लोकतंत्र को समझने की सबसे बड़ी भूल तब होती है, जब हम समाज और राजनीति के बीच का अंतर मिटा देते हैं। समाज की अपनी संरचनाएँ होती हैं—जाति, वर्ग, भाषा, धर्म, क्षेत्र और संस्कृति। लेकिन राजनीति का कार्य इन संरचनाओं की केवल गिनती करना नहीं, बल्कि उन्हें एक व्यापक सार्वजनिक उद्देश्य में रूपांतरित करना है। इसलिए यह मान लेना कि मतदाता केवल अपनी जाति के अनुसार मतदान करता है, लोकतंत्र की आत्मा को समझने से इंकार करना है।
भारत का मतदाता अपनी जाति को जानता है, लेकिन वह अपने समय के राजनीतिक प्रश्नों को भी पहचानता है। चुनाव के दिन वह केवल यह तय नहीं करता कि उसका उम्मीदवार कौन है; वह यह भी तय करता है कि देश और समाज किस दिशा में आगे बढ़े। यही कारण है कि हर चुनाव का एक निर्णायक राजनीतिक प्रश्न होता है। कभी वह लोकतंत्र की रक्षा बन जाता है, कभी सामाजिक न्याय, कभी भ्रष्टाचार, कभी विकास, कभी रोज़गार, कभी महँगाई, कभी राष्ट्रीय सुरक्षा, तो कभी संविधान और संस्थाओं की विश्वसनीयता।
राजनीति का इतिहास बताता है कि जब कोई प्रश्न जनता के जीवन के केंद्र में आ जाता है, तब वह जातीय सीमाओं से भी बड़ा हो जाता है। 1977 में भारत ने आपातकाल के विरुद्ध मतदान किया। यदि जाति ही अंतिम सत्य होती, तो उस चुनाव में सत्ता परिवर्तन संभव नहीं था। 1989 में भ्रष्टाचार के प्रश्न ने जनमत को बदला। 1990 के दशक में सामाजिक न्याय का प्रश्न निर्णायक बना। बाद के वर्षों में विकास, कल्याणकारी योजनाएँ, राष्ट्रीय सुरक्षा, नेतृत्व और शासन की गुणवत्ता जैसे प्रश्न अलग-अलग चुनावों के केंद्र में आए। हर बार जातियाँ मौजूद रहीं, लेकिन जनता का निर्णय उस समय के सबसे बड़े राजनीतिक प्रश्न के अनुसार बदला।
यही कारण है कि चुनावी राजनीति को केवल जातीय गणित से समझना लोकतंत्र की जटिलता को अत्यधिक सरल बना देना है।
प्रसिद्ध राजनीति शास्त्री रजनी कोठारी ने भारतीय राजनीति को समझाते हुए कहा था कि राजनीति केवल जाति से प्रभावित नहीं होती; राजनीति स्वयं जाति को भी बदलती है। यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि चुनाव पुराने सामाजिक समीकरणों को जस का तस स्वीकार नहीं करते; वे नए गठबंधन बनाते हैं, नई राजनीतिक भाषाएँ गढ़ते हैं और समाज को नई दिशा भी देते हैं।
डॉ अम्बेडकर के लिए लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं था; वह सामाजिक परिवर्तन का संवैधानिक साधन था। डॉ राम मनोहर लोहिया ने राजनीति को सामाजिक गैर-बराबरी के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम बनाया। जयप्रकाश नारायण ने जनता को यह विश्वास दिलाया कि नागरिक केवल मतदाता नहीं, बल्कि परिवर्तन का निर्माता है। इन तीनों की वैचारिक यात्राएँ अलग थीं, पर वे जनता की राजनीतिक चेतना पर विश्वास करते थे, केवल उसकी सामाजिक पहचान पर नहीं।
आधुनिक चुनावी अध्ययनों ने भी यही स्थापित किया है कि मतदाता एक-आयामी नहीं होता। वह एक साथ किसान, कर्मचारी, युवा, महिला, उद्यमी, करदाता, उपभोक्ता, किसी जाति का सदस्य और एक संवैधानिक नागरिक होता है। चुनाव के समय इनमें से कौन-सी पहचान निर्णायक बनेगी, यह उस समय के राजनीतिक वातावरण और केंद्रीय मुद्दे पर निर्भर करता है। इसलिए एक ही जाति का मतदाता अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों को वोट दे सकता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता है।
यहीं मीडिया और राजनीतिक विश्लेषण की भी एक सीमा दिखाई देती है। चुनाव परिणाम आते ही सबसे पहले जातीय प्रतिशतों की चर्चा शुरू हो जाती है, जबकि अधिक बुनियादी प्रश्न अक्सर छूट जाता है—जनता किस राजनीतिक प्रश्न का उत्तर दे रही थी? यदि यह प्रश्न समझ में आ जाए, तो चुनाव परिणाम भी अधिक स्पष्ट हो जाते हैं।
लोकतंत्र का अर्थ केवल प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं है; लोकतंत्र का अर्थ है कि जनता समय-समय पर राष्ट्र की प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित करती है। वह यह तय करती है कि अगले पाँच वर्षों में सत्ता से उसका सबसे बड़ा आग्रह क्या होगा। इसलिए चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि सार्वजनिक चेतना का उत्सव है।
यह कहना कि भारतीय मतदाता केवल जाति पर वोट करता है, उसके राजनीतिक विवेक को कम करके आँकना है। सही बात यह है कि जाति मतदाता की सामाजिक वास्तविकता है, लेकिन उसका मतदान उस समय के सबसे बड़े राजनीतिक प्रश्न, नेतृत्व की विश्वसनीयता, शासन के अनुभव और भविष्य की आशाओं के सम्मिलित मूल्यांकन का परिणाम होता है।
भारतीय लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि यहाँ जनता हर चुनाव में केवल सरकार नहीं बदलती; वह राजनीति का एजेंडा भी बदल देती है। जो दल उस एजेंडे को पढ़ लेता है, वही जनता का विश्वास जीतता है। और जो दल केवल सामाजिक अंकगणित में उलझा रह जाता है, वह अक्सर जनता की राजनीतिक मनःस्थिति को समझने से चूक जाता है।
इसलिए चुनावों को जातियों की जनगणना के रूप में नहीं, बल्कि जनता के राजनीतिक विवेक के ऐतिहासिक निर्णय के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। यही लोकतंत्र का सार है।
(इंजीनियर संतोष यादव, सामाजिक -राजनीतिक कार्यकर्ता और पूर्व प्रदेश सचिव, जेडीयू बिहार हैं।)