‘आई लव मुहम्मद’ और ‘आई लव महादेव’ विवाद: तनाव, सड़कों पर उतरे लोग, बरेली में भीड़ पर लाठीचार्ज

बनारस। “आई लव मोहम्मद” पोस्टर विवाद महज़ एक पोस्टर का मामला नहीं, बल्कि यह हमारे समाज की संवेदनशील नसों और बिखरती सामाजिक डोर का आईना बन गया है।

बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर पर आपत्ति के बाद हालात बिगड़ गए। प्रदर्शनकारियों ने उग्र होकर पथराव किया। कुछ ही देर में भीड़ बैरिकेड तोड़ आगे बढ़ने लगी। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लाठियों की गूंज, चीख-पुकार और भगदड़। सड़कें तनाव से भर उठीं। इसी बीच बनारस में हिंदू संगठनों ने “आई लव महादेव” का अभियान छेड़ दिया।

25 सितंबर की दोपहर, जुमे की नमाज़ के बाद बरेली की गलियां अचानक बेचैनी से भर उठीं। नमाज़ से लौटते क़दम इस्लामिया ग्राउंड की ओर बढ़ने लगे, जहां मौलाना तौकीर रज़ा ने प्रदर्शन का आह्वान किया था। उनका आरोप था कि मुस्लिम समाज की सुनवाई नहीं हो रही और पुलिस निर्दोषों के अधिकार कुचल रही है।

सैकड़ों लोग पोस्टर-बैनर लिए सड़कों पर उतरे। चेहरों पर गुस्सा और आंखों में बेचैनी साफ झलक रही थी। आईएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रज़ा के बुलावे पर शुक्रवार की नमाज़ के बाद हाथों में “आई लव मोहम्मद” के पोस्टर थामे लोग मौलाना के घर और मस्जिद के पास जुटे। दोनों जगहें कोतवाली क्षेत्र में हैं और दूरी भी ज़्यादा नहीं।

घटना तब हुई जब मौलाना तौकीर रज़ा ने ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन स्थगित करने की घोषणा की। इससे भीड़ में असंतोष फैल गया। भीड़ और पुलिस आमने-सामने हो गए और झड़प शुरू हो गई। भारी मौके पर तैनात पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। नारे गूंजे, आवाजें उठीं और पुलिस की लाठियां बरस पड़ीं। नतीजा वही-टूटी चप्पलें, बिखरे जूते और घायल लोग।

बरेली की गलियों में घंटों तक टूटे सैंडल, बिखरे जूते और खून के धब्बे बिखरे रहे। श्यामगंज मार्केट, प्रेमनगर और सदर कोतवाली इलाका तनाव में डूब गया। दुकानदारों ने शटर गिरा लिए। महिलाएं खामोश खड़ी देखती रहीं। बच्चे सहमे हुए सिसकते रहे। लोग फुसफुसाते रहे थे, “हमारी रोज़ी-रोटी का क्या होगा? हमें तो बस मोहम्मद से मोहब्बत जतानी थी।”

टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर तस्वीरें दौड़ीं। पुलिस निहत्थों पर लाठियां चलाती दिखी। पुलिस का कहना था कि भीड़ ने पथराव किया, जबकि घायलों का कहना था, “हम तो नमाज़ पढ़कर लौट रहे थे, अचानक पुलिस ने लाठी चला दी।”

जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने पत्रकारों से कहा, “स्थिति अब सामान्य और नियंत्रण में है। पुलिस और प्रशासन ने पूरी सतर्कता बरती। समझाने की कोशिशें की गईं, लेकिन भीड़ अपने इरादों पर अड़ी रही। अब हालात काबू में हैं। शहर के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों लोग प्रदर्शन कर रहे थे, जिन्हें रोकने के लिए सुरक्षा बल तैनात किए गए।”

इसके बाद पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने एक हजार से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च किया। पुलिस ने कहा कि जुलूस और प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। लाठीचार्ज और भगदड़ के बाद पूरे बरेली में भारी पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई।

लाठीचार्ज के बाद मौलाना तौकीर रज़ा को पुलिस ने बारादरी क्षेत्र स्थित फाईक एंक्लेव में हाउस अरेस्ट कर लिया। बाद में उन्होंने एक वीडियो जारी करते हुए कहा, “हम तो केवल ज्ञापन देने की योजना बना रहे थे। कोई प्रदर्शन नहीं था। हमारा मकसद मोहम्मद साहब के प्रति मोहब्बत जताना था। हिंदू संगठनों के जुलूस सत्ता के संरक्षण में निकलते हैं, उनके नारे बिना रोक-टोक गूंजते हैं। लेकिन मुसलमान जब मोहम्मद साहब के नाम पर मोहब्बत जताते हैं तो उन्हें अपराधी बना दिया जाता है।”

मौलाना ने सवाल उठाया,“क्या मोहम्मद से मोहब्बत जताना गुनाह है? क्या इस देश में सिर्फ़ एक धर्म को आस्था खुलेआम जताने की छूट है? क्या सिर्फ़ ‘आई लव मोहम्मद’ कहना इतना बड़ा जुर्म है कि उसके लिए लाठीचार्ज और मुकदमे दर्ज हों? जबकि हिंदू संगठनों को खुलेआम ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने की इजाज़त है। बरेली में पुलिस ने जानबूझकर भीड़ को रोका और फिर लाठीचार्ज किया। धार्मिक आस्था जताने का अधिकार अगर एक समुदाय को है, तो दूसरे को क्यों नहीं?”

इस बीच, मौलाना तौकीर रज़ा पर एफआईआर दर्ज करने के बाद रज़ा समेत 8 को गिरफ्तार किया गया है। मुख्यमंत्री की सख्ती के बाद 24 नामजद समेत 2000 लोगों पर एफआईआर की गई है और 39 को हिरासत में लिया गया है। प्रेम नगर थाने में एक, कोतवाली में 6 एफआईआर की गई है। किला और कैंट थाने में एक-एक एफआईआर दर्ज की गई है। बारादरी थाने में भी मुकदमा लिखा गया है।

कानपुर से उपजा विवाद

“आई लव मोहम्मद” विवाद की शुरुआत कानपुर से हुई। बारावफात के जुलूस में एक साधारण बोर्ड लगाया गया था, जिस पर लिखा था, “आई लव मोहम्मद”। इसे विवाद का कारण बना दिया गया। पुलिस ने बोर्ड हटवा दिया और नौ मुस्लिम युवाओं को आरोपी बना लिया। जुलूस के दौरान कुछ लोगों ने सड़क किनारे एक टेंट लगाकर उस पर ‘आई लव मोहम्मद’ का पोस्टर चिपका दिया। इस टेंट को लेकर दूसरे पक्ष ने पुलिस से शिकायत की।

पुलिस ने आयोजकों को चेतावनी दी कि कोई नई परंपरा न शुरू की जाए और अंततः टेंट हटा दिया गया। टेंट हटते ही पोस्टर भी उतर गया, लेकिन इस कार्रवाई से जुलूस में शामिल लोग नाराज हो गए। धीरे-धीरे तनाव बढ़ने लगा और कुछ लोगों ने दूसरे धार्मिक पोस्टरों को फाड़ना शुरू कर दिया। पुलिस ने तत्काल हस्तक्षेप कर स्थिति संभालने की कोशिश की, मगर हालात इतने बिगड़े कि 24 लोगों पर मुकदमा दर्ज करना पड़ा। इनमें 9 नामजद और 15 अज्ञात थे।

उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में शुक्रवार का दिन फिर से धार्मिक नारों और पोस्टरों के इर्द-गिर्द तनाव का गवाह बना। उन्नाव, महाराजगंज, औरैया, बनारस और बरेली जैसे जिलों तक पहुंच गया। मऊ से लेकर आगरा, सहारनपुर और मुज़फ्फरनगर तक पुलिस को हर जगह सक्रिय रहना पड़ा। कहीं पत्थर चले, कहीं लाठीचार्ज हुआ तो कहीं धार्मिक पोस्टरों पर पुलिस और संगठनों के बीच टकराव देखने को मिला।

मऊ के मोहम्मदाबाद गोहना में जुमे की नमाज़ के बाद जैसे ही युवा सड़कों पर उतरे, हवा में नारेबाज़ी गूंजने लगी। सैकड़ों की संख्या में 15-20 साल के लड़के हाथों में झंडे और “आई लव मोहम्मद” पोस्टर लिए निकले। पुलिस ने शांति बनाए रखने के लिए उन्हें घर लौटने की अपील की, लेकिन यह अपील विरोध में बदल गई। अचानक पत्थरबाज़ी शुरू हुई और फिर पुलिस को भीड़ पर लाठीचार्ज करना पड़ा। यह दृश्य कैमरे में भी कैद हुआ। सीसीटीवी फुटेज में साफ दिखता है कि किस तरह भीड़ जुलूस में आगे बढ़ रही थी और पुलिस के आते ही भगदड़ मच गई। सवाल यह है कि महज़ एक पोस्टर और नारे कैसे इतनी जल्दी अशांति का कारण बन गए?

आगरा में पुलिस इस बार पहले से सतर्क थी। “आई लव मोहम्मद” पोस्टर मुस्लिम बहुल इलाकों में लगाए गए, तो प्रशासन को अंदेशा था कि स्थिति बिगड़ सकती है। जामा मस्जिद और आसपास के इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। अधिकारी खुद मैदान में मौजूद रहे। फ्लैग मार्च, पैदल गश्त और सोशल मीडिया पर चौकसी-ये सब संकेत थे कि प्रशासन हालात को किसी भी सूरत में काबू से बाहर नहीं जाने देना चाहता। यहां दिलचस्प बात यह रही कि पुलिस का चेहरा केवल सख़्त ही नहीं, बल्कि अपील करने वाला भी था। गश्त के दौरान लोगों से कहा जा रहा था कि अफवाहों से बचें और शांति बनाए रखें।

सहारनपुर में जुमे की नमाज़ के बाद एक युवक ने मस्जिद से निकलकर जैसे ही “आई लव मोहम्मद” का पोस्टर लहराया और नारेबाज़ी करने लगा, पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया।

दूसरी ओर, महाराजगंज में बिना अनुमति जुलूस निकालने और पथराव के आरोप में चार नामजद और 60 अज्ञात लोगों पर मुकदमा हुआ, साथ ही कई वाहन सीज कर दिए गए। बरेली में विवाद ने नया मोड़ लिया, जब मुस्लिम संगठन के नेता डॉ. नफीस का वीडियो सामने आया, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर पोस्टर हटाने पर हाथ काटने जैसी धमकी दी। इस बयान से मामला और गरमा गया।

एक ओर “आई लव मोहम्मद” के पोस्टर मुस्लिम समुदाय की तरफ़ से आ रहे थे, वहीं मुज़फ्फरनगर में हिंदू शक्ति संगठन ने “आई लव महादेव” के होर्डिंग लगाकर जवाब देने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने पांच स्थानों पर लगे पोस्टर तुरंत उतरवा दिए गए और संगठन के संयोजक संजय अरोरा से बातचीत कर आगे ऐसा न करने की बात तय हुई। अरोरा का कहना था कि “हमने यह पोस्टर किसी को चिढ़ाने के लिए नहीं लगाए, बल्कि अपने भगवान शिव को याद करने के लिए लगाए थे।”

काशी में ‘आई लव महादेव’ के पोस्टर

मुंबई, वाराणसी, गुजरात और असम सहित कई जगहों पर ‘आई लव मुहम्मद’ पोस्टरों के ‘जवाब’ में हिंदू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ के पोस्टर चिपकाने शुरू कर दिए। जगह-जगह गरबा पंडालों में महाआरती और भजन-संगीत के आयोजन हुए, जहां उपस्थित लोगों को ‘आई लव महादेव’ पोस्टर बांटे गए।

वाराणसी में भी कुछ संतों ने ‘आई लव महादेव’ का अभियान शुरू किया। इसका नेतृत्व जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद ने किया। उन्होंने मठों और मंदिरों में पोस्टर लगाए और सार्वजनिक स्थानों पर हाथों में पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि संत समाज सनातन सेना के जरिए कट्टरपंथियों को जवाब देगा और धर्म के नाम पर समाज में बढ़ रही असहिष्णुता को रोकेगा।

25 सितंबर को वाराणसी में सुमेरु पीठ के शंकराचार्य नरेंद्रानंद के नेतृत्व में संतों ने मठों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर ‘आई लव महादेव’ का अभियान तेज किया। पार्कों और घरों पर पोस्टर लगाए गए। शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि इस विवाद के पीछे सरकार विरोधी साजिश है और इसका उद्देश्य समाज में दरार डालना है। काशी के साधु-संत भी इस अभियान से जुड़े।

कुछ ही दिन पहले वाराणसी के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में पुलिस ने ‘आई लव मुहम्मद’ के नारे लगाने पर मुस्लिम समुदाय के करीब सौ लोगों पर मुकदमे दर्ज किए थे। इस मामले में 25 सितंबर 2025 की शाम दालमंडी इलाके से नफीस और उनके चार अन्य लोगों को गिरफ्तार कर पुलिस ने जेल भेज दिया। इसी बीच बरेली में हुए हिंसक प्रदर्शन और लाठीचार्ज के बाद वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट भी अलर्ट पर है। भेलूपुर थाने के प्रभारी और पुलिस बल ने मुस्लिम बहुल इलाकों-बजरडीहा, जीवधिपुर, रेवड़ी तालाब, शिवाला में पैदल गश्त की।

बरेली, दिल्ली, मुंबई और कई अन्य शहरों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। बढ़ते तनाव को देखते हुए प्रशासन सभी पक्षों से शांति की अपील कर रहा है। संवेदनशील इलाकों में सीसीटीवी और फ्लैग मार्च के जरिए हालात पर नजर रखी जा रही है। उत्तराखंड में भी कई लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है।

बरेली में इस विवाद पर मंत्री असीम अरुण ने साफ कहा, “भारत में धार्मिक स्वतंत्रता है, लेकिन कोई भी आयोजन बिना अनुमति नहीं होना चाहिए। अगर कोई नियम तोड़ेगा तो कानून अपना काम करेगा।” इसके विपरीत कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इसे आस्था के नजरिए से देखा। उन्होंने कहा, “हर इंसान को अपने भगवान से प्यार करना चाहिए। चाहे वह मोहम्मद हों, महादेव हों, गणेश हों या जीसस क्राइस्ट।”

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) के प्रदेश सचिव उमर खालिद ने कहा, आई लव मोहम्मद पोस्टर विवाद हमें यह याद दिलाता है कि हमारी मोहब्बत कितनी नाजुक हो चुकी है। आस्था का इज़हार करने से पहले डर लगता है कि कहीं यह सियासत की आग में न झोंक दिया जाए। अभिव्यक्ति की आज़ादी और धार्मिक संवेदनाओं के बीच जो दीवार खड़ी हो रही हैवह समाज को दो हिस्सों में बांट रही है।

उन्होंने आगे कहा, आज ज़रूरत है कि हम पोस्टरों और नारों से आगे बढ़कर दिलों में मोहब्बत तलाशें। बुलडोज़र और गिरफ्तारियां तात्कालिक समाधान हो सकते हैंलेकिन स्थायी शांति तभी आएगी जब हम मोहब्बत को नारे की तरह नहींज़िंदगी की तरह जीना सीखेंगे। वरना हर बार कोई नया पोस्टर लगेगा और हर बार मोहब्बत के नाम पर नफ़रत का तूफ़ान खड़ा हो जाएगा।

इस बीच “आई लव मोहम्मद” पोस्टरों को लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में दाखिल एफआईआर (मामलों) को रद्द करने का अनुरोध करती एक जनहित याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल की गई है। बार एंड ब्रांच की एक रिपोर्ट के अनुसार रज़ा अकादमी के प्रतिनिधि के रूप में शुजात अली की याचिका में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पुलिस पर झूठे मामले दर्ज करने का आरोप लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि पोस्टर दिखाते लोग केवल अपना धार्मिक उत्सव मना रहे थे।

(विजय विनीत की रिपोर्ट। विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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