पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य लोकसेवा होना चाहिए – महात्मा गांधी
20 जुलाई 2026 केवल एक छात्र आंदोलन की तारीख नहीं थी। यह भारतीय मीडिया के लिए भी एक कसौटी का दिन था। उस दिन दिल्ली की सड़कों पर हजारों छात्र और युवा नीट-यूजी 2026 पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, छात्रों की आत्महत्याओं और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर उतरे थे। सवाल केवल परीक्षा का नहीं था, उस व्यवस्था का था जिस पर करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है।
लेकिन उस दिन एक और सवाल पैदा हुआ कि क्या भारतीय मुख्यधारा का मीडिया अब भी जनता के सबसे बड़े सरोकारों को उसी गंभीरता से देखता है, जिसकी लोकतंत्र उससे अपेक्षा करता है?
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का उभार कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं थी। एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी से शुरू हुआ यह अभियान कुछ ही दिनों में देशभर के युवाओं की आवाज़ बन गया। शुरुआत प्रतीकात्मक थी, लेकिन आंदोलन का केंद्र बहुत जल्द बदल गया। परीक्षाओं में सुधार, शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग आंदोलन का मुद्दा बन गया।
यह किसी पारंपरिक राजनीतिक दल का आंदोलन नहीं था। इसकी भाषा अलग थी, प्रतीक अलग थे और संवाद का माध्यम भी अलग था। शायद इसी कारण सत्ता के साथ-साथ मुख्यधारा का मीडिया भी इसे समय रहते पढ़ नहीं सका।
20 जुलाई की सबसे बड़ी खबर केवल पुलिस और प्रदर्शनकारियों का टकराव नहीं था। उससे बड़ी खबर यह थी कि देश के अनेक बड़े टेलीविजन चैनल इस आंदोलन को वैसा निरंतर, व्यापक और निष्पक्ष कवरेज नहीं दे सके, जिसकी लोकतंत्र में उनसे अपेक्षा की जाती है।
यहीं भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का फर्क साफ दिखाई दिया। रॉयटर्स, बीबीसी, द गार्डियन, द न्यूयॉर्क टाइम्स और अल जज़ीरा जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्थानों ने इसे भारत में युवाओं के बढ़ते असंतोष और मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी छात्र चुनौती के रूप में देखा। जबकि इसके विपरीत भारत के कई बड़े टीवी चैनलों ने शुरुआती दिनों में या तो इस आंदोलन को बहुत सीमित जगह दी या उसकी भीड़ को कमतर बताकर उसका महत्व कम कर दिया।
बाद में जब हिंसा और अराजकता के दृश्य सामने आए, तब जरूर थोड़ी कवरेज बढ़ी। लेकिन उसके अन्य कारण थे। नतीजा यह हुआ कि शिक्षा, परीक्षा और युवाओं का भविष्य जो कि आंदोलन का मूल सवाल था, पृष्ठभूमि में चला गया और टकराव सुर्खियों में आ गया।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पूरा भारतीय मीडिया अनुपस्थित था। कुछ समाचार संस्थानों, क्षेत्रीय मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों ने लगातार जमीनी रिपोर्टिंग की। सवाल पूरे मीडिया का नहीं, बल्कि उस प्रभावशाली हिस्से का है जो राष्ट्रीय विमर्श तय करने का दावा करता है। सवाल पूरे मीडिया का नहीं, बल्कि उस प्रभावशाली हिस्से का है जो राष्ट्रीय विमर्श तय करने का दावा करता है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या समाचार वही है जिसमें धुआं, आग और टकराव हो? या वह भी समाचार है जिसमें किसी देश के लाखों युवा बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के अपने भविष्य को लेकर सड़कों पर हों? क्या पत्रकारिता का काम केवल घटना दिखाना है या उसके कारणों तक पहुंचना भी है? यदि कैमरे केवल संघर्ष के क्षण तलाशेंगे और संघर्ष के कारणों की अनदेखी करेंगे, तो लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका अधूरी नहीं रह जाएगी?
मुख्यधारा के मीडिया के प्रति यह अविश्वास अचानक पैदा नहीं हुआ। पिछले एक दशक में भारतीय मीडिया के सामने कई ऐसे मौके आए, जब उसे परीक्षा लीक, बेरोजगारी, शिक्षा, किसानों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के सवालों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रखना चाहिए था। कुछ संस्थानों ने यह जिम्मेदारी निभाई भी, लेकिन उतनी ही बार यह आरोप भी लगा कि स्टूडियो की बहसें ज़मीन पर हो रही अन्य रिपोर्टिंग पर भारी पड़ गईं।
20 जुलाई ने इस धारणा को और मजबूत किया कि जब सत्ता के लिए असुविधाजनक सवाल उठते हैं तो मुख्यधारा मीडिया का एक हिस्सा उतना मुखर दिखाई नहीं देता, जितनी अपेक्षा आम जनता या लोकतांत्रिक व्यवस्था उससे करती है।भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि बड़े जनआंदोलनों को शुरुआत में अक्सर कमतर आंका गया।
प्रदर्शन के दौरान ‘गोदी मीडिया गो बैक’ जैसे जो नारे लगे थे, वह सब मीडिया के प्रति उसी अविश्वास की अभिव्यक्ति थे। कुछ पत्रकारों के साथ अभद्रता हुई, कुछ के फोन छीने गए और हमले भी हुए। इन घटनाओं की सीजेपी नेतृत्व ने बाद में सार्वजनिक रूप से निंदा की। लोकतंत्र में पत्रकार पर हमला किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
लेकिन उतना ही गंभीर प्रश्न यह भी है कि आखिर वह स्थिति क्यों पैदा हुई, जहां समाज का एक वर्ग पत्रकार को निष्पक्ष पर्यवेक्षक के बजाय किसी पक्ष का प्रतिनिधि मानने लगा? लोकतंत्र में यह केवल मीडिया का संकट नहीं, जनता और मीडिया के बीच टूटते विश्वास का संकेत भी है।
दरअसल, पत्रकारिता की विश्वसनीयता किसी एक दिन में नहीं बनती और न ही किसी एक दिन में टूटती है। मीडिया द्वारा लगातार किए गए निर्णयों, जिनमें किन ख़बरों या सवालों को प्रमुखता दी जाएगी और किनको हाशिये पर धकेल दिया जाएगा, से तय होता है कि जनता मीडिया को अपने सवालों या लोकतंत्र के साथ खड़ा समझेगी या सत्ता के साथ।
मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी सरकार नहीं, जनता का विश्वास होता है। एक बार वह दरकने लगे तो उसे वापस पाना सबसे कठिन काम होता है। 20 जुलाई ने इसी भरोसे के संकट को खुली बहस का विषय बना दिया। इस घटना ने भारतीय मीडिया को एक ऐसा अवसर दिया है, जहाँ से वह अपने आत्ममंथन की शुरुआत कर सकती है।
यही कारण है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का अलग से उल्लेख नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की न्यायिक व्याख्याओं ने बार-बार स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र प्रेस लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है। पत्रकारिता का काम केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाबदेही मांगना भी है। जब मीडिया कठिन सवालों से बचने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन भी डगमगाने लगता है।
यही वजह है कि आंदोलन का सबसे बड़ा लाभ मुख्यधारा के मीडिया की बजाय सोशल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारों और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्मों को मिला। जंतर-मंतर पर अनेक युवा रिपोर्टर, यूट्यूब चैनल, इंस्टाग्राम क्रिएटर और स्वतंत्र पत्रकार वही काम करते दिखाई दिए, जो कभी केवल बड़े मीडिया संस्थानों की पहचान माना जाता था। वे न केवल छात्रों से बात कर रहे थे, पुलिस कार्रवाई को रिकॉर्ड कर रहे थे, घटनास्थल से लगातार लाइव अपडेट दे रहे थे बल्कि आंदोलन की पृष्ठभूमि भी समझा रहे थे।
पहली बार बड़ी संख्या में युवाओं ने महसूस किया कि सूचना का सबसे विश्वसनीय स्रोत यही लोग हैं, न कि मुख्यधारा का मीडिया।
इस बदलाव के संकेत पिछले कुछ वर्षों से दिखाई दे रहे थे। रायटर्स इंस्टीट्यूट डिजिटल न्यूज रिपोर्ट लगातार यह बात बता रही है कि भारत में समाचारों पर भरोसा पहले की तुलना में कमजोर हुआ है। हाल के वर्षों की रिपोर्टों में समाचारों पर विश्वास लगभग 39–43 प्रतिशत के बीच दर्ज किया गया है, जबकि बड़ी संख्या में लोगों ने स्वीकार किया कि वे कई बार जानबूझकर समाचारों से दूरी बना लेते हैं।
दूसरी ओर, युवाओं के बीच समाचार पाने का सबसे बड़ा और तेज़ माध्यम अब टेलीविजन नहीं, बल्कि मोबाइल फोन हैं। बीते कुछ सालों में यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स और दूसरे डिजिटल मंचों ने सूचना के प्रवाह की धारा ही बदल दी है। पहले समाचार केवल प्रसारित, प्रकाशित होते थे, लेकिन अब उनकी पड़ताल भी की जाती है।
यही परिवर्तन जेन ज़ी की सबसे बड़ी पहचान है। वह अलग-अलग स्रोतों से जानकारी लेती है, वीडियो का सत्यापन करती है, सरकारी दस्तावेज़ भी पढ़ती है और स्वतंत्र पत्रकारों को भी सुनती है। और उसके बाद अपनी कोई धारणा बनाती है। उसकी भाषा अलग है, उसके संवाद के माध्यम अलग हैं और उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति भी अलग है। वह मीम, व्यंग्य, रील और लाइव स्ट्रीम को भी लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा मानती है।
पारंपरिक मीडिया ने लंबे समय तक इस बदलाव को हल्के में लिया, लेकिन 20 जुलाई ने दिखा दिया कि यह बदलाव अस्थायी नहीं, संरचनात्मक है। इस पीढ़ी की मीडिया से अपेक्षा स्पष्ट है। उसे सत्ता समर्थक या विभाजनकारी पत्रकारिता नहीं चाहिए। उसे केवल सत्ता विरोधी पत्रकारिता भी स्वीकार नहीं है। उसे पक्ष नहीं, तथ्य और प्रमाण चाहिए।
20 जुलाई के बाद भारतीय मुख्यधारा मीडिया कैसी होगी? इसका उत्तर आसान नहीं है। अब उसके सामने विकल्प पहले जैसे नहीं रहे। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, सूचना का नियंत्रण अब केवल मुख्यधारा के मीडिया के पास नहीं, बल्कि सड़क और मोबाइल स्क्रीन पर भी है। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है।
आने वाले वर्षों में यही पीढ़ी समाचार भी चुनेगी, सरकार भी और मीडिया की विश्वसनीयता भी तय करेगी। जो मीडिया जनता से संवाद करेगा, वही प्रासंगिक रहेगा; जो केवल सत्ता या केवल विरोध का मुखपत्र बनेगा, उसकी प्रासंगिकता घटती जाएगी।
दरअसल, मीडिया कैसी होनी चाहिए? इसका उत्तर लोकतंत्र ने बहुत पहले दे दिया था। पत्रकारिता का पहला दायित्व सत्ता या विपक्ष के साथ खड़ा होना नहीं, जनता के साथ खड़ा होना है। उसका काम सरकार गिराना या बचाना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने रखना है। सत्ता से कठिन सवाल पूछना जितना उसका धर्म है, उतना ही विपक्ष से भी जवाब मांगना।
शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण और नागरिक अधिकारों जैसे विषय किसी भी लोकतंत्र के मूल प्रश्न हैं। यदि मीडिया इन्हें हाशिए पर रखेगा, तो धीरे-धीरे स्वयं भी हाशिए पर चला जाएगा।
यह आंदोलन अपने तात्कालिक राजनीतिक परिणाम भी छोड़ गया। राजनीतिक घटनाएँ समय के साथ इतिहास बन जाती हैं। संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न इतिहास में अधिक समय तक दर्ज रहता है। 20 जुलाई ने केवल सरकार की जवाबदेही का प्रश्न नहीं उठाया। उसने मीडिया से भी पूछा कि लोकतंत्र में उसकी भूमिका क्या है।
क्या वह सत्ता और जनता के बीच पुल बनेगा या दोनों के बीच बढ़ती दूरी का दर्शक? क्या वह टीआरपी से ऊपर उठकर सार्वजनिक सरोकारों को प्राथमिकता देगा या हर बड़े जनांदोलन को तब तक देखता रहेगा, जब तक उसमें टकराव का दृश्य न आ जाए?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि 20 जुलाई ने भारतीय पत्रकारिता के सामने एक ऐसा आईना रख दिया है, जिसमें उसे अपना चेहरा देखना ही होगा। क्योंकि लोकतंत्र में अंततः वही मीडिया टिकता है, जिस पर जनता भरोसा करती है।
20 जुलाई ने केवल एक आंदोलन नहीं दिखाया। उसने यह भी बता दिया कि जब जनता को अपने सवालों के साथ अकेला छोड़ दिया जाता है, तो वह अपना मीडिया स्वयं बना लेती है। लोकतंत्र में पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताक़त सत्ता की निकटता नहीं, जनता का विश्वास है। आने वाले वर्षों में भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी परीक्षा भी यही होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पत्रिका यंग इंडियन के प्रभारी रहे हैं)