कब तक दर्द में काम और पढ़ाई करेंगी लड़कियां, कब मिलेगी पीरियड लीव 

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“आज मेरी माहवारी का

दूसरा दिन है

पैरों में चलने की ताक़त नहीं है

जांघों में जैसे पत्थर की सिल भरी है

पेट की अतड़ियाँ

दर्द से खिंची हुई हैं

इस दर्द से उठती रुलाई

जबड़ों की सख्ती में भिंची हुई है”

कवि दामिनी यादव की कविता ‘माहवारी’ की उपरोक्त पंक्तियां मासिक धर्म यानि पीरियड्स के दिनों में होने वाले दर्द व तकलीफ़ को बयान कर रही हैं। देश में करोड़ों लड़कियां हर महीने इस दर्द को जबड़े में भींचे हुये स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़ती हैं।

10वीं कक्षा की छात्रा मानसी जनचौक संवाददाता को बताती हैं सुबह आठ बजे से दोपहर दो बजे तक यानि कुल छः घंटे स्कूल में लगातार बैठना पड़ता है। मानसी आगे बताती है कि कोर्स पिछड़ने या छूटने जैसा कोई इशू नहीं है और वीकेंड में किसी फ्रेंड्स की नोटबुक लेकर चार दिन का कोर्स कवर किया जा सकता है। लेकिन अटेंडेंस का प्रेशर इतना रहता है कि दर्द से बिलखते हुए भी हर महीने चार दिन छुट्टी अफोर्ड नहीं कर सकते।

क्या स्कूलों में लड़कियों को पीरियड लीव नहीं मिलना चाहिए। जवाब में मानसी कहती हैं कोई भी लड़की अपना क्लास या लेक्चर मिस नहीं करना चाहती। जो एक बार मिस हो गया वो उसे दोबारा अलग से नहीं पढ़ाया जाएगा, ये वो अच्छी तरह जानती हैं। लेकिन पीरियड्स के असहनीय दर्द के बावजूद जब वो क्लास में बैठती हैं तो उन्हें पूरे दिन क्या पढ़ाया गया कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता है।

केरल सरकार ने इसी साल जनवरी में छात्राओं को ध्यान में रखकर हर यूनिवर्सिटी में पीरियड और मैटरनिटी लीव देने का ऐलान किया है। अब केरल की छात्राओं को पीरियड के दौरान 2 दिन की छुट्टी मिलेगी।

आम तौर पर पीरियड का पहला दिन अधिकांश लड़कियों के लिए मुश्किल वक्त होता है। पीरियड्स के पहले-दूसरे दिन महिलाएं और लड़कियां पीरियड से जुड़े कई तकलीफों का सामना करती हैं। जैसे कि पीरियड्स में पेट में असहनीय दर्द से मरोड़ उठना, जी मिचलाना, उल्टियां और चिड़चिड़पना होता है।

इसके अलावा हेवी ब्लीडिंग, क्रैम्प, ब्रेस्ट टेंडरनेस, मूड स्विंग, सिर दर्द, माइग्रेन जैसे कई लक्षण महिलाओं में देखने को मिलते हैं। इऩ दिक्कतों की गंभीरता हर लड़की और स्त्री में अलग-अलग होती है। बहुत सारी लड़कियों को शुरुआत के दो दिन दर्द निवारक दवाईयां लेनी पड़ती है।

“पीरियड एक टैबू है। दर्द के साथ काम करना पड़ता है, काम पर पहुंचने से पहले दर्द की गोलियां लेनी हैं और इस तथ्य को छुपाना पड़ता है कि वह उस दर्द में हैं जो उन्हें काम करने में असमर्थ बनाता है।” – यह पीड़ा है एक सरकारी बैंक में काम कर रही महिला बैंककर्मी की है।

आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि सरकारी नौकरी में हैं तो बड़ी सहूलियत रहती होगी पर असल में ऐसा है नहीं। एक सरकारी बैंक में काम करने वाली महिला बताती हैं कि पीरियड उनके लिये एक ट्रॉमा है।

पीरियड्स के चलते उनके पूरे शरीर और चेहरे पर सूजन आ जाती है। तीन दिन वो दर्द के मारे ठीक से खा तक नहीं पाती हैं। कई बार उन्हें इतना बेतहाशा दर्द (सीवियर पेन) हुआ कि इंजेक्शन लेना पड़ा है। वो कहती हैं कि बैंक में छुट्टी मिलना मुश्किल होता है। कई बार उन्होंने मेडिकल लीव ली है लेकिन हर महीने आप मेडिकल लीव नहीं ले सकते।

पेड पीरियड लीव के सवाल पर बैंककर्मी महिला कहती हैं कि अगर ऐसा हो जाये तो उन जैसी महिलाओं की जान में जान आ जाये जिनके लिये पीरियड एक ट्रॉमा है।

राजधानी दिल्ली में रिलायंस स्टोर पर रेनू सेक्युरिटी गार्ड का काम करती हैं। 12 घंटे की नौकरी में उन्हें हर वक्त खड़े रहना होता है। ड्युटी टाइम में बैठ नहीं सकतीं। 35 वर्षीय रेनू जनचौक को बताती हैं कि पीरियड्स में कमर, पीठ और पेड़ू का दर्द से बहुत बुरा हाल रहता है। ऐसा लगता है कि जैसे कमर कटकर शरीर से अलग हो जाएगा।

वो आगे कहती हैं कि पीरियड्स में नौकरी पर एक-एक पल गुज़ारना कठिन लगता है। लेकिन पेन किलर टैबलेट खा खाकर ड्युटी करती हैं। पेड पीरियड लीव के मसले पर रेनू कहती हीं कि मन बहलाने के लिए ख्याल अच्छा है। वर्ना तो प्राइवेट कंपनी में एक दिन की छुट्टी मिलना भी मुश्किल होता है। हर महीने चार दिन इकट्ठा छुट्टी ले लेंगे तो कंपनी एकदम से छुट्टी कर देगी।

देश की आथिक राजधानी मुंबई के एक शॉपिंग मॉल में काम करने वाली ज्योति और शिखा जनचौक को बताती हैं कि पीरियड्स में शुरू के दो दिन तो बहुत ज़्यादा दर्द रहता है। लेकिन दर्द झेलते हुये भी काम करना होता है। ज्योति कहती हैं लड़कियों के लिये वैसे भी रोज़गार के मौके कम होते हैं पीरियड्स का बहाना लेकर बैठने लगे तो वो खत्म हो जायेगा।

वे आगे बताती हैं कि मॉल में स्त्रियों के लिए अलग वॉशरूम होता है जहां पैड चेंज करने और इस्तेमाल किये जा चुके पैड को निपटाने की सहूलियत होती है। नौकरीपेशा लड़कियों स्त्रियों को पीरियड्स लीव दिये जाने के सवाल पर ज्योति और शिखा कहती हैं मिल जाये तो अच्छा है और न मिले तो उन्हें कोई शिकवा शिक़ायत नहीं है।       

‘माहवारी’ जैसे सिग्नेचर कविता लिखने वाली दामिनी यादव पेड पीरियड्स लीव के मसले पर जनचौक संवाददाता से कहती हैं इस तरह की चीज होनी तो चाहिए कि सचमुच आप पीरियड से जुड़े तकलीफ को समझें। उसकी अनिवार्यता को समझें। उससे जुड़ी बारीकियों को समझें और इस तरह के प्रावधान करें, क्योंकि एक लड़की या महिला के लिए वो पांच दिन जो बहुत दुखदाई होते हैं।

वो आगे कहती हैं कि पीरियड किसी-किसी के लिये बहुत तकलीफदेह होते हैं किसी के लिए बहुत सहज होते हैं। लेकिन सभी के लिए जीना सहज हो सके ऐसी चीज होनी तो चाहिए। दामिनी जी आगे कहती हैं कि पेड पीरियड लीव एक बहुत ही आदर्श स्थिति होगी। लेकिन अगर पीरियड लीव को अनपेड रखते हुये भी सभी के लिये अनिवार्य कर दें और स्कूलों में अटेंडेंस का दबाव न हो ये भी बहुत बड़ी बात होगी।

कंपनियां ‘पीरियड लीव’ को ‘सिक लीव’ के तौर पर भी स्वीकार कर लें तो बड़ी बात होगी। क्योंकि बीमार तो कभी-कभी पड़ते हैं कोई तो पूरे साल भी बीमार नहीं होता, लेकिन पीरियड तो हर महीने 4 से 6 दिन आना तय है।

दामिनी जी आगे बताती हैं कि दफ़्तरों में साफ शौचालय नहीं होते। वो उदाहरण देकर बताती हैं कि ओखला इंड्रस्ट्रियल एरिया कितना व्यापक है लेकिन वहां आस-पास जल्दी में एक भी केमिस्ट स्टोर नहीं मिलेगा कि अचानक आपको पैड की ज़रूरत है तो वहां ले सकें। इस एरिया में लंबे अर्से तक काम कर चुकी दामिनी कहती हैं कि यहां ऑफिस में पैड मिलना तो कल्पना से परे है।

कई बार स्त्रियों को अपनी सहकर्मी के रुमाल इकट्ठा करके काम चलाना पड़ता है। और जैसे-तैसे करके घर भागती हैं। वो बताती हैं कि शौचालय की असुविधा के चलते ही दूर-दराज के क्षेत्रों की लड़कियां स्कूल बीच में छोड़ देती हैं।

घरेलू कामगार महिलाओं के अधिकारों के लिए एक दशक से काम कर रही मछलीशहर जौनपुर की प्रभा जनचौक से कहती हैं कि संगठित क्षेत्रों से ज़्यादा असंगठित क्षेत्रों में महिला वर्ग काम करती हैं। वो कहती हैं कि कम्पनी कारखानों के स्त्रियों के लिए बनने वाले नियम कायदे असंगठित क्षेत्र की महिलाओं पर लागू नहीं होते हैं।

शहरों में घर-घर जाकर झाड़ू पोछा बर्तन करने वाली संजय नगर निवासी अनीता जनचौक से बताती हैं कि पीरियड के दिनों में ढंग से उठा नहीं जाता और उन्हें घर घर जाकर घंटों खड़े होकर, सिंक में झुककर जूठे बर्तन साफ करने होते हैं। झुककर झाड़ू-पोछा करना होता है।

क्या आपके क्षेत्र में छुट्टी करने की सहूलियत नहीं होती पूछने पर अनीता जी बताती हैं कि सप्ताह में एक दिन इतवार की भी छुट्टी नहीं मिलती है। कामगार स्त्रियों ने साप्ताहिक छुट्टी के लिए एकजुट होकर आंदोलन किया बावजूद इसके कई स्त्रियों को अभी भी साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती है और आप पेड पीरियड लीव की बात करते हो। ये ग़रीब स्त्रियों के साथ मजाक नहीं तो और क्या है।         

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

24 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई डीवाई चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच में छात्राओं और कामकाजी महिलाओं को उनके मासिक धर्म के दौरान अवकाश नियमों संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई होना है। याचिका में सभी राज्यों को इस बाबत निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी मीडिया में दिये अपने एक वक्तव्य में कहते हैं कि उन्होंने बचपन में अपनी मां को इस दर्द से गुज़रते देखा है। एक बार ट्रेन में सफर के दौरान एक को-पैसेंजर महिला पीरियड्स के दर्द से काफी बैचेन थी। वो बेचैन थीं लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थीं। तब उन्होंने उस महिला को पेनकिलर टैबलेट दी। बाद में उन्होंने इस विषय पर पढ़ा और जाना कि पीरियड्स के दर्द की तुलना हार्ट अटैक जैसी होती है। इसके बाद ही उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की।

वहीं याचिकाकर्ता के वकील विशाल तिवारी कहते हैं कि उन्होंने इस मुद्दे को मानवाधिकार के तहत उठाया है। वो आगे कहते हैं कि वो यह नहीं कह रहे हैं कि ये पीरियड लीव ज़रूरी हो। लेकिन सुविधा रहेगी तो जरूरतमंद स्त्रियां इसे ले सकेंगी। स्त्रियों के लिए ये दिन नाजुक होते हैं अतः उनको पेड लीव मिलनी चाहिए। वो आगे कहते हैं कि पीरियड्स के दौरान स्त्रियों का शरीर काम का ज्यादा बोझ नहीं संभाल सकता।

स्त्रियों को पीरियड लीव देने वाले देश

ठीक एक सप्ताह पहले यानि 16 फरवरी 2023 को स्पेन के पार्लियामेंट ने पीरियड के समय होने वाले दर्द से पीड़ित महिलाओं को मेडिकल लीव देने का क़ानून पास किया है। पीरियड को मेडिकल लीव में रखने वाला स्पेन यूरोप का पहला देश है। स्पेन के पार्लियामेंट में इस क़ानून के लिये हुये मतदान में 185 मत इसके समर्थन में और 154 मत इसके ख़िलाफ़ पड़े।

स्पेन की मंत्री इरेन मोंटेरो ने इसे नारीवादी प्रगति के लिए ऐतिहासिक दिन करार देते हुए कहा कि यह कदम स्त्री स्वास्थ्य समस्या को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम है। उन्होंने आगे कहा कि नए क़ानून के तहत पीरियड पेन का अनुभव करने वाली कर्मचारी उतने ही समय के अवकाश के हक़दार होंगी जितने की उन्हें ज़रूरत होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्पेन की राज्य सामाजिक सुरक्षा प्रणाली इस छुट्टी के लिए भुगतान करेगी, नियोक्ता नहीं।

महिलाओं को पीरियड लीव देने की शुरुआत सोवियत संघ (रूस) ने किया। सोवियत संघ ने इस मुद्दे पर पहल करते हुए साल 1922 में स्त्रियों को पीरियड लीव देना शुरु किया। हालांकि सोविय़त संघ के विघटन के बाद स्त्रियों से ये सहूलियत छीन ली गयी।

जापान में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद साल 1947 से ही कामकाजी स्त्रियों को पीरियड लीव दिया जा रहा है। दक्षिणी कोरिया नई सदी यानि साल 2001 से ही महिलाओं को पीरियड लीव देता आ रहा है। वहां क़ानून है कि यदि नियोक्ता किसी महिला को पीरियड लीव देने से इंकार करता है तो उसे 2 साल की जेल हो सकती है।

ताइवान में महिलाओं को 3 दिन का पीरियड लीव दिया जाता है। रोज़गार में लैगिंक समानता अधिनियम-2013 का संशोधन महिलाओं को 3 दिन का पीरियड लीव देने के लिये ही किया गया था।

साल 2017 में जाम्बिया ने महिलांओ को एक दिन का पीरियड लीव देने वाला क़ानून बनाया। महिला कर्मचारियों का एक फोनकॉल ही उन्हें पीरियड लीव लेने के लिए काफी है। इसके लिये उन्हें किसी मेडिकल प्रूफ देने की ज़रूरत नहीं होती।

वियतनाम में हर महीने पीरियड के दौरान महिला कर्मचारी 3 दिन की छुट्टी ले सकती हैं। लेकिन अगर वह यह छुट्टी नहीं लेती तो नियोक्ता को इसके बदले अतिरिक्त पैसे महिला कर्मचारी को देने पड़ते हैं। वियतनाम सरकार ने ये क़ानून फरवरी 2022 से लागू किया है।

इंडोनेशिया महिलाओं को 2 दिन की पीरियड लीव देता है। लेकिन इसके लिए महिलाओं को एक ख़तरनाक फिजिकल एक्जाम से गुज़रना होता है।

चीन के मध्य अनहुई प्रांत, उत्तरी शांक्सी प्रांत और मध्य हेबुई प्रांत में महिलाओं को एक या दो दिन की पीरियड लीव डॉक्टर के नोट, या अस्पताल सर्टिफिकेट के बाद दिया जाता है।       

साल 2017 में इटली की पार्लियामेंट में भी महिलाओं को पेड पीरियड लीव देने के मुद्दे पर बहस हुई थी। पर बात क़ानून बनने तक नहीं पहुंच सकी।  

बिहार, महिलाओं को पीरियड लीव देने वाला देश का पहला राज्य

बिहार साल 1992 से महिलाओं को 2 दिन का अवकाश दे रहा है। कह सकते हैं कि भारत में पीरियड लीव की शुरुआत बिहार से हुई। साल 1992 में लालू प्रसाद यादव की सरकार महिलाओं के लिए स्पेशल लीव पॉलिसी लेकर आई। इसके तहत महिलाओं को 2 दिन की पेड पीरियड लीव मिलती है। पीरियड लीव के अधिकार को हासिल करने के लिए महिलाओं ने 32 दिन आंदोलन किया था।

बिहार में नियम बनने के सात साल बाद साल 1997 में मुंबई में मीडिया कंपनी कल्चर मशीन ने महिलाओं को 1 दिन की माहवारी की छुट्टी देने की शुरुआत की। साल 2020 में फूड डिलीवरी कंपनी जोमैटो ने पीरियड लीव देने का ऐलान किया। इस समय भारत में 12 कंपनी पीरियड लीव दे रही हैं जिसमें बायजू, स्विगी, मलयालम मीडिया कंपनी मातृभूमि, बैजू, वेट एंड ड्राई, मैगज्टर जैसी कंपनी शामिल हैं।

(जनचौक के वरिष्ठ संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट)

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