प्रियांक खड़गे ने आरएसएस के रजिस्टर्ड न होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इतिहास और कानूनी दर्जे पर सवाल दोहराते हुए चेतावनी दी कि कर्नाटक सरकार एक ऐसा कानून ला सकती है जिसके तहत संगठन को कानून के दायरे में रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी हो जाए।

समाजवादी संगम (एक सामाजिक-राजनीतिक मंच) द्वारा दिल्ली में आयोजित ‘ आरएसएस का रजिस्ट्रेशन क्यों ज़रूरी है’ कार्यक्रम में बोलते हुए खड़गे ने कहा कि आरएसएस लंबे समय से खुद को राष्ट्रवाद का रक्षक बताता रहा है, जबकि वह उन मूल्यों को बनाए रखने में नाकाम रहा है जिनका वह प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है।

उन्होंने कहा, ” आरएसएस के पास देशभक्ति का सर्टिफिकेट जारी करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। मेरी नज़र में, यह देश के इतिहास का सबसे ज़्यादा राष्ट्र-विरोधी संगठन है” कांग्रेस नेता ने कहा कि उनकी सरकार ऐसे तरीकों पर विचार कर रही है जिनसे इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाले संगठनों को एक पारदर्शी कानूनी ढांचे के तहत लाया जा सके।

आरएसएस एक स्वैच्छिक संगठन है और इसने कभी भी किसी कानून के तहत सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी के तौर पर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है। अदालतों और टैक्स अधिकारियों ने इसे कानूनी रूप से “व्यक्तियों का समूह” माना है।

खड़गे के मुताबिक, कर्नाटक के गृह मंत्री का पद संभालने के बाद उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर यह स्पष्टीकरण मांगा था कि संगठन बिना औपचारिक रजिस्ट्रेशन के क्यों काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

उन्होंने कहा, “अगर वे कानूनी ढांचे से बाहर रहते हैं, तो कर्नाटक रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाने के लिए कानून लाने पर विचार करेगा। राज्य में काम करने वाले किसी भी संगठन को कानून का पालन करना होगा” उन्होंने यह भी कहा कि लगातार नियमों का पालन न करने पर कार्रवाई हो सकती है, जिसमें प्रतिबंध भी शामिल है।

खड़गे ने आरएसएस के खिलाफ अतीत में की गई कई आलोचनाओं का भी ज़िक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि आज़ादी की लड़ाई और अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलने के तुरंत बाद के सालों में संगठन ने भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों से दूरी बनाए रखी।

ऐतिहासिक लेखों और प्रकाशनों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि आज़ादी से पहले आरएसएस तिरंगे के बजाय भगवा झंडे को प्राथमिकता देता था और 1947 के बाद राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार करने का विरोध करता था।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि दशकों तक नागपुर में आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया गया। उन्होंने संविधान के प्रति संगठन की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि वह संविधान के बजाय प्राचीन मनुस्मृति ग्रंथ को ज़्यादा महत्व देता है।

खरगे ने ज़ोर देकर कहा, “जो संगठन न तो राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करता था और न ही संविधान को मानता था, वह राष्ट्रवाद का संरक्षक होने का दावा नहीं कर सकता।”

उन्होंने आगे कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में आरएसएस की ठीक से जांच-पड़ताल करने में नाकाम रही हैं, जिससे उसका प्रभाव बेरोकटोक बढ़ता गया।

इस कार्यक्रम में खरगे के साथ मंच साझा करने वाले वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ज़्यादा पारदर्शिता की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि आरएसएस की विचारधारा के विस्तार का सबसे मज़बूत जवाब संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखना ही हो सकता है।भूषण ने कहा, “आरएसएस के विस्तार का मुकाबला केवल संवैधानिक व्यवस्था को मज़बूत करके ही किया जा सकता है।”

इस कार्यक्रम में कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद उदित राज भी शामिल हुए। खरगे पिछले कई हफ़्तों से आरएसएस की कानूनी स्थिति का मुद्दा उठा रहे हैं।

संगठन के शताब्दी वर्ष के दौरान, उन्होंने संघ से आग्रह किया कि वह स्वेच्छा से पंजीकरण कराकर और अपने संगठनात्मक व वित्तीय कामकाज में अधिक पारदर्शिता अपनाकर इस अवसर को चिह्नित करे।

हालांकि, आरएसएस ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। खरगे की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए भागवत ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित अभियान बताया और कहा कि संघ खुले तौर पर काम करता है।

भागवत ने कहा था, “हमारे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। ऐसी कई संस्थाएं और पारंपरिक संगठन हैं जो पंजीकृत नहीं हैं। हम सार्वजनिक रूप से काम करते हैं, लोगों को अपने काम को समझने के लिए आमंत्रित करते हैं और अपनी गतिविधियों के बारे में पारदर्शी रहते हैं। इस तरह की राजनीतिक चालें हमारे लिए नई नहीं हैं।”

1925 में स्थापित आरएसएस पर तीन बार सरकारी प्रतिबंध लगाए गए हैं : 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद, 1975 में आपातकाल के दौरान, और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद। आखिरी प्रतिबंध 1993 में हटा लिया गया था।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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