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तीन तलाक़: सरकार का विधेयक क्या सुप्रीम कोर्ट की भावना के मुताबिक़ है?

दिलीप ख़ान

इंस्टैंट तीन तलाक़ (एक बार में तीन तलाक़) ख़त्म होना चाहिए, इसपर शायद ही किसी की असहमति हो।

लेकिन:-

1. केंद्र सरकार का विधेयक क्या सुप्रीम कोर्ट की भावना के मुताबिक़ है?

2. 22 अगस्त 2017 को कोर्ट ने इसे असंवैधानिक, अमान्य और ग़ैर-इस्लामिक घोषित किया था।

3. कोर्ट के मुताबिक़ इस्टैंट तीन तलाक़ को नहीं माना जाना चाहिए। यानी अगर कोई व्यक्ति तीन तलाक़ देता है तो उसके पास पत्नी को घर से बाहर निकालने या फिर दूर रहने के लिए कहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

4. अगर वो फिर भी ऐसा करता है तो घरेलू हिंसा क़ानून समेत कई क़ायदे है जिनके आधार पर मुक़दमा होना चाहिए।

5. अगर फिरके के बाक़ी लोग महिला के ख़िलाफ़ बलप्रयोग करते हैं तो उनपर मुक़दमा होना चाहिए।

6. अगर कोई मुल्ला-मौलाना तलाक़ की इस पद्धति को मान्यता देता है तो उसे तीन कोड़े लगाया जाना चाहिए।

7. लेकिन सरकार ने क्या किया? तीन तलाक़ देने वालों को तीन साल की जेल का प्रावधान किया। साथ ही पत्नी को भत्ता देने की व्यवस्था की। सुनने में ठीक लगता है, पर सोचिए…

8. कोर्ट ने कहा था कि तलाक़ अमान्य है। यानी सरकार को व्यवस्था ये करनी चाहिए कि तीन तलाक़ की मान्यता ही न हो। सरकार ने इसे ग़ैर-क़ानूनी कहा भी।

9. लेकिन अभी सरकार तीन साल जेल में बंद करेगी। दावा है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को आज़ादी मिलेगी। जेल बंद आदमी से ही भत्ता दिलवाएगी। भत्ता हमेशा आय के हिसाब से तय होता है। वो आदमी क्या भत्ता देगा?

10. दूसरा, तीन तलाक़ जब मान्य ही नहीं है तो पति-पत्नी को सरकार क्यों अलग कर रही है? अगर तीन साल जेल में किसी को बंद करोगे तो फिर दोनों के बीच बचेगा क्या? लौटकर वो तलाक-ए-सुन्नत देगा।

11. यानी सज़ा देने के साथ ही सैद्धांतिक तौर पर सरकार तीन तलाक़ को मान्यता दे रही है।

12. मांग थी तलाक़-ए-बिद्दत को अमान्य करार देने की। ये लोग ले आए सज़ा। अब इस बहाने भी जेल भरो ऑपरेशन चालू रह सकता है।

कुछ अन्य ज़रूरी बातें

तलाक़ पर बात चली है तो… तलाक़ एक प्रोग्रेसिव व्यवस्था है। शादी नाम की संस्था में घुटने से बेहतर है अलग हो जाना। लेकिन समाज का जो मौजूदा ढांचा है, उसमें तलाक़ के बाद पिसने का बोझ महिलाओं के सिर पर आ टिकता है।

इसे ऐसे समझिए कि 2011 की जनगणना के मुताबिक़ देश में तलाक़शुदा लोगों की संख्या 13 लाख 62 हज़ार है, लेकिन इनमें पुरुषों की संख्या साढ़े चार लाख और महिलाओं की 9 लाख से ज़्यादा है।

यानी जिन पुरुषों ने तलाक़ दिया/लिया, महिलाओं के मुकाबले उनमें से दोगुने लोगों ने दोबारा शादी कर ली। महिलाओं की सामाजिक कंडीशनिंग और देश का सामाजिक ढांचा उन्हें ऐसा करने से रोकता है।

प्रोग्रेसिव व्यवस्था की बात को भी आंकड़े पुष्ट करते हैं। मानव विकास सूचकांक में नंबर वन राज्य केरल में सबसे ज़्यादा तलाक़ होते हैं। अकेले 2014 में वहां साढ़े 47 हज़ार तलाक़ हुए। बिहार टॉप टेन में भी नहीं है। वहां लोग ‘मैनेज’ करके जी लेते हैं।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं।)

This post was last modified on December 3, 2018 7:39 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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