प्रेमचंद ऐसे लेखक हैं जिनकी याद बराबर आती है तब जब किसी गरीब के शोषण की दास्तान सामने आती है तो बेखटके प्रेमचंद के पात्र सामने आ जाते हैं। मुंशी प्रेमचंद का साहित्य आज के समय में भी प्रासंगिक है क्योंकि देश में गरीबी, किसानों का संघर्ष और सामाजिक भेदभाव और महिला उत्पीड़न जैसी समस्याएं मौजूद हैं।
आज का किसान जिस तरह सरकार की बदहालियों से त्रस्त है। उसकी अपनी फसल का दाम सरकार निर्धारित करती है। वह भी उसे नहीं मिल पाता है और विवशत:अपनी फसल औने-पौने दामों में बेचता है जो उसकी लागत भी नहीं दिलाते। बीज खाद के लिए वह इस उम्मीद में कर्ज लेता है कि शायद अगले साल उसे उचित दाम मिल जाएंगे।वह सालों साल कर्ज़ बढ़ाता जाता है और एक दिन आत्महत्या कर लेता है।
ज़मीन ज़मीदार नहीं अब पूंजीपति की जागीर बन जाती है। क्या ऐसे दुर्दांत वक्त में हमें गोदान के होरी का संघर्ष याद नहीं आता। किसानों की बर्बादी और कर्ज़ को प्रेमचंद ने गोदान में जो अभिव्यक्ति दी है। वह आज भी लगभग वैसी ही या यूं कहें इससे बदतर हालात में नज़र आती है।
शोषण और भ्रष्टाचार की तासीर में भी जिस स्थिति का दिग्दर्शन प्रेमचंद के नमक के दरोगा में दिखाई देती है वह आज के समय में सिर्फ दरोगा तक केंद्रित नहीं रही। प्रशासनिक क्षेत्र में मंत्रियों, अधिकारियों से लेकर अदने से कर्मचारियों तक फैली हुई है और इतनी जंजीरों के बीच में भला आम आदमी का जीवन कैसा होगा। इसे प्रेमचंद ने जितना रेखांकित किया है उससे अधिक लाचारी आज सामने है।
गरीबी का आलम यह है कि युवा अपनी एक दिन की मौज करने कफ़न के चंदे से पूरा करने वाले पात्र प्रेमचंद कफ़न कहानी में रचते हैं। आज भी नशे की लत में डूबीं युवा पीढ़ी जिसका पुख़्ता इंतज़ाम सरकारी ठेके से पूरा होता है। युवाशक्ति चोरी, डकैती, लूटपाट से पूरी कर रहा है। बेकार युवा काम की तलाश में जब कुछ नहीं पाता तो सामाजिक अपराध को सहारा बना लेता है। ऐसे युवा घरों से उपेक्षित हो नशे में मौज का सहारा लेने मजबूर होते हैं।
‘पूस की रात’ में कंपकंपा देने वाली ठंड को सहारा मिलता है अपने कुत्ते का जो लाचारी और मानवीय संवेदना के साथ व्यवस्था की नाकामी को दर्शाती है। याद आती है राहुल गांधी की भारत छोड़ो यात्रा की जब कड़ी ठंड में एक शर्ट में बच्चे उनसे मिलने आते हैं वे पूछते हैं, “ठंड नहीं लग रही?”, वे कहते नहीं है “नहीं!” तब राहुल गांधी उस अहसास को पाने उसके बाद से एक टी शर्ट में यात्रा को अंत तक पहुंचाते हैं। कहने का आशय यह है कि आज भी पूस की रात कई लोग इसी तरह गुजारते हैं।
इतना ही नहीं प्रेमचंद ने जाति और वर्ग भेद पर सर्वदा प्रहार किए हैं लेकिन समाज में आज भी मानवीय मूल्यों की कोई कद्र नहीं है। सामाजिक भेदभाव हर जगह मौजूद है इसलिए जातीय जनगणना की मांग की गई है। ऐसा समझा जा रहा है कि जातिगत जनगणना के आधार पर नियुक्ति होने से ऊंच-नीच तथा धर्मगत भेदभाव समाप्त हो सकेगा। लेकिन ये अभी दूर की कौड़ी भी नज़र आ रही है।
कहा जाता है कि किसी देश की तरक्की का पैमाना उस देश की खुशहाली से पता चलता है। देश में महिलाओं की शिक्षा के बावजूद उसकी स्थिति प्रेमचंद की निर्मला और सेवासदन की स्त्रियों से भी गई बीती है।वे आज भी मंच पर पुरुषों के साथ मंच पर भूख हड़ताल करने पर या पुरुषों के समान अपशब्दों का इस्तेमाल करने पर प्रताड़ना झेलने विवश हैं। ये ज़रुर है कुछ महिलाएं प्रेमचंद के पात्रों की तरह इसे तोड़ने प्रयासरत हैं।
कुल मिलाकर प्रेमचंद के वे तमाम पात्र आज भी हमारे कथित प्रगतिशील समाज में मौजूद हैं। ये जब तक हमारे समाजों में उपस्थित रहेंगे देश कमज़ोर रहेगा तथा प्रेमचंद की प्रासंगिकता रहेगी।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, टिप्पणीकार हैं।)