दक्षिणपंथी राजनीति के पराभव का प्रारंभ

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जैसा कि सर्वविदित है भारत में घोर दक्षिण पंथी मंदिर-मस्जिद के नाम पर तथा एक विशेष कौम के प्रति नफ़रत फैलाकर बहुसंख्यक लोगों का 30-31% वोट हथियाकर पिछले दस साल से सत्तारुढ़ रहे। वे फिर सत्ता में सरकारी तंत्र का सहारा लेकर मात्र 240 सीट लेकर आए और बैशाखियों पर सरकार बनाए हैं। यह दक्षिण पंथी विचार धारा के पराभव की इबारत लिख दिया है। ख़ासतौर पर उन महत्वपूर्ण आस्था केंद्रों में मसलन अयोध्या, चित्रकूट, रामेश्वरम, नासिक आदि क्षेत्रों में इनको करारी हार मिली है। यहां तक कि हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी भी हारते-हारते मात्र एक लाख वोट से जीत पाए जिन पर संघ और भाजपा को चार सौ पार का भरोसा था।

पिछले दिनों प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिस तरह कथित भाजपाई चंद हिंदू नेताओं को हिंसावादी बताया। उसके बहाने तमाम नेताओं ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ विष वमन किए। गुजरात में भाजपाइयों और मध्यप्रदेश के उज्जैन में संत अखाड़ों ने प्रदर्शन कर देश में आग लगाने की कोशिश की वह नाकाम रही। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि अवाम अब नफ़रत छोड़कर मोहब्बत के रास्ते पर चल पड़ी है। हालात बदल रहे हैं।

अब तो विदेश से भी दक्षिण पंथियों से मुक्त होने की ख़बरें आईं हैं जो ये बताती हैं कि अब राजनैतिक हवा बदलाव की ओर अग्रसर है। इंग्लैंड में हाल ही में हुए चुनाव में ऋषि सुनक की कंजरवेटिव पार्टी का हारना और लेबर पार्टी का जीतना भी ऐसे ही संकेत दे रहा है। ब्रिटेन के आम चुनावों में लेबर पार्टी की जीत ने बता दिया है कि इंग्लैंड लंबे समय बाद बदलाव के लिए तैयार है और इसके लिए उसने कीर स्टार्मर के नाम पर मुहर लगा दी है। नॉर्थ लंदन से एक बार फिर जीत का सेहरा पहनने वाले कीर स्टार्मर ने कहा- परिवर्तन यहीं से शुरू होता है, क्योंकि यह आपका लोकतंत्र, आपका समुदाय और आपका भविष्य है।

ब्रिटेन में समय पूर्व चुनाव कराने का प्रधानमंत्री सुनक का दांव इस कदर उल्टा पड़ जाएगा, इसका अंदेशा संभवतः उनको भी नहीं होगा। वह मानकर चल रहे थे कि चुनावी समर में वह न सिर्फ कंजर्वेटिव पार्टी को उबार पाएंगे, बल्कि जनता में अपनी छवि भी सुधार सकेंगे, मगर शुक्रवार को आए चुनाव नतीजों में उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। बोते 14 वर्षो से कंजर्वेटिव सत्ता में थी, लेकिन इस बार स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने उसे ऐतिहासिक मात दी है। इतना ही नही निजेल फराज़ की पार्टी ‘रिफार्म यूके’ का उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन या स्कॉटलैंड में स्कॉटिश नेशनल पार्टी की हार भी ब्रिटिश राजनीति में आये आमूल चूल बदलाव के संकेत दे रही है।

ब्रिटेन में दरअसल सत्ता परिवर्तन का एक लंबा चक्र चलता रहा है। मसलन 1979 से 1997 तक वहां कंजर्वेटिव का शासन रहा, फिर लेबर पार्टी सत्ता में आई, वह 2010 तक सरकार चलती रही, जिसके बाद कंजर्वेटिव को फिर से ताज मिला। यही कारण था कि चुनाव से पहले ही लेबर पार्टी के सत्ता में लौटने का अनुमान लगाया जा रहा था। हां चार सौ पार की भारी जीत का आकलन शायद ही था।

ब्रिटेन के बाद अब फ्रांस में भी सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है। दरअसल, फ्रांस में रविवार को हुए आम चुनावों में राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। इसी के साथ तय हो गया है कि फ्रांस में अब सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। इस चुनाव में इस बार वामपंथी दलों का दबदबा देखने को मिला है। 577 सीटों के लिए हुए आम चुनाव में वामपंथी न्यू पॉपुलर फ्रंट गठबंधन को 182 सीटों पर जीत मिली है। वहीं इमैनुअल मैक्रों की पार्टी रेनेंसा दूसरे नंबर पर रही है। इस चुनाव में रेनेंसा को केवल 163 सीटें मिली हैं। वहीं दक्षिणपंथी नेशनल रैली गठबंधन को 143 सीटों पर जीत मिली है।

कुल मिलाकर उदारीकरण की नीतियों और भूमंडलीकरण का लाभ लेकर कारपोरेट ने पूंजीवाद को जिस तरह बढ़ाया तथा दक्षिण पंथी ताकतों को पनपने में मदद की अब स्थितियां बदलाव की ओर अग्रसर है। इंग्लैंड, फ्रांस और भारत की राजनैतिक स्थितियां जिस तरह बदली हैं वह अच्छे संकेत हैं इसे नकारा नहीं जा सकता। इस मैराथन में सबकी आंखें अब अमरीका के चुनाव पर टिकी हैं पूर्व से शुरू हुआ भारत का यह अभियान पश्चिम में अमेरिका पहुंच कर क्या परिणाम देगा यह तो समय बताएगा पर निश्चित है इन तीन प्रमुख देशों का असर वहां ज़रुर दिखेगा।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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