सलाम मार्क टली! 

मशहूर पत्रकार मार्क टली का कुछ देर पहले आज दिल्ली में निधन हो गया। लंबे समय तक वह भारत में बीबीसी के ब्यूरो चीफ रहे। बीबीसी की औपचारिक सेवा से अवकाश-प्राप्ति के बाद भी वह पत्रकार और लेखक  के रूप में काफी समय तक सक्रिय रहे। वह तकरीबन 90 वर्ष के थे और कुछ महीनों से अस्वस्थ चल रहे थे। उनका निधन भारतीय पत्रकारिता की बड़ी क्षति है। 

जिन दिनों हम जैसे लोग पत्रकारिता में आये, मार्क टली  देश के एक बेहद प्रतिष्ठित और सक्रिय पत्रकार के रूप में स्थापित हो चुके थे। देश के शीर्ष पदों पर बैठे सत्तारूढ़ नेता हों या विपक्ष के बड़े नेता हों, मार्क टली के लिए इनके पास पहुंचना और खबरें हासिल करना बहुत आसान था। उन्होंने अपने जीवन में खूब घूमा, खूब लिखा और खूब बोला!

कहने को तो वह अंग्रेज थे क्योंकि अंग्रेज माता-पिता की संतान थे पर सच पूछिये तो वह पक्के भारतीय थे। कलकत्ता में जन्मे अंग्रेज  हिंदोस्तानी! 

मार्क ने रिपोर्टिंग और विश्लेषण के अलावा कई किताबें लिखीं। मैंने सबसे पहले उनकी ‘अमृतसर: मिसेज गांधी लास्ट बैटिल’ पढ़ी थी, जो उन्होंने अपने दोस्त-सहयोगी सतीश जैकब के साथ लिखी। द हार्ट ऑफ इंडिया, इंडिया स्लो मोशन, नो फुल स्टाॅप इन इंडिया और नाॅन स्टाॅप इंडिया सहित कई किताबें हैं उनकी! 

सच पूछिये तो भारत सहित समूचे दक्षिण एशिया में मार्क अपनी रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक खबरों के लिए अस्सी के दशक में ही ‘लिजेंन्ड’ बन चुके थे। भारत के हर प्रमुख नेता और अनेक गणमान्य लोगों से उनके अच्छे प्रोफेशनल सम्बन्ध रहे। एक बार मैं चुनाव रिपोर्टिंग के लिए आंध्र प्रदेश में था और अविभाजित आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से मिलने का समय लेकर उनके घर पहुंचा।

पता चला, अभी नायडू साहब मार्क टली से गुफ़्तगू कर रहे हैं। अगर भूल नहीं रहा तो मार्क उन दिनों बीबीसी से रिटायर हो चुके थे और संभवत: वह कोलकाता से छपने वाले ‘द टेलीग्राफ’ के लिए चुनाव पर लगातार लिख रहे थे। उनके बाहर निकलने के बाद मैं अंदर बुलाया गया। वह विदेशी मूल के ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिसे लोगों की सिर्फ प्रतिष्ठा और प्रशंसा मिलती थी। आमतौर पर कोई निजी कारक या किसी तरह की ‘नकारात्मकता’ उनका पीछा नहीं करती थी। 

निस्संदेह, भारत में बीबीसी को मार्क और उनकी टीम के कारण गांव से राजधानी तक अभूतपूर्व प्रतिष्ठा मिली। नवभारत टाइम्स के एक युवा रिपोर्टर के तौर पर एक बार मैं बिहार के गया जिले में किसी खास मामले की रिपोर्टिंग करने गया था। वहां अपने एक संपर्क सूत्र के यहां पहुंचा तो देखा उनके दरवाजे पर सात-आठ लोग खामोशी से बीबीसी की बुलेटिन सुन रहे हैं।

अपने संपर्क सूत्र से बातचीत करने के लिए हमें बीबीसी की बुलेटिन खत्म होने का इंतजार करना पड़ा, जबकि उन दिनों बिहार में नवभारत टाइम्स के नये संस्करण की भी काफी प्रतिष्ठा थी। लेकिन बीबीसी के समाचारों की विश्वसनीयता सबसे ऊपर थी।

तब माना जाता था कि किसी मुद्दे या घटना पर बीबीसी ने कोई समाचार दे दिया तो वह ‘अटल सत्य’ है! भारत में बीबीसी की रिपोर्टिंग को यह प्रतिष्ठा मार्क और उनकी टीम ने दिलाई! ब्रेकिंग न्यूज के मामले में भी मार्क और उनकी टीम का शानदार रिकॉर्ड रहा। दुनिया को इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या की पहली खबर बीबीसी से ही मिली थी। यह मार्क टली ही थे, जिन्होंने 31 अक्टूबर, 1984 को श्रीमती गांधी की नृशंस हत्या की खबर सबसे पहले प्रसारित की। 

हालांकि सत्ता-प्रतिष्ठान के अंदर की कई बड़ी और जरूरी खबरों के मामले में उन दिनों भारत के अंग्रेजी और कुछ भाषायी अखबारों का रिकॉर्ड भी अपेक्षाकृत बेहतर था और वैसी कई खबरों को ब्रेक करने के मामले में बीबीसी पीछे रह जाता था। लेकिन उन खबरों के अपने फॉलोअप से वह फिर श्रोताओं के बीच लोकप्रियता बरकरार रखता था। मार्क एक अच्छे प्रोफेशनल थे, पर उन्हें ‘पत्रकारिता का भगवान’ बनाना भी गलत होगा क्योंकि किसी भी पेशे का कोई ‘भगवान’ नहीं होता।

भुवनेश्वर एयरपोर्ट पर मार्क टुली के साथ लेखक और पत्रकार उर्मिलेश

उनकी रिपोर्टिंग और निजी बातचीत में भी मैने महसूस किया किया कि हमारे बीच के अनेक अच्छे पत्रकारों की तरह उनकी पत्रकारिता में भी कई दफा निजी पसंद या नापसंद झलकती थी। उनके दौर में या उनके बाद भारत में बीबीसी जैसे संस्थानों ने जाहिर वजहों से सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर देश के बहुसंख्यक आम लोगों या उनकी पैरोकारी करती राजनीति (सोशल डेमोक्रेट्स, सामाजिक न्यायवादी या वामपंथियों) के प्रति उतनी सदाशयता कभी नहीं दिखाई जितनी प्रभावशाली अमीरों-कुलीनों की राजनीति के साथ दिखाई! 

प्रोफेशनल कामकाज के दौरान हम मार्क से कई बार मिले। लेकिन वह प्रोफेशनल ही रही। लेकिन निजी मुलाकात काफी बाद में हुई। कुछ साल पहले की बात है। संभवत: 2015 की। कलिंगा लिटरेचर फेस्टिवल के किसी शुरुआती कार्यक्रम में मार्क और प्रभु चावला के साथ मैं भी एक पैनेलिस्ट था। वह डिस्कशन भारतीय मीडिया के किसी खास पहलू पर केंद्रित था। संयोगवश हम लोग भुवनेश्वर के एक ही होटल में रुके थे। ओडिशा में हम लोग दो या तीन दिन रहे। साथ में खाना-पीना और घूमना भी हुआ। 

कार्यक्रम के बाद शाम होने से कुछ पहले मार्क मेरे कमरे में आये और अपने खास अंदाज वाली हिंदी में बोले: चलते हैं बाहर कहीं बियर पियेंगे! फाइव स्टार में मुफ्त की बियर छोड़कर हम अपने पैसे की बियर पीने एक ढाबेनुमा गोल आकार वाले बार में गये, जहां शराब की गंध के साथ सिगरेट और बीड़ी के धुंए के मेल से विचित्र काॅकटेल बन रही थी! वहां निम्न मध्य वर्गीय साधारण लोग दारू पी रहे थे। अमीर न होने के बावजूद मुझे जगह बिल्कुल पसंद नहीं आई। सिगरेट के धुंए से मैं खांसने लगा था! मार्क ने बाहर निकलकर गाड़ी के ड्राइवर को खूब सराहा! हम ऐसी ही जगह बियर पीना चाहते थे! मैंने इस पर असहमति जताई तो मार्क हंसने लगे! 

कोणार्क में दोनों पत्रकार एक साथ।

अगले दिन लंच के लिए हम पुरी में थे। हमें कोणार्क भी जाना था। ड्राइवर ने हमें एक ऐसे रेस्टोरेंट ले गया, जिसका नाम.संभवत: वाइल्ड ग्रास था। उसके मालिक पढ़े-लिखे इंसान थे। मार्क को फौरन पहचान गये। उन्होंने हम तीनों को बेहतरीन लंच कराया। बिल चुकता करने लगा तो लेने से साफ मना कर दिया। 

उसी दिन मार्क टली हमें (साथ में स्तम्भकार और राष्ट्रपति के आर नारायणन के ओएसडी रह चुके एस एन साहू भी थे) चाय पीने के लिए पुरी स्थित एक ऐसे होटल लेकर गये जो रेलवे का था या रेलवे ने अपने उस होटल को किसी कांट्रैक्टर को दे रखा था। वहां पता चला कि मार्क का ओडिशा और खासतौर पर पुरी से खास रिश्ता है। उनके पिता संभवत: रेलवे से सम्बद्ध किसी कार्पोरेशन की नौकरी के लिए ही ब्रिटेन से भारत आये थे। उन्होंने कलकत्ता और दार्जिलिंग में ज्यादा वक्त तक काम किया। वह पुरी भी आते-जाते रहे। 

परिवार कलकत्ता में बसा था। इसलिए मार्क का जन्म कलकत्ता में ही हुआ। फिर वह ब्रिटेन में भी रहे। 

लेकिन अंतत: मार्क ने अपना देश भारत को ही चुना। 1935 में यहीं जन्मे और आज 25 जनवरी को यहीं से विदा हुए! 

मार्क गजब की शख्सियत थे! अच्छे और दिलचस्प इंसान थे। उन्होंने खूब घूमा और खूब लिखा-बोला। वन्डरफुल जिंदगी बिताई! सर विलियम मार्क टली आपके जाने का हमें गहरा दुख है! बहुत कम निजी मुलाकातों के बावजूद आप हमारी यादों में बने रहेंगे! कोणार्क में हम दोनों ने धूप से बचने के लिए जो हल्के लाल रंग का हैट खरीदा था, उसे आज मैं खोज रहा था! बड़े प्यार से आपने उसे मेरे सिर पर रखा। वह नहीं मिला जैसे आप फिर कभी नहीं मिलेंगे लेकिन उसे मैं खोज रहा था ताकि आपका वह स्पर्श महसूस कर सकूं! 

सलाम और श्रद्धांजलि मार्क टली

(उर्मिलेश लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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