Thursday, March 23, 2023

झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में सख्ती से कब लागू होगा पेसा एक्ट?

विशद कुमार
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पेसा एक्ट (Panchayat Extension to Scheduled Areas Act) यानी पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए पारंपरिक ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा अधिनियमित एक कानून है। दरअसल अनुसूचित क्षेत्र भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची द्वारा पहचाने गए क्षेत्र हैं। यह अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए विशेष अधिकार देता है।

अनुसूचित क्षेत्र ऐसे स्थान हैं जहां मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों का वर्चस्व है। ये क्षेत्र 73वें संविधान संशोधन या पंचायती राज अधिनियम के अंतर्गत नहीं आते थे। पेसा अधिनियम का उद्देश्य भारतीय संविधान के भाग IX के प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित करना है। यह पंचायतों और ग्राम सभाओं को इन क्षेत्रों में स्वशासन की प्रणाली को लागू करने में सक्षम बनाता है।

यह अधिनियम अनुसूचित क्षेत्र में एक गांव के लिए ग्राम सभा की स्थापना की अनुमति देता है। प्रत्येक ग्राम सभा एक स्वायत्त निकाय के रूप में कार्य करेगी जो अनुसूचित क्षेत्र के कुछ पहलुओं, विशेष रूप से संसाधन प्रबंधन करती है। यह अधिनियम ग्राम पंचायतों को उन मामलों पर निर्णय लेने की भी अनुमति देता है जो सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन के साथ-साथ लघु वन उपज, भूमि और छोटे जल निकायों से संबंधित हैं। जिसे अनुसूचित क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरी की प्रथा के उन्मूलन के लिए प्रवासी मजदूरों का रिकॉर्ड भी रखने का भी अधिकार देता है।

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बता दें पिछले नवंबर 2022 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मध्यप्रदेश के शहडोल में आयोजित जनजातीय गौरव दिवस के राज्य स्तरीय समारोह में नियमावली का विमोचन कर पेसा एक्ट लागू किया। इसके साथ ही मध्य प्रदेश पेसा एक्ट लागू करने वाला देश का 7वां राज्य बन गया है। वहां आदिवासियों के हितों के संरक्षण के लिए बनाए गए इस एक्ट के लागू हो जाने से ग्राम सभा अब बहुत अधिक शक्तिशाली हो गई है।

वहीं झारखंड अलग राज्य के 22 वर्ष और पेसा कानून लागू होने का 25 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज तक झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पेसा कानून सख्ती से लागू नहीं हो पाया है। अतः राज्य में जो पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में भी त्रि-स्तरीय पंचायती चुनाव तीन बार हो चुके हैं, बावजूद इसके आज तक पेसा कानून का झारखंड में नियमावली नहीं बन पाया है। वहीं दूसरी ओर नगर पालिका व नगर परिषद का दो बार चुनाव हो चुका है और तीसरी बार चुनाव करवाने की तैयारी चल रही है। लेकिन केन्द्र से आजतक पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में चुनाव की कोई नियमावली बनी ही नहीं। तब सवाल उठता है कि झारखंड में पूर्व की सरकार व वर्तमान सरकार किस कानून के तहत नगर निगम व नगरपालिका का चुनाव पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में करवा रही है? क्या ये पेसा कानून का मजाक नहीं है?

जो संवैधानिक संस्था इस देश में कानून बनाते हैं, वहीं पूंजीपतियों की हित में उस कानून का खुल्लेआम खिल्ली भी उड़ाई जाती रही है। जबकि समता जजमेंट कहता है कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में केन्द्र व राज्य सरकार की एक इंच भी जमीन नहीं है। जो है वहां का ग्राम सभा की जमीन है। बावजूद इसके खुल्लेआम बिना ग्राम सभा की सहमति के जल, जंगल, जमीन की लूट फर्जी तरीके से जारी है। एक तरफ केन्द्र व राज्य की तरफ से आदिवासियों के पक्ष में लोक लुभावन योजनाएं व घोषणाएं लगातार जारी हैं, वहीं दूसरी तरफ उसके हक अधिकार के साथ लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है।

यह रही आदिवासी हित पर डपोरशंखी घोषणाओं की सरकार की बात। वहीं दूसरी तरफ राज्य का मीडिया की इस कानून के प्रति अज्ञानता भी चरम पर है। इस बाबत संयुक्त ग्राम सभा मंच का कहना है कि कुछेक को छोड़ दिया जाए तो पेसा एक्ट के मामले से संबंधित कोई भी कार्यक्रम अगर होता है तो उस खबर को यहां के मीडिया द्वारा गोल कर दिया जाता है।

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बता दें कि पिछले 24 दिसंबर 2022 को सरायकेला – खरसवां जिला के चांडिल प्रखंड में आसानी पंचायत के कान्दरबेड़ा ग्राम में रामसाई फुटबॉल मैदान में 26वीं पेसा दिवस समारोह का आयोजन संयुक्त ग्राम सभा मंच के बैनर तले किया गया था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कान्दरबेड़ा ग्राम के पारंपरिक ग्राम प्रधान मदन मुर्मू व कार्यक्रम का संचालन बाबूराम सोरेन ने किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष देवेन्द्र नाथ चंपिया, विशिष्ट अतिथि भोजन अधिकार के बलराम जी, सामाजिक कार्यकर्ता कुमार चंद्र मार्डी व मुख्य अतिथि झारखंड आंदोलनकारी डेमका सोय सहित ऑल इंडिया पीपल्स फोरम से जुड़े संयुक्त ग्राम सभा के आंदोलनकारी सुखलाल पहाड़िया, रत्न सिंह मुंडा, कर्मू मार्डी, राधाकृष्णन सिंह मुंडा व विभिन्न ग्राम से आये पारंपरिक ग्राम प्रधान लाया मांझी बाबा व सामाजिक कार्यकर्ता मंच पर मौजूद थे।

इस कार्यक्रम में विभिन्न गांवों से आये हुए सैकड़ों की संख्या में आदिवासी – मूलवासी उपस्थित थे। लेकिन इस पेसा कानून को लेकर किए गए कार्यक्रम को यहां के प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक दूरी बना लिया और इस आयोजन को छापने में एकाध लोगों को छोड़कर किसी ने भी थोड़ी सी भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। जबकि कार्यक्रम स्थल पर यहां के सभी लोकल पत्रकार बंधु उपस्थित थे। इस बाबत ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम से जुड़े संयुक्त ग्राम सभा के आंदोलनकारी सुखलाल पहाड़िया बताते हैं कि जब हमने इन मीडिया कर्मियों से सवाल किया कि इस पेसा को लेकर किए गए कार्यक्रम को कवरेज क्यों नहीं किया गया है तो उनका जवाब था कि स्थानीय खबरों के लेकर अखबार में स्थानाभाव रहता है। सुखलाल कहते हैं कि अगर यह कारण है तो हम मानते हैं झारखंड का मीडिया पेसा कानून के विरोधी ही नहीं आदिवासियों की स्वायत्तता के भी विरोधी है।

(वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट)

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