इकाई में क्यों सिमटी दिल्ली की यह लड़ाई!

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दिल्ली विधान सभा चुनाव में जो हुआ वह अप्रत्याशित है। इसकी उम्मीद तो नहीं थी। भाजपा ने ढाई सौ सांसद, आधा दर्जन मुख्यमंत्री, दर्जन भर केंद्रीय मंत्री ही नहीं उतारे बल्कि विश्व स्तर के नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मैदान में उतर आए। देश के सबसे बड़े रणनीतिकार नेता और गृह मंत्री अमित शाह ने खुद गली-गली घूम कर पर्चा बांटा।

हालांकि चुनाव म्युनिसिपैलिटी जैसा था। ऐसे राज्य का चुनाव था जिसका बस एक दारोगा तक पर नहीं चलता। पर उस चुनाव में मजहबी गोलबंदी हो जाए इसके लिए भाजपा नेताओं ने इतना बड़ा गड्ढा खोदा कि समूची आम आदमी पार्टी उसमें समा जाए।

इस गढ्ढे को खोदने के लिए क्या नहीं किया गया। शाहीन बाग़ को हथियार बनाया गया। पाकिस्तान को हर चुनाव की तरह इस चुनाव में भी लाया गया। गाली दी गई, गोली चलाई गई। मीडिया के जरिए सारी गंदगी उछाली गई। पैसे बांटे गए, दारू चली। लोटे में गंगा जल लेकर कसम खिलाई गई। और अंत में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी भी घोषित कर दिया। परवेश या गिरिराज जैसे अविकसित बुद्धि वाले नेताओं ने यह काम नहीं किया, बल्कि प्रकाश जावेडकर भी इसी बहाव में बह गए। यह मामूली बात नहीं थी।

यह चुनाव सिर्फ दिल्ली का नहीं था। यह जनमत संग्रह जैसा भी बन गया था। साफ-साफ कह दिया गया था, कौन सीएए के साथ है और कौन नहीं। साफ कह दिया गया था यह दो विचारधारा की लड़ाई है। साफ़ कर दिया था यह देश बनाम आम आदमी पार्टी की लड़ाई है। कौन बन गया था यह देश। भाजपा हर चुनाव में खुद तो देश बन जाती है और सामने जो पार्टी लड़ने आती है उसे देशद्रोही बना देती है। यह अद्भुत कला है। अद्भुत प्रयोग है। पर गाली, गोली और करंट के बाद भी देश में बदल चुकी भाजपा का इकाई में सिमटना हैरान नहीं करता?

चुनाव से पहले जो घटनाएं हुईं, उस पर भी एक नजर डाल लें। पुलिस की भूमिका पर भी नजर डाल लें। मजहबी गोलबंदी के लिए किन-किन शिक्षा संस्थाओं पर हमला किया गया उसे भी जान लें। जेएनयू पर गुंडों ने हमला किया। इसमें महिलाएं भी थीं। छात्र-छात्राओं से मारपीट की गई। और पुलिस हमलावरों के साथ खड़ी हो गई। जामिया में छात्राओं तक को इसी पुलिस ने बुरी तरह पीटा। सबने देखा। इस सबका संदेश देश भर में गया।

नागरिकता कानून का विरोध कर रहे लोगों को इस घटना से संदेश देने की कोशिश की गई। पर छात्र छात्राएं दबे नहीं और खुलकर सामने आ गए। आईआईटी से लेकर प्रबंधन तक के छात्र भी सड़क पर उतरे। सौ से ज्यादा कैंपस के छात्र आंदोलन से जुड़ गए। देश भी यह देख रहा था, दिल्ली भी यह देख रही थी। कश्मीर भी देख रहा था।

आर्थिक बदहाली भी लोगों को दिख रही थी। ऐसे में किस वजह से नागरिकता कानून लाया गया यह किसी के समझ में नहीं आ रहा था। कुछ यह मान रहे थे कि भाजपा मच्छर मारने के लिए भी तोप चला देती है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में मायावती का काला धन निपटाने के लिए नोटबंदी का फैसला किया, भुगता समूचा देश। बंगाल चुनाव और असम में दबदबा बनाने के लिए नागरिकता कानून लेकर आई, जिसकी वजह से समूचा देश जंतर मंतर बन गया। जो इसका विरोध करे वह देशद्रोही।

केजरीवाल के खिलाफ भाजपा की सेना बैरक से बाहर निकली भी, इसलिए क्योंकि केजरीवाल ने इस कानून का खुल कर विरोध किया। पार्टी के रणनीति बनाने वाले यह समझा रहे थे कि नागरिकता कानून बहुत बड़ा हथियार बन चुका है और समूचे देश में गोलबंदी हो चुकी है। शाहीन बाग़ के जरिए पार्टी ने इसे दिल्ली में चुनावी मुद्दे में बदल दिया। माहौल भी बदला। खूब जहर उगला गया। फिर वही पुराना हथियार पकिस्तान भी लाया गया। पूरा वातावरण जहरीला बना दिया गया।

पर अरविंद केजरीवाल ने अपना एजंडा नहीं बदला। वे भाजपा के गाली और गोली के खेल में नहीं फंसे। वे सड़क बिजली पानी जैसे नागरिक मुद्दों से नहीं भटके। और दिल्ली भी उनके साथ खड़ी रही। दिल्ली के लोगों ने शिक्षा, अस्पताल, बिजली और पानी के नाम पर वोट दिया।

भाजपा ने अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी घोषित किया और दिल्ली ने फिर उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया, क्योंकि केजरीवाल सरकार ने काम किया और उसपर वोट भी मांगा। यह होता नहीं है। पर लगता है दिल्ली आजिज आ गई है दंगा फसाद वाली भाषा से। बेवजह टकराव से। वह अमन चैन चाहती है। उसने अपने घर का कचरा निकाल दिया है। झाड़ू लगा कर। भाजपा चाहे तो फिर बंगाल में यह प्रयोग करके देख ले। अब आसान नहीं है रास्ता। दिल्ली की यह आवाज देर तक और दूर तक गूंजेगी।

(अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

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