पंजाब में फरवरी 2027 को नई विधानसभा के गठन हेतु चुनाव होने हैं, जिसके लिए वहां राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। सभी दल अपने राजनैतिक अस्त्र, शस्त्र निकाल रहे हैं। वर्तमान में वहां भगवंत मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार है जिसके खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल है।
जमीनी स्थिति यह है कि सत्ता की लड़ाई आप तथा कांग्रेस के बीच है पर आप के विरोध में माहौल और कांग्रेस की आपसी गुटबाजी के बीच अपने सदाबहार गठबंधन अर्थात केंद्रीय चुनाव आयोग, केंद्रीय एजेंसियों एवं चहेते उद्योगपतियों की अकूत दौलत के साथ भारतीय जनता पार्टी भी पंजाब की सत्ता पर कब्जे के मंसूबे पाल रही है। चूंकि वह समुदायों में विभाजन के बिना कोई चुनाव नहीं लड़ सकती और यहां हिंदू मुस्लिम का एंगल नहीं है तो हिंदू सिक्ख के बीच दरार चौड़ी करने में लग गई है।
इसमें उसे सबसे बड़ा मौका मिला जब पंजाब के अस्सी-दशक के हालातों, उसके युवाओं के साथ हुई ज़्यादतियों बनी फिल्म घल्लू घारा जिसका नाम बदलकर पहले पंजाब 95 किया गया फिर अंत में सतलुज के नाम से भाजपा के नजदीकी सुभाष चंद्र गोयल के ओटीटी प्लेटफार्म ज़ी5 पर रिलीज़ किया गया और दो दिन में सरकारी दबाव के चलते फिल्म को हटा भी दिया गया। यह बेहद हैरान करने वाला फैसला है।
फ़िल्में समाज का दर्पण होती हैं, समाज में घटित विशेष घटनाओं पर पहले भी अनेक फिल्में बनी हैं और उन्होंने समाज को जागृत किया है, यह फिल्म भी पंजाब में आतंकवाद के दौर में वहां के नौजवानों पर हुई ज्यादतियों को रेखांकित करती है। जब सरकार और उसकी विचारधारा को प्रमोट करने हेतु प्रोपेगेंडा फिल्मों को करमुक्त कर रिलीज किया जाता तो सच्ची घटनाओं पर आधारित इस फिल्म को क्यों दर्शकों से महरूम किया गया?
सबसे बड़ी बात कि उस दौर में तो भाजपा की न प्रदेश में और न ही केंद्र में सरकार थी, यह तो उस कालखंड के सिस्टम की बेरहमी पर आधारित फिल्म है जब केंद्र तथा राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। दरअसल चुनाव के मद्देनजर इसके जरिए वह हिंदू सिक्ख संबंधों में दरार चौड़ी करना चाहती है। केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू की राजनीतिक बयानबाज़ी में फिल्म *सतलुज* की सारी टीम को परे रख केवल फिल्म के स्टार दिलजीत दोसांझ पर निशाना साधा गया है।
गौरतलब है कि कोई भी फिल्म पूरी यूनिट की मेहनत से मुकम्मल होती है जिसमें सभी का अपना योगदान होता है। अभिनेता फिल्म के कहानीकार की रचना पर अपने डायरेक्टर के दिशा निर्देश पर अभिनय करता है। रवनीत बिट्टू का केवल दिलजीत पर निशाना साधने का मूल कारण समझने से पहले आइए जरा इस फिल्म को मुक़म्मल रूप देने वाली टीम पर नजर डालते हैं:
फिल्म निर्माता रॉनी स्क्रूवाला, हनी त्रेहन और अभिषेक चौबे हैं। फिल्म निर्देशक हनी त्रेहन हैं जबकि लेखक हनी त्रेहन, निरेन भट्ट और उत्सव मैत्रा। नैरेटर योगेश ग्रोवर हैं और संगीत एवं छायांकन क्रमश: के मोहनन और मार्क मॉर्डर का है। मुख्य कलाकारों में दिलजीत दोसांझ के अलावा अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, कंवलजीत सिंह, गीतिका विद्या ओहल्यान और राहुल मित्रा आदि हैं।
अब यहीं बड़ा सवाल खड़ा होता है कि निशाने पर सिर्फ़ दिलजीत दोसांझ को ही क्यों लिया जा रहा है? सभी को जानकारी है कि फिल्म की कहानी कैसी होगी, किस विषय पर होगी, इसमें किस अभिनेता, अभिनेत्री को लेना है यह फिल्म के निर्माता, निर्देशक और कहानीकार तय करते हैं।
सभी को छोड़कर केवल दिलजीत पर राजनीतिक हमलों का निहितार्थ साफ इंगित करता है कि इन दक्षिणपंथी ताकतों को फिल्म से दिक्कत तो है ही उससे अधिक एक कामयाब सिक्ख अभिनेता से है जो अपनी मेहनत से इस मुक़ाम पर पहुंचा है और अभी भी जमीन से जुड़ा है तथा अपने राज्य और समाज की समस्याओं पर भी मुखरता से काम कर रहा है।
दिलजीत के प्रति इनकी नफरत कोई पहली बार नहीं है, किसान आंदोलन में दिलजीत की सक्रियता और सहयोग पर इनकी चिढ़ को सभी ने देखा था। दिलजीत की पिछली फिल्म सरदारजी 3 जिसमें उनकी अभिनेत्री हानिया आमिर पाकिस्तानी मूल की थी को भी प्रतिबंधित कराया था और दिलजीत को देशद्रोही, खालिस्तानी, पाकिस्तानी कहा गया था।
भाजपा और उससे जुड़े संगठनो ने पहले ही फिल्म इंडस्ट्री को सांप्रदायिक आधार पर बांट दिया है। जिस मायानगरी ने जाति,धर्म से ऊपर उठकर समाज के गंभीर मुद्दों पर उसे जागरूक करने का, आम दर्शकों को तनावरहित रखने का, विदेशों में अपनी संस्कृति को बढ़ावा देने का, सरकार के राजस्व में बड़ा योगदान देने का, पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया आज वह सांप्रदायिक आधार पर विभाजित होकर केवल एक विचारधारा की बंधक बनाई जा रही है।
अपनी सत्ता को बनाए रखने हेतु खुलकर प्रोपोगेंडा फिल्मों को प्रोत्साहित कर असल इतिहास से गुमराह किया जा रहा है।
हमारी चिंता और चेतावनी भी इस सरकार को है कि अपनी घटिया राजनीति चमकाने के लिए अकेले दिलजीत को निशाना बनाकर पंजाब के लोगों को गुमराह करना बंद करे, बिना ऊपरी प्रश्रय के रवनीत बिट्टू की इतनी हैसियत नहीं है। पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है, बेहद भावुक जनता है, बड़ी मुश्किल से वो अपने जख्मों को भरने में तल्लीन हैं। ऐसे में बिट्टू का हिंदू सिक्ख में विभाजन का प्रयोजन पंजाब की दिखती शांति को हिंसा के नए दौर में पहुंचा सकता है।
सीमावर्ती राज्यों में अशांति का बड़ा खामियाजा देश ने पंजाब, जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों में पहले ही काफी भुगत लिया है, देश को फिर उसी दौर में केवल अपनी सत्ता हेतु धकेलना भयंकर तबाही का लंबा दौर ला सकता है। बिट्टू या उसके समर्थक सिद्ध करें कि कैसे यह फिल्म समाज के लिए हानिकारक है? क्या इसमें सांप्रदायिक तनाव का विषय है?
यह फिल्म विशुद्ध रूप से 90 के दशक में सिस्टम की क्रूरता को रेखांकित करती है जिसमें कई निर्दोष सिक्ख युवाओं को आतंकवादी बताकर एनकाउंटर के जरिए खत्म कर दिया गया था। इसका तथ्यात्मक सच अमृतसर कोऑपरेटिव बैंक के डायरेक्टर से मानवाधिकार कार्यकर्ता बने जसवंत सिंह खालड़ा ने सामने लाया था, जिनकी भी पुलिस हिरासत में ही हत्या कर दी गई थी।
खालड़ा की हत्या की जांच सीबीआई ने की थी और चार पुलिस कर्मियों को आजीवन कारावास की तथा अन्य आरोपियों को सात सात वर्षों की कैद दिलाई थी। दक्षिणपंथियों की नफरत और अज्ञानता का एक और बड़ा उदाहरण यह है कि ये लोग प्रलाप कर रहे हैं कि जसवंत खालड़ा का संबंध आतंकवादियों से था। सनद रहे कि वह स्वतंत्रता सेनानी परिवार से आते थे और बड़े सरकारी पद पर थे।
उनके दादाजी सरदार हरनाम सिंह जी को अंग्रेजों ने 10 वर्षों तक घर पर नजरबंद कर बाद में फांसी दे दी गई थी। उनके पिता सरदार करतार सिंह जी ने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया था। उसी राह पर चलकर जसवंत सिंह भी अक्टूबर 1995 में शहादत को प्राप्त हुए।
शहीद जसवंत सिंह खालड़ा ने प्रामाणिक आंकड़ों के साथ 25000 सिक्ख युवाओं की पुलिसिया बर्बरता में हुई हत्याओं को सामने रख पुलिसिया और सरकारी गुंडागर्दी को सामने रखा था जिसे राजनीतिक सिस्टम का भी पूरा प्रश्रय था। फिल्म सतलुज भी उसी नंगे सच को देश और समाज के समक्ष लाने के ध्येय से बनाई गई थी पर बेशर्म सिस्टम को यह नागवार गुज़रा नतीज़ा फिल्म को हटा दिया गया।
एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि इस सरकार को सच से चिढ़ है और प्रोपेगेंडा से लगाव है। कश्मीर फाइल्स, केरल स्टोरी, उरी द सर्जिकल स्ट्राइक, आर्टिकल 370, बारामूला, धुरंधर, धुरंधर द रिवेंज, द ताशकंद फाइल्स, द वैक्सीन वार, द बंगाल फाइल्स आदि कई प्रोपेगेंडा फिल्म हैं जिन्हें राजनैतिक लाभ के लिए बनाया गया और चुनावों के दौरान रिलीज़ किया गया था। जबकि सच पर आधारित सतलुज फिल्म को रोक दिया गया।
एक बात सरकार बेहतर समझ ले पंजाब की तासीर बहुत भिन्न है। कभी दिल्ली से लेकर कंधार तक उसकी सीमाएं थी जिसे बार-बार तोड़कर छोटी की गई अफगानिस्तान अलग हुआ, कश्मीर अलग रियासत बनी, दिल्ली अलग की गई, पाकिस्तान अलग देश बनाया गया, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा अलग राज्य बनाया गया, चंडीगढ़ को केंद्र शासित बनाया गया। इसके बावजूद पंजाब भारत की एकता और अखंडता तथा उसकी समृद्धि में अपनी अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।
सरकार उनकी सहनशक्ति की अनवरत परीक्षा न ले। केंद्र ने तीन काले कृषि कानूनों को थोपने की धुन में उनकी पहली परीक्षा ली नतीजा शांतिपूर्ण किसान आंदोलन के जरिए किसानों ने सरकार को ही झुका दिया, अपने राजनीतिक कैरियर में पहली बार मोदी जी को किसानों के आगे झुकना पड़ा।
दूसरी बार मोदी जी ने पंजाब को बदनाम करने हेतु कहा था कि अपने मुख्यमंत्री से कह देना कि पीएम यहां से जिंदा वापस जा रहे हैं नतीजा राज्य में मोदी जी और अधिक अलोकप्रिय हो गए। अब तीसरी बार इस फिल्म के जरिए पंजाब और पंजाबियत को घायल करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है जिसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे।
भाजपा के लिए यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है यदि उस दौर के पीड़ितों के जख्म हरे हो गए तो इसलिए भाजपा के रणनीतिकार पंजाब के युवाओं की लाशों पर राजनीतिक रोटियां न सेकें। आपके सत्ता की हवस में पंजाब नए सिरे से अराजकता के भंवर में उलझ सकता है जिसका दुष्परिणाम सारे देश को भुगतना पड़ेगा। सत्ता की हनक में हर जगह अपनी संकीर्ण सोच को थोपना सरकार को भारी पड़ सकता है।
(परमजीत बॉबी सलूजा का लेख)