रांची। आज (13 फरवरी) को विभिन्न छात्र संगठनों ने शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव के खिलाफ UGC समता विनियम लागू कराने को लेकर “अखिल भारतीय वंचित अधिकार दिवस” मनाया।
ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी के बैनर तले छात्रों ने झारखंड की राजधानी के मोरहाबादी स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से शुरू होकर रांची विश्वविद्यालय के सेंटर लाइब्रेरी तक जुलूस निकाला और वहाँ सभा की गई।
प्रदर्शन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), आदिवासी छात्र संघ, छात्र राजद, एआईएसएफ और एनएसयूआई सहित कई छात्र संगठनों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया।
सभा को संबोधित करते हुए छात्र नेताओं ने कहा कि वह यूजीसी के “उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026” का स्वागत करते हैं, लेकिन इसके साथ यह मांग भी करते हैं कि इंजीनियरिंग, मेडिकल सहित सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में रोहित एक्ट की तर्ज पर ठोस गाइडलाइंस लागू की जाए और कैंपस में जातीय भेदभाव के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाए।
छात्र नेताओं ने कहा कि यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाना कि आगे की सुनवाई तक उसे टाल देना उचित नहीं है। विभिन्न आंकड़ों के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में वर्ष 2019 से 2024 के बीच जातीय भेदभाव की घटनाओं में 118% वृद्धि दर्ज की गई है।
उपस्थित सदस्यों ने रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी की संस्थानिक हत्याओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज भी जातीय उत्पीड़न के कारण छात्रों का पढ़ाई छोड़ना और आत्महत्या करना एक गंभीर सामाजिक संकट है। आज भी कैंपस में जातीय भेदभाव के साथ-साथ नस्लीय भेदभाव भी मौजूद है।
उत्तराखंड में एंजेल चकमा की हत्या का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें चीनी नस्ल का समझकर पीट-पीटकर मार दिया गया। सभी समुदायों के न्यायप्रिय लोगों से सख्त कानून बनाने और जागरूकता अभियान चलाने की अपील की।
छात्र नेताओं ने कहा कि जातीय उत्पीड़न भारत के सभी समुदायों में फैली कुरीति है। यह केवल अनपढ़ लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों में भी देखा जाता है। यह भी कहा कि धार्मिक पहचान के आधार पर किसी को दोयम दर्जे का नागरिक मानने और लिंचिंग करने वालों के खिलाफ भी इस कानून को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
आज विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को कभी परीक्षा में कम अंक दिए जाते हैं तो कभी इंटरव्यू में कम नंबर दिए जाते हैं। यदि ऐसा करने के बाद भी पीएचडी या नौकरी के लिए सभी मानदंड पूरे करने के बावजूद छात्रों को “एनएफएस (योग्य उम्मीदवार नहीं मिला)” बताकर बाहर कर दिया जाता है, तो उसका सीधा असर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े समुदायों के छात्रों पर पड़ता है।
उन्होंने पुनः सभी समुदायों के न्यायप्रिय लोगों से सख्त कानून बनाने और जागरूकता अभियान चलाने की अपील की।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)