अचानक देश और दुनिया को पता चला कि लेह शहर जल रहा है। सदियों से शांति की सफेद चादर ओढ़े बर्फीली पहाड़ियों और मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य वाले शहर लेह किसी कुटिल दृष्टि का शिकार हो गहरे संकट में फंस गया है। हमारे देश और लोकतंत्र के भविष्य के लिए उस अपराधी गिरोह की शिनाख्त जरुरी है। जिसने काराकोरम और हिमालय की पहाड़ियों के बीच फैले विस्तृत भू भाग वाले लद्दाख और कारगिल को पिछले 6 साल पहले ही श्राप दे दिया था। पृथ्वी का स्वर्ग कहे जाने वाली जम्मू कश्मीर लद्दाख की मनोरम वादियों को निर्मम हाथों से टुकड़े-टुकड़े कर मित्र कॉर्पोरेट लुटेरों के हाथ सौंप देने वालों की बदनीयत का खामियाजा आज यहां के 274989 नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
जो लद्दाख और कारगिल के इस विस्तृत भूभाग में निवास करते हैं। 59146 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 2550 मीटर से लेकर 7742 मीटर ऊंचे पहाड़ों मैदानों वाले शांत भू-क्षेत्र को कश्मीर से काटकर अलग करते हुए क्रूर संघी गिरोह ने न जाने कितने सुनहरे सपने दिखाए थे। बंदूक के साये में घेराबंदी कर कश्मीर को टुकड़े-टुकड़े करने का जब षड्यंत्र रचा गया था ।तो उस समय राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों का कहना था कि विभाजन कश्मीर के लोगों के लिए एक और त्रासदी होने जा रहा है। 6 साल गुजरने के बाद ये भविष्यवाणियां शत-प्रतिशत सच साबित हो रही हैं।
संवैधानिक लोकतंत्र की परिकल्पना और आधारशिला रखने वाले महापुरुषों ने जोर देकर कहा था की लोकतांत्रिक व्यवस्था नैतिक और जनपक्ष धर नागरिकों के हाथ में रहने पर ही कल्याणकारी हो सकती है। डॉ अंबेडकर ने देश को संविधान सौंपते हुए चेतावनी दी थी कि बेहतर से बेहतर संविधान अगर गलत हाथों में पहुंच जाएगा तो समाज के लिए विनाशकारी साबित होगा। लेकिन खराब से खराब भी संविधान नैतिक और मानवीय आदर्शों व मूल्यों वाले लोगों के हाथ में आने पर बेहतर और कल्याणकारी परिणाम दे सकता है। बात साफ है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिकल्पना करने वालों ने एक आदर्शवादी नागरिक सम्मान की परिकल्पना की थी।जो उच्च नैतिक मूल्यों आदर्शों से प्रेरित हो तथा जन कल्याण के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध हो।आज हमारे देश में डा, अंबेडकर की भविष्यवाणी सच होती दिखाई दे रही है।
6 साल पहले अगस्त 2019 में धारा 370 हटाते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में घोषणा की थी कि कश्मीर को दो भागों में विभाजित किया जा रहा है। उस समय कश्मीर के पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म करके दो केंद्र शासित प्रदेश-जम्मू कश्मीर, और लद्दाख बनाया गया। संपूर्ण जम्मू कश्मीर मुख्यतः तीन भागों में विभाजित है। एक- कश्मीर घाटी जो मुस्लिम बहुल है। दूसरा -जम्मू कठुआ जो हिंदू बहुल और तीसरा- लद्दाख जिसमें लेह लद्दाख का इलाका बौद्ध बहुल और कारगिल- मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। कश्मीर वैली और जम्मू लंबे समय से अशांत और आतंकवाद प्रभावित हैं।
जहां पिछले 35 वर्षों में लगभग 70 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। लाखों परिवार प्रभावित हुए हैं। संभवतः कश्मीर के सभी परिवारों के पास साझा करने के लिए कोई न कोई पीड़ा और दर्द है। प्रेक्षकों के अनुसार जम्मू-कश्मीर दुनिया का सबसे सघन मिलिट्री सेनीटाइज एरिया है। आतंकवाद और मिलिट्रीराईज कश्मीर के कारण घाटी से लेकर जम्मू तक आर्थिक राजनीतिक सामाजिक लोकतांत्रिक गतिविधियां बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुई। कश्मीर में इंसर्जेंसी और कश्मीरी पंडितों के पलायन का शेष भारत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जिससे भाजपा व संघ परिवार को सांप्रदायिक फासीवाद को भारतीय लोकतंत्र पर थोपने का सुनहरा अवसर मिल गया। खैर….!
धारा 370 हटाते समय अमित शाह ने संसद में ललकारते हुए दंभ भरी भाषा में ऐलान किया था कि 370 हटते ही अलगाववाद और आतंकवाद खत्म हो जाएगा। कश्मीर में अमन चैन लौटेगा और विकास की रफ्तार तेज होगी। शेष भारत के साथ कश्मीर का समागम सुनिश्चित हो जाएगा। यही नहीं उन्होंने कहा था 370 कश्मीर के नागरिकों की बेरोजगारी गरीबी बदहाली का बुनियादी कारण है। अब कश्मीर का औद्योगीकरण होगा।
भारत के अन्य क्षेत्रों के नागरिक भी कश्मीर में जमीन खरीद सकेंगे और कश्मीर के विकास में योगदान देंगे। यही नहीं उन्होंने कहा कि लद्दाख से लेकर जम्मू और कश्मीर घाटी तक विकास की गंगा बहेगी और कश्मीर भारत के विकसित राज्यों की श्रेणी में गिना जाएगा। पिछले 6 वर्षों से कश्मीर से लद्दाख तक पर अमित शाह का पूर्ण नियंत्रण है। उनकी मर्जी के बिना कश्मीर और लद्दाख में पत्ता भी नहीं हिलता।
भारत के 140 करोड़ नागरिक संसद में दिए गए मोदी सरकार के आश्वासन और घोषणाओं पर गंभीर नजर रखे हुए हैं।आज यह कहने है कि ज़रूरत नहीं है कि 6 सालों में कश्मीर की हालत क्या हो गई है। पहलगाम जैसी बड़ी आतंकी घटनाओं को अमित शाह की उपलब्धियां में गिना जा सकता है। सीमा पार के आतंक वादियों का नेटवर्क कठुआ से लेकर जम्मू तक फैल गया है। पहले यह आम धारणा थी कश्मीर घाटी के मुसलमान भारतीय राज्य और उसकी संस्थाओं से अलगाव महसूस करते हैं।लेकिन इन 6 वर्षों में जम्मू से लेकर लेह- लद्दाख तक सरकार और भाजपा का जनता से अलगाव बढ़ता ही गया है।
जब अमित शाह संसद में दहाड़ते हुए जम्मू कश्मीर के दो टुकड़े कर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की घोषणा कर रहे थे। तो ऐसा लगा था कि लद्दाख और कारगिल भारत सरकार की प्राथमिकताओं में पहले नंबर पर होंगे। लेकिन 6 साल बाद संघ परिवार उसी चिर परिचित “षड्यंत्र” थ्योरी पर वापस लौट आया है।
जो उसकी चिंतन प्रक्रिया का बुनियादी आधार है। 24 सितंबर को लेह में जो कुछ हुआ। उसके कारण सरकार की अयोग्यता अक्षमता और विभाजनकारी नीतियों में खोजने के बजाय मोदी और अमित शाह की जोड़ी प्रचार तंत्र और प्रशासनिक मशीनरी के द्वारा विदेशी षड्यंत्र का सौवां खड़ा कर बच निकलना चाहती हैं।
लद्दाख की सीमा जहां चीन से लगी है। वहीं कारगिल पाकिस्तान की सीमा से सटा है। उप राज्यपाल कवींद्र गुप्ता द्वारा लद्दाख का प्रशासन सीधे अमित शाह के इशारे पर चलता है। ऐसी स्थिति में अगर भारत का सबसे सेंसटिव सीमा क्षेत्र में विदेशी शक्तियां घुस कर षड्यंत्र रचने में कामयाब हो जा रही है। तो अब सिद्ध हो गया है कि अमित शाह और उनकी सरकार के हाथ में देश सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें देशहित को देखते हुए तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए। सोनम वांगचुक तो गलवान की घटना के बाद से ही कह रहे हैं कि चीन भारत की सीमा में घुसता चला आ रहा है और सरकार ठोस कदम उठाने में नाकाम रही है। बल्कि जो लोग इस तरफ ध्यान दिला रहे हैं। उन्हें ही देशद्रोही कहा जा रहा है।
जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। तो उस समय लद्दाख की जनता सहित सोनम वांगचुक ने खुशियां मनाई थी।उस समय सरकार ने कहा था कि यह अंतरिम व्यवस्था है। शीघ्र ही जम्मू कश्मीर और लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। राज्य का विभाजन और धारा 370 हटे 6 साल गुजर चुके हैं।
जम्मू कश्मीर से लेकर लद्दाख कारगिल तक लोग सरकार के आश्वासन का उसी तरह से इंतजार कर रहे हैं ।जैसे 140 करोड़ भारतीय 11 वर्षों से अच्छे दिन की वाट जोह रहे हैं। उस समय अमित शाह ने दावा किया था कि लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त दुरुस्त होगी। युवाओं को रोजगार मिलेगा। विकास के नए रास्ते खुलेंगे और 97% जनजातियों वाले लद्दाख के लोगों की भाषा संस्कृति परंपरा आचार व्यवहार को संरक्षण मिलेगा। लेकिन आज तक वही ढाख के तीन पात हैं।
लद्दाख दो क्षेत्र में बटा है। बौद्ध बहुल लद्दाख और मुस्लिम बहुल कारगिल। जिसकी राजधानी लेह है। इन दोनों क्षेत्रों में रहने वाली जनजातियों सदियों से एक दूसरे के साथ घुल मिलकर रहती आई है। मोदी के नेतृत्व में यहां भी सांप्रदायिक अभियान चला कर बौद्धों और मुसलमानों को लड़ाने की कोशिश की गई। लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके। जिसका बुनियादी कारण लेह से कारगिल तक उच्च शिक्षित समाज का होना है। जिनकी समावेशी सांस्कृतिक सामाजिक चेतना बहुत समृद्ध है।
सीमावर्ती प्रदेश होते के बावजूद कारगिल से लेकर लद्दाख तक पाकिस्तान और चीन को दखल देने का मौका नहीं मिला है।(याद रखिए जब पाक सैनिकों ने कारगिल में घुसपैठ की थी। तो कारगिल के मुस्लिम चरवाहों ने ही भारत सरकार को इसकी सूचना दी थी।) पाकिस्तान से कई बार युद्ध और चीन से टकराव के समय लद्दाख के लोग पूरी तरह से देश के साथ खड़े थे। जबकि यहां की जनजातियां तिब्बती मूल की हैं और कारगिल मुस्लिम बहुल क्षेत्र है।
अगर अमित शाह की सरकार और एजेंसियां इस तरह का दावा कर रही हैं तो यह स्पष्ट है कि वर्तमान मोदी सरकार सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा करने में असफल हो गई है। यह सिर्फ अकेला मामला नहीं है। मणिपुर से लेकर असम तक और अब उत्तराखंड में भी जिस तरह का माहौल बन रहा है। उससे साफ होता जा रहा है कि केंद्र सरकार सीमावर्ती राज्यों के निवासियों को विश्वास में लेने में फेल रही है।
लद्दाख और कारगिल के लोग पिछले 6 वर्षों से भाजपा के घोषणा पत्र में किए गए वादे और सरकार द्वारा घोषित नीतियों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए लेह से लेकर कारगिल तक और लद्दाख से दिल्ली तक सोनम वांगचुक और कारगिल डेमोक्रेटिक एलाइंस (KDA)और लेह अपेक्स बॉडी (LAB) के नेतृत्व में नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाते रहे हैं। वहां के नागरिक समाज और संस्थाओं द्वारा सरकार का ध्यान खींचने के लिए शांतिपूर्ण अनशन पदयात्राएं हुई हैं। जिसमें हजारों लोग की भागीदारी रही है।
मोदी शाह की जोड़ी ने नेशनल मीडिया पर इस तरह से कब्जा कर लिया है कि 10 सितंबर से चल रहे अनशन की जानकारी लद्दाख के बाहर नहीं पहुंच सकी। जबकि 25 लोग 25 दिन के अनशन पर बैठे थे। 23 तारीख को दो लोगों की स्थिति बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। यह खबर आने के बाद जन आक्रोश बढ़ने लगा।
अनशनकारियों के समर्थन में भारत के किसी कोने से कोई आवाज नहीं आ रही थी। 24 सितंबर को लद्दाख एपेक्स बाडी के युवा लीग के सदस्यों ने अनशनकारियों के समर्थन में रैली का आयोजन किया। कार्यक्रम शांतिपूर्ण चल रहा था। अचानक 2 बजे के बाद स्थिति बिगड़ गई और आंदोलन हिंसक हो गया और भाजपा कार्यालय सहित कई सरकारी वाहनों और सीआरपीएफ की गाड़ी जला दी गई। पुलिस ने गोली चलाई। जिसमें चार नौजवान मारे गए। 70 से ज्यादा घायल हुए।
शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को देखते हुए सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ दिया और घटना की निंदा करते हुए 5 साल के अपने प्रयासों के असफल हो जाने पर चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि वह गांधीवादी विचार के समर्थक हैं और आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा के विरोधी हैं। हिंसा से आंदोलन कमजोर होता है। उन्हें नहीं पता है कि मोदी जोड़ी हिंसा से ही ऊर्जा ग्रहण करती है।
सवाल यह है कि सरकार आश्वासन देने और 2019 के लोकसभा के चुनाव घोषणा पत्र और लद्दाख ऑटोनॉमस हिल काउंसिल के चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा लिखित वादा करने के बावजूद पूर्ण राज्य की मांग मानने और छठी अनुसूची को लद्दाख में लागू करने के लिए क्यों तैयार नहीं है। इसके लिए हमें मोदी सरकार के चरित्र को समझना होगा। आज देश के सामाजिक राजनीतिक विश्लेषक और विद्वान मानते हैं कि मोदी सरकार कॉरपोरेट कंट्रोल्ड सरकार है। लद्दाख की प्राकृतिक संपदा भौगोलिक स्थिति और पारिस्थितिकी विशेषताएं कॉरपोरेट मुनाफे के लिए उपयुक्त हैं।
इसीलिए प्रेक्षकों का मानना है कि लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने के पीछे केंद्र केंद्र सरकार का उद्देश्य लद्दाख के भूभाग का फैसला खुद अपने हाथ में लेना था।। जिससे मनमाने ढंग से वहां की प्राकृतिक संपदा का दोहन किया जा सके और लद्दाख की भूमि खनिज संपदा मित्र पूंजीपतियों को सौंप सके। जैसा कि छत्तीसगढ़ झारखंड बिहार मुंबई के ठाणे गुजरात राजस्थान और पूर्वोत्तर भारत में देखा जा रहा है। जहां मोदी कि प्रत्येक यात्रा के बाद कोई न कोई मित्र पूंजीपति पहुंच जाता है। सबसे ताजा मामला बिहार महाराष्ट्र और असम का सामने आया है। जहां हजारों एकड़ जमीन अडानी अंबानी को कौड़ी के भाव दी जा रही है।
लद्दाख और कारगिल की पहाड़ियां प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा से भरी है। जहां सोना चांदी तांबा ग्रेनाइट यूरेनियम बोरोन की खदानें हैं और चूना पत्थर रेयर अर्थ जैसी बहुमूल्य खनिज भंडार होने की संभावना है। ऊंची पहाड़ियां और स्वच्छ वातावरण के कारण सोर ऊर्जा भूतापीय और पवन ऊर्जा के साथ जल संसाधन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार भू राजनैतिक दृष्टिकोण से यह इलाके महत्वपूर्ण है। जहां सौर ऊर्जा और उच्च सौर्य विकिरण होने के कारण भूतापीय ऊर्जा के लिए उपयुक्त है।
जल संसाधन वनस्पति और जीव जंतु यहां के प्राकृतिक साधन है। जिनमें खुबानी बादाम और अखरोट जैसे मेवे तथा दुर्लभ जानवरो हिम तेंदुआ, तिब्बती जंगली गधा ( कियांग), हिमालयी नीला भेड़ और याक जैसे अद्वितीय जीवों का घर है। वनस्पतियों में अल्पाइन आदि पाए जाते हैं।
केंद्र शासित राज्य होने के बाद 2022-23 में 8 से ज्यादा बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि कॉर्पोरेट घरानों को दी गई है ।जिसमें अदानी समूह का 13 गीगावॉट की नवीकरण ऊर्जा परियोजनाऔर ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण -2 भी शामिल है।एनटीपीसी दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट स्थापित कर रहा है। पूगा में भारत का पहला जियोथर्मल ऊर्जा संयंत्र विकसित किया जा रहा है। इसी तरह ईपीसी और पोयम और सोरया इंटरनेशनल हाइड्रो एनर्जी सोलर प्लस स्टोर का ठेका दिया गया है।
सिंधु घाटी में दुनिया की सबसे बड़ी जल विद्युत परियोजना बन रही है। ये सभी परियोजनाएं कॉरपोरेट घरानों के लिए भारी मुनाफा कमाने का साधन बनेगी। साथ ही पारिस्थितिकी के लिहाज से सेंसटिव जोन होने के कारण इन परियोजनाओं से लद्दाख और कारगिल में भारी पर्यावरणीय संकट खड़ा हो सकता है। अभी देश और दुनिया ने पंजाब हिमाचल उत्तराखंड और पाकिस्तान में पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ के खौफनाक मंजर देखे है।
लेकिन कॉर्पोरेट नियंत्रित सरकार मनुष्य और पर्यावरण की कीमत पर कॉर्पोरेट घरानों को मुनाफा कमाने के लिए भारी छूट देने के लिए तैयार बैठी है। इसको लेकर लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता चिंतित हैं और इसके दुष्परिणामों की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने में लगे हैं। बड़े पूंजी घराना को लगता है कि लद्दाख और कारगिल की पहाड़ियां उनके मुनाफे के लिए भारी अवसर बन सकती हैं।
यही कारण है कि गृहमंत्री अमित शाह पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में लद्दाख और कारगिल को लाने के लिए तैयार नहीं है। केंद्र सरकार के साथ जो वार्ता चल रही है। उसमें इन मुद्दों को शामिल ही नहीं किया गया है। इसके अलावा आंदोलनकारी लद्दाख के लिए अलग से सर्विस कमीशन बनाने की मांग कर रहे हैं। जिससे स्थानीय युवाओं को नौकरियों में मौका मिले। युवाओं का कहना कि 2019 से अब तक एक भी सरकारी भर्ती नहीं हुई है। लद्दाख में बेरोजगारी 23% से ऊपर पहुंच गई है। लद्दाख में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है। जिससे उच्च शिक्षित नौजवानों में भारी बेरोजगारी है।
आंदोलनकारी लद्दाख और कारगिल से लोकसभा में प्रतिनिधित्व की बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। अभी लद्दाख से लोकसभा का एक सदस्य चुना जाता है। 2024 के चुनाव में यह सीट निर्दलीय के खाते में गई थी।
ऑटोनॉमस हिल काउंसिल है। लेकिन उसके पास कोई अधिकार नहीं। इसको पूर्वोत्तर के स्वायत्त संस्थाओं की तरह अधिकार देने की मांग की जा रही है। लद्दाख और कारगिल में 97 प्रतिशत आबादी जनजातियों की है। इसलिए लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग महत्वपूर्ण है। जिस तरह से केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख में कॉरपोरेट घरानों की पकड़ बढ़ रही है। उससे छठी अनुसूची के लागू करने का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
जनजातियों की संस्कृति भाषा परंपरा जमीन प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को लेकर लद्दाखी चिंतित हैं। सिक्स शेड्यूल लागू होने से उन्हें संरक्षण मिलेगा। इसके अलावा चुनी संस्थाएं स्थानीय निवासियों के लिए आरक्षित होती है। असम त्रिपुरा मिजोरम अरुणाचल मणिपुर में जनजातीय क्षेत्र छठी अनुसूची में आने के कारण संरक्षित हैं। जनजातियों को हर समय अपने अस्तित्व का खतरा दिखाई देता है। जो अब सिर्फ काल्पनिक नहीं है।कारपोरेट लूट के दौर में भारत के आदिवासी जनजातीय इलाका बर्निंग क्षेत्र बन गए हैं। क्योंकि वहां की खनिज संपदा जल जंगल जमीन पर कॉर्पोरेट घरानों की गिद्ध दृष्टि लगी है।
यह चिंता लद्दाख के नागरिकों में भी व्याप्त है। क्रोनी पूंजीवाद के दौर में पर्यावरण प्राकृतिक संपदा के साथ हाशिए के समाजों का अस्तित्व दाव पर है। हम वर्षों से मणिपुर को जलता देख रहे हैं। अब यह आग असम होते हुए छत्तीसगढ़ उड़ीसा झारखंड तक को अपने आगोश में खींच ली है। आज भारत का सबसे शांतिपूर्ण उच्च शिक्षित क्षेत्र लद्दाख इस आग के लपेटे में आ चुका है। देश को संघ नीति मोदी और अमित शाह राज में क्या-क्या देखना है। इसका आकलन पहले से नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी खत्म होते होते सोनम वांगचुक गिरफ्तार हो चुके हैं। 24 तारीख से ही उनके खिलाफ भाजपा आईटी सेल कॉरपोरेट मीडिया और सरकार ने चरित्र हनन अभियान शुरू कर दिया था। एक दिन पहले वांगचुक ने अपनी गिरफ्तारी की आशंका व्यक्त की थी और कहा था कि लद्दाख के लिए अगर मुझे जेल में डाला जाता है। तो मेरे लिए खुशी की बात होगी। उनके एनजीओ का एसपीआरए खत्म कर दिया गया है। विद्यालय की जमीन ले ली गई है और सीबीआई उनके लेनदेन की जांच कर रही है। जो जानकारी मिल रही है। वह उन्हें पीएसए के अंतर्गत जेल में बंद किया जा सकता है।
याद रखना चाहिए कि कश्मीर के विभाजन का जोरदार समर्थन लद्दाख और सोनम बांगचुग ने किया था। उस समय खुशियां मनाई गई थी। लद्दाख के बौद्धों को पड़ोसी मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने का अभियान भी चला था। लद्दाख को अलग कर नया राज्य बनाने को घाटी के मुस्लिम वर्चस्व से मुक्ति के अर्थ में देखा गया था। बौद्ध बहुल लद्दाख को उसका उचित अधिकार देने के अर्थों में प्रचलित किया गया था।(अभी देखना है कि कितने और संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता इस देश में संघ भाजपा के जाल में फंस कर छटपटाने के लिए अभिशप्त होगे)।
इस आंदोलन का सबक यह है कि अगर कोई समाज हिंदुत्व कॉर्पोरेट फासीवाद के चरित्र के प्रति गफलत पाल लेगा। तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। धारा 370 हटाकर कश्मीर का विभाजन किया गया था। तो घाटी के इलाके में मायूसी और असंतोष था। लेकिन लद्दाख में बौद्धों और जम्मू के हिंदुओं में खुशी दिखाई दे रही था। लेकिन आज 6 वर्ष बाद सभी ठगा महसूस कर रहे हैं। सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी का प्रभाव देश-विदेश तक में महसूस किया जाएगा और स्वतंत्रता व मानवाधिकार के क्षेत्र में भारत के साख को और बड़ा धक्का लगेगा।
याद रखें एनजीओ मार्का जनतांत्रिक संघर्ष एक हद तक समाज का लोकतंत्रीकरण तो करती है। लेकिन फासीवाद के दौर की राजनीति के प्रतिरोध की क्षमता इसमें नहीं होती। इसलिए जरूरत है कि कश्मीर घाटी से लेकर जम्मू कारगिल और लद्दाख तक के समस्त जनगण को एकजुट करने की। सभी मुख्तलिफ समाजों का समर्थन हासिल करने की। तभी जम्मू से लेकर कश्मीर वैली और लद्दाख कारगिल तक एक मुकम्मल जनतांत्रिक राजनीति खड़ी हो सकेगी। इस खूबसूरत भौगोलिक क्षेत्र का भविष्य इन्हीं संभावनाओं को आगे बढ़ाकर सुरक्षित रखा जा सकता है।
(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)