को की थी। उस स्तर पर श्री भूषण ने कहा कि एक अंतरिम आवेदन है। फिर अगली सुनवाई कल होगी। इसलिए, हम चाहते हैं कि आप इस अधिकारी की नियुक्ति संबंधित फाइलें पेश करें। यदि आप सही हैं, जैसा कि आप दावा करते हैं तो डरने की कोई बात नहीं है।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि न्यायालय जानना चाहेगा कि किस तंत्र का पालन किया गया है। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि नियुक्तियों के खिलाफ कोई निषेधाज्ञा नहीं थी। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि ऐसा कोई आदेश नहीं था। लेकिन आवेदन था। वैसे भी, उसे जाने दो। हम नियुक्ति पर फैसले में नहीं बैठे हैं। लेकिन हम जानना चाहेंगे। यह एक आंख खोलने वाला होगा। सुचारू रूप से चल रहा था जैसा कि आप दावा करते हैं, आपको डरने की कोई बात नहीं है।जस्टिस जोसेफ ने एजी से कहा कि हम आपसे केवल फाइलें पेश करने के लिए कह रहे हैं, जब तक कि आपको कोई वैध आपत्ति न हो।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि इसे देखकर, यह आपके लिए फायदेमंद होगा, अगर कोई उचित प्रक्रिया है। हम चाहते हैं कि वह (फाइलें) हों। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां सुनवाई शुरू होने के बाद नियुक्ति का आदेश दिया गया था, जब एक आवेदन है कि नियुक्ति न करें।

जब अटॉर्नी जनरल ने आपत्तियां व्यक्त करना जारी रखा तो जस्टिस जोसेफ ने उनसे कहा कि यह विरोधात्मक नहीं है। यह हमारी जिज्ञासा से बाहर है। हम केवल परिस्थितियों को देखना चाहते हैं।

5-जजों की पीठ के एक अन्य सदस्य जस्टिस हृषिकेश रॉय ने एजी को बताया कि वह अदालत के विवेक को पढ़ सकते हैं। जस्टिस जोसेफ ने एजी को बताया कि हमें नहीं लगता कि यह ऐसा मामला है जहां आपको जानकारी रोकनी चाहिए। हम एक खुले लोकतंत्र में रह रहे हैं।

दरअसल शुरुआत में चुनाव आयोग में सिर्फ एक ही सदस्य होता था- मुख्य चुनाव आयुक्त। 16 अक्टूबर 1989 से चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा 2 चुनाव आयुक्त की व्यवस्था की गई। उसी दिन वोटर के लिए न्यूनतम उम्र भी 21 साल से घटाकर 18 साल कर दी गई। जनवरी 1990 में एक सदस्यीय चुनाव आयोग को बहाल कर दिया गया। लेकिन अक्टूबर 1993 में राष्ट्रपति ने दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर फिर से इसे तीन सदस्यीय स्वरूप दिया। तब से यही व्यवस्था चली आ रही है।

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते है। ये आईएएस रैंक के अधिकारी होते हैं। इनका कार्यकाल 6 साल या 65 साल की उम्र (दोनों में से जो भी पहले हो) तक होता है। उनका दर्जा सुप्रीम कोर्ट के जजों के समकक्ष होता है और उन्हें भी वही वेतन और भते मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग का प्रमुख होता है लेकिन उसके अधिकार भी बाकी चुनाव आयुक्तों के बराबर ही होते हैं। आयोग के फैसले सदस्यों के बहुमत या सर्वसम्मति के आधार पर होते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद से महाभियोग की प्रक्रिया के जरिए ही पद से हटाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी हटाने की यही प्रक्रिया होती है। हालांकि, चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति जब चाहे तब हटा सकता है। चुनाव आयुक्त अपने कार्यकाल से पहले इस्तीफा दे सकते हैं या कार्यकाल पूरा होने से पहले भी उन्हें हटाया जा सकता है।मौजूदा व्यवस्था के तहत सरकार अपनी पसंद के नौकरशाहों को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के तौर पर नियुक्त करती है।

संविधान पीठ ने बुधवार को मौखिक रूप से कहा कि देश को ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की जरूरत है, जो प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई भी कर सके। जस्टिस केजोसेफ ने कहा कि हमें एक ऐसे सीईसी की जरूरत है जो एक पीएम के खिलाफ भी कार्रवाई कर सके।

पीठ ने कहा, उदाहरण के लिए मान लीजिए कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ आरोप हैं और सीईसी को कार्रवाई करनी है, लेकिन सीईसी कमजोर है और कार्रवाई नहीं करता है।पीठ ने केंद्र के वकील से सवाल किया कि क्या यह व्यवस्था का पूरी तरह टूटना नहीं है। सीईसी को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त माना जाता है और स्वतंत्र होना चाहिए। पीठ ने कहा, ये ऐसे पहलू हैं जिन पर आपको (केंद्र के वकील) को ध्यान देना चाहिए कि हमें सीईसी के चयन के लिए एक स्वतंत्र बड़े निकाय की आवश्यकता क्यों है, न कि केवल मंत्रिमंडल की।

इस संबंध में चार जनहित याचिकाएं (पीआईएल) सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं। इनमें मांग की गई है कि सीईसी और ईसी की नियुक्तियों के लिए राष्ट्रपति के पास नामों की सिफारिश करने के लिए एक तटस्थ और स्वतंत्र चयन पैनल बनाया जाए। इसके लिए अदालत केंद्र सरकार को निर्देश दे। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का प्रतिनिधित्व अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बलबीर सिंह कर रहे हैं।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियां की थीं। अदालत ने कहा था कि 1996 से कोई पूर्णकालिक सीईसी आया ही नहीं। केंद्र में जो भी सरकार रही, उसने सिस्टम को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्व. टीएन शेषन जैसे लोग कभी कभी आते हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने उसके बाद ऐसे सभी सीईसी की नियुक्ति अपने हिसाब से कम समय के लिए की। उसने नियम का फायदा उठाया।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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