कश्मीर पर कहर(पार्ट-5): जब एक परिवार पर भारी पड़ गया पहले कुदरत और फिर व्यवस्था का कहर

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जामा मस्जिद।

श्रीनगर। पूरा कश्मीर ही उत्पीड़न, बर्बरता और प्रतिरोध का पर्याय बन गया है। इन सबको अपनी नंगी आंखों से देखने वाला डाउनटाउन इसका सबसे बड़ा शिकार रहा है। कश्मीर पर बरपा हर कहर उसकी जेहनियत का हिस्सा बन गया है और उसके प्रतिरोध की इबारतें आज भी दीवारों पर देखी और पढ़ी जा सकती हैं। यहां शायद ही कोई घर ऐसा बचा हो जो किसी न किसी रूप में इसकी चपेट में न आया हो। 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 खत्म करने के केंद्र के फैसले के बाद घाटी एक बार फिर उन्हीं मंजरों से गुजर रही है। जामा मस्जिद से चंद कदमों की दूरी पर स्थित एक घर भी इन्हीं परिस्थितियों का शिकार बना है। हम लोगों को उस परिवार से मिलने का मौका मिला। जिसके एक नहीं बल्कि दो-दो जवान बेटे जेल की सीखचों के पीछे हैं। और उनके जेल जाने के बाद घर की देखभाल करने वाला अब कोई पुरुष नहीं बचा है।

हम दो स्थानीय पत्रकार दोस्तों के साथ जब सायमा (काल्पनिक नाम) के घर पहुंचे तो हमें कालीन बिछे ड्राइंग रूम में बैठा दिया गया। आपको बता दें कि यहां अभी भी सोफा और मेज की जगह ड्राइंग रूम में बिछे कालीन और उस पर लगे मसनद के साथ बैठना लोग ज्यादा पसंद करते हैं। इस तरीके से पुरानी परंपरा अभी भी जारी है। साथ गए पत्रकार ने बताया कि बाहर से काम से लौटने के बाद इस पर बैठना बेहद सुकूनदायक होता है। इसीलिए लोग अभी भी इसको प्राथमिकता देते हैं। कुछ देर बाद सायमा आयीं और उन्होंने सिलसिलेवार तरीके से परिवार पर गुजरी कुदरत और फिर व्यवस्था के कहर की दास्तानों का बयान करना शुरू कर दिया।

पिता सार्वजनिक परिवहन विभाग में काम करते थे। लेकिन अभी 50 की भी उम्र नहीं पार कर पाए थे कि किडनियों ने साथ चलने से इंकार कर दिया। बावजूद इसके परिवार ने आस नहीं छोड़ी और उसने उनके इलाज में पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन यह क्या अभी पिता घर में जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे कि तभी परिवार पर एक और कहर आन पड़ा। यह परिवार के बड़े बेटे की गिरफ्तारी के तौर पर सामने आया। मौत से रूबरू बाप के सामने उसके बड़े बेटे की गिरफ्तारी। वह भी हत्या में। सिर पर किसी पहाड़ के गिरने से कम नहीं था। और ऊपर से अगर वह किसी डीएसपी की हत्या का मामला हो तो परेशानी समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं है। 21 साल के इमरान वानी को जामा मस्जिद के पास हुए डीएसपी अयूब पंडित की हत्या के आरोप में जुलाई 2017 में गिरफ्तार कर लिया गया।

एक बीमार बाप के सामने उसके जवान बेटे की गिरफ्तारी किस कदर उसके स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है इस परिवार ने न केवल जिंदा आंखों से देखा बल्कि उसे हर पल महसूस किया। लिहाजा दवाइयों से पिता को जो आराम मिल रहा था बेटे की गिरफ्तारी के गम ने उसे बेअसर कर दिया। आखिरकार बेटे के जेल जाने का गम वह बहुत ज्यादा दिनों तक सहन नहीं कर सके। और फिर 15 अगस्त 2018 को दूसरी दुनिया को रुखसत कर गए। कहा जा सकता है कि व्यवस्था और कुदरत की दोहरी मार उन पर भारी पड़ी।

सायमा की मानें तो घर की पूरी पूंजी उनके इलाज की भेंट चढ़ गयी। फिर भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। एक अनुमान के मुताबिक उनके इलाज में 20 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हुए। उनके कब्र का रुख करने के साथ ही घर की पूरी अर्थव्यस्था भी जमींदोज हो गयी।

महकमे के निगम होने के चलते सेवाकाल के दौरान मौत पर परिवार के किसी दूसरे सदस्य को नौकरी भी नहीं मिल सकी। पेंशन का कोई प्रावधान न होने के कारण वह सहारा भी जाता रहा। लिहाजा पिता की मौत और बेटे को जेल परिवार पर बहुत भारी पड़ रहा था। बचा छोटा बेटा जुनैद वानी और बेटी सायमा जिन्होंने अभी 20 की भी उम्र नहीं पार की थी। लेकिन कहते हैं कि समय सब कुछ सिखा देता है। अब घर और परिवार को चलाने और संभालने की जिम्मेदारी इन्हीं दोनों कंधों पर थी क्योंकि मां एक घरेलू महिला थीं। वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थीं।

अच्छी बात यह है कि सायमा नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं और उन्हें जल्द ही एसकेआईएम में नौकरी मिल गयी। और उनके जरिये घर की गाड़ी चलने लगी। इस बीच छोटे बेटे जुनैद ने भी एक निजी कंपनी में काम शुरू कर दिया। लेकिन शायद समय का काला साया अभी इस घर का पीछा नहीं छोड़ा था। वैसे भी डीएसपी की हत्या के बाद यह घर प्रशासन के निशाने पर आ गया था। घर पर तीसरा कहर 11 अगस्त को बरपा जब छोटे बेटे जुनैद को गिरफ्तार किया गया और उस पर कोई छोटा-मोटा कानून नहीं बल्कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) तामील किया गया। जुनैद की गिरफ्तारी उस समय हुई जब वह बाहर नमाज पढ़ने गया था। सायमा का कहना था कि गिरफ्तार करने के बाद जुनैद को थाने में पुलिस ने पहले जमकर टार्चर किया और फिर उसे जेल भेजा।

अब हालात ये हैं कि पिता इस दुनिया से रुखसत कर चुके हैं। बड़ा बेटा डीएसपी की हत्या में जेल की सलाखों के पीछे है और छोटे बेटे पर पीएसए लगाकर उसे 2 सालों के लिए जेल भेज दिया गया है। लिहाजा घर के खर्चे का पूरा भार अब सायमा के कंधों पर आ गया है। इसके साथ ही सायमा की शादी और उसके भविष्य के सपनों को ग्रहण लग गया है। उसका क्या होगा न तो वह खुद बताने की स्थिति में है और न ही कोई दूसरा। सामने बैठी मां इन सारी चीजों को महसूस कर रही थीं। जवान बेटी की शादी का बोझ भी उनके चहरे पर पढ़ा जा सकता है। न बोलते हुए भी उन्होंने बहुत कुछ कह दिया।

(कश्मीर से लौटकर जनचौक के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)

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