आरजी कर मामले को 6 महीने बीत चुके हैं। जनवरी 17 को सियालदह कोर्ट ने अकेले सिविल स्वयंसेवी संजय रॉय का अभियोग सिद्ध किया। फैसला 160 पृष्ठ में लिखा गया और संजय को 50 गवाहों के बयानों के आधार पर चिकित्सक ट्रेनी अभया के बलात्कार और हत्या का एकमात्र दोषी घोषित कर दिया गया। भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 (बलात्कार), धारा 66 (मृत्यु या वानस्पतिक अवस्था) और 103 (1) (हत्या) के अभियोग संजय पर लगाये गये हैं। इस आधार पर सीबीआई ने संजय रॉय के लिये मृत्युदंड की सज़ा मुकर्रर की। उनके अनुसार यह ‘रेयरेस्ट आफ द रेयर’ केस की श्रेणी में आयेगा। शुरू से यही मांग मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की ओर से भी उठाई गयी थी। पर अतिरिक्त जिला व सेशन्स अदालत के न्यायमूर्ती अनिर्बान दास ने कहा कि सीबीआई ने अदालत के समक्ष जो साक्ष्य प्रस्तुत किये थे, सज़ा उन्हीं के आधार पर तय की गयी।
“इस मामले की गंभीरता का मूल्यांकन करते समय, कई कारक काम करते हैं। अपराध की क्रूरता एक प्राथमिक विचारणीय बिंदु है। गला घोंटना, मुंह दबाकर सांस रोकना और क्रूर यौन हमले का संयोजन क्रूरता के उस स्तर को दर्शाता है, जो सामान्य आपराधिक व्यवहार की सीमा से परे है। हिंसक कृत्यों की यह श्रृंखला पीड़ित के लिए एक लंबी और पीड़ादायक परीक्षा का संकेत देती है, जो मानव जीवन और गरिमा के प्रति पूर्ण उपेक्षा को दर्शाती है। अपराध को अंजाम देने का तरीका, जिसमें कई तरह के हमले शामिल हैं, नुकसान पहुंचाने के लिए जानबूझकर और निरंतर जारी इरादे की बात करता है, जो अपराध की गंभीरता को बढ़ाता है।
पीड़िता की असहायता एक और महत्वपूर्ण कारक है जो कृत्य की जघन्यता को बढ़ाता है। पीड़िता, जो विशेष रूप से कमजोर हैं, चाहे उम्र, शारीरिक स्थिति या परिस्थितियों के कारण, पर आपराधिक न्यायशास्त्र में विशेष विचार किया जाता है। खुद का बचाव करने या अपने हमलावर से बचने में उनकी असमर्थता अपराधी के दोष और अपराध के सदमे को बढ़ाती हैं। इस मामले में, हमले के दौरान पीड़िता की भेद्यता, अपराध की हिंसक प्रकृति और अपराधी द्वारा असमान शक्ति संतुलन से फायदा उठाने को उजागर करती है।“
जस्टिस दास का मानना था कि- “मृत्युदंड देने पर विचार करते समय, न्यायालयों को कानूनी, नैतिक और सामाजिक विचारों के जटिल जाल से जूझना पड़ता है। आनुपातिकता का सिद्धांत सर्वोपरि है – सजा अपराध के अनुरूप होनी चाहिए। अत्यधिक जघन्यता और क्रूरता के मामलों में, जहां अपराध समाज की अंतरात्मा को झकझोर देता है, अंतिम सजा के लिए तर्क मजबूत होता है। हालाँकि, इसे सुधारात्मक न्याय के सिद्धांतों और मानव जीवन की पवित्रता के विरुद्ध संतुलित किया जाना चाहिए।“
उनके अनुसार यद्यपि वारदात बहुत ही जघन्य और क्रूर है, केस‘रेयरेस्ट आफ द रेयर केस’ की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिये संजय राय को मृत्युदंड न देकर जीवन पर्यन्त कारावास की सज़ा सुनायी गयी है। यहां बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) रिपोर्ट किया गया 2 एससीसी 684 और मनोज एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य, जैसा कि 2022 SCC आंलाइन SC 677 में रिपोर्ट किया गया, का हवाला भी दिया गया है।
दूसरी ओर संजय रॉय ने अपने आप को निर्दोष बताया है और कहा है कि उसे “विभाग द्वारा फंसाया गया है और उसमें एक आईपीएस (इशारा संभवत: पुलिस आयुक्त विनीत गोयल की तरफ लगता है) की भूमिका है। उसे सब पता है।” उसने यह भी कहा कि वह हमेशा रूद्राक्ष की माला पहनता है; यदि उस दिन उसी ने वारदात को अंजाम दिया, तो उसकी माला टूटकर बिखर क्यों नहीं गयी? क्यों पुलिस को रूद्राक्ष के बीज घटनास्थल पर नहीं मिले?
संजय के वकील ने लगातार दो बातों पर ज़ोर दिया है-1) बलात्कार और हत्या कहीं और हुई है, और शव और ब्लूटूथ को बाद में सेमिनार रूम में रख दिया गया; 2) कुछ और लोग शामिल रहे हैं, जिन्हें संदेह के दायरे से बाहर रखा गया है। यद्यपि, यह भी सच है कि, किन्हीं कारणों के चलते संजय के परिवर का कोई भी सदस्य उसकी गिरफ्तारी के बाद उससे मिलने नहीं आया। उसकी बहन ने तो यहां तक कहा कि वह शादी के बाद से कभी भी भाई से मिलने नहीं गयी।
फैसले के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित
लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि जब कहा गया था कि 5 अन्य लोगों के डीएनए सैम्पल लिये गये थे, तो किस आधार पर? कोर्ट द्वारा उन लोगों में से एक को भी दोषी नहीं माना गया है। उन्हें कैसे दोषमुक्त सिद्ध किया गया, जबकि डीएनए सैम्पल प्रदूषित पाये गये थे? पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार अभया के शरीर पर 131 घाव थे। सवाल है कि क्या ये सारे घाव एक ही व्यक्ति, यानी संजय राय द्वारा दिये गये थे?
परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर इसे मान लिया गया है। सभी लोग जानते हैं कि वारदात होने के बाद, रात को ही अस्पताल के वाशरूम के बगल वाली दीवार को तोड़ दिया गया था, और नया निर्माण शुरू कर दिया गया था। आखिर यह हड़बड़ी क्यों दिखायी गयी?
क्या यह साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था? आखिर सीबीआई यहां से कोई साक्ष्य क्यों नहीं जुटा पायी? आसानी से यह मान लिया गया कि निर्माण कार्य साक्ष्य मिटाने के लिये नहीं किया गया था। यह अजीब तर्क है कि साक्ष्य नहीं मिले, तो माना जाये कि उन्हें नष्ट करने का उद्देश्य नहीं था। जिस सेमिनार हाल में वारदात को अंजाम दिया गया था, उसे पूरी तरह सील क्यों नहीं किया गया, और अनेक लोग वहां क्यों आते-जाते रहे; क्या प्रिंसिपल को कानून की इतनी भी जानकारी नहीं थी?
प्रिंसिपल द्वारा क्यों पहले पूरे मामले को छिपाने की कोशिश की गयी और 11 बजे माता-पिता को सूचित किया गया, जबकि उनको 9.45 बजे घटना की जानकारी मिल चुकी थी? क्यों उन्हें एमएसवीपी द्वारा बताया गया कि उनकी बेटी ने अत्महत्या कर ली थी? प्रिंसिपल ने पोस्ट मार्टम करवाने के मामले में भी बहुत सारे नियमों का उलंघन किया, और पुलिस को तुरंत सूचित कर अप्राकृतिक मृत्यु का एफाआईआर करने में बहुत देर की। फिर लाश को ताबड़तोड़ जलाने का काम पुलिस ने किसके आदेश पर किया? इसमें ताला पुलिस स्टेशन इंचार्ज की क्या भूमिका रही?
इन सारी बातों पर अतिरिक्त जिला व सेशन्स जज ने भी काफी सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने यहां तक कहा की एसआई खुद कोर्ट में कहता है कि उसने केस डायरी में खाली स्थान छोड़ा था, जिसे बाद में भरा; एसआई ताला पुलिस स्टेशन ने कोर्ट में खुलेआम स्वीकारा भी था कि अपनी अनुपस्थिति में, किसी अंजान की सूचना पर, जेनरल डायरी में उसने 10.10 बजे सुबह का समय डालकर 13 घंटे बाद एंट्री की।
कोर्ट ने थाने की कार्यपद्धति पर गम्भीर सवाल उठाए और ऐसे बयान को “निर्लज्जता” बताई। इसी तरह एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा अभियुक्त को जब्त किया हुआ फोन वापस देना और फिर जमा करना भी घोर लापरवाही का संकेत बताया गया। र्कोर्ट ने प्रिंसिपल और एसआई पर कार्यवही करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा की तहकीकात जारी रहेगी, क्योंकि केस बंद नहीं किया गया है।
संदीप घोष व अन्य को बक्शा नहीं जा सकता
प्रिंसिपल संदीप घोष के भ्रष्टाचार को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठाये थे; वह गिरफ्तार भी हुआ था। कई डाक्टरों का कहना था कि शायद अभया सब कुछ जान चुकी थी। इसलिये उससे बदला लिया गया। तब क्या इस ऐंगल से भी जांच ज़रूरी नहीं है? और फिर पुलिस की संदिग्ध भूमिका पर भी क्या जांच नहीं होनी चाहिये?
क्यों अभया के पिता को चुप रहने के लिये पैसे आफर करने के बाद गलतबयानी के लिये प्रेरित किया जा रहा था कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था? कहीं-न-कहीं यह इंगित करता है कि मामला काफी पेंचीदा है, और उसके पीछे कोई बड़ा षडयंत्र है, जिसका किंगपिन प्रिंसिपल संदीप घोष है, जो सिंडिकेट के नाम पर माफियातंत्र चलाता है। और उसका सहयोग पुलिस महकमा कर रहा है- क्या ममता जी के आदेश पर?
आखिर स्वास्थ्य और गृह मंत्रालय 2011 से उन्हीं के पास हैं। शायद इसीलिये गुंडों के एक बड़े हुजूम ने अस्पताल में हमला करके कमरों को तहस-नहस कर साक्ष्य मिटाने की आखरी कोशिश की थी। सीबीआई ने पहले तो इन मामलों पर जांच करने की बात कही थी, पर बाद में सप्लिमेंटरी चार्जशीट 90 दिनों के अंदर दखिल नहीं की, जिसके चलते बाकी अपराधी दोषमुक्त हो गये और उन्हें जमानत मिल गयी।
हमने यह देखा भी था कि चिकित्सक जब आंदोलन कर रहे थे, उनकी प्रमुख मांग प्रिंसिपल संदीप घोष पर मुकदमा चलाने की, और पुलिस आयुक्त विनीत गोयल व स्वास्थ्य सचिव नारायण स्वरूप निगम को बर्खास्त करने की थी। उन्हें किस आधार पर सज़ा से मुक्त कर दिया गया, जबकि एक बड़े अंतर्राष्टीय नेक्सस की बात खबरों में आ चुकी थी? एक महिला पुलिस अफसर इंदिरा मुकर्जी ने प्रेस वार्ता में पूरी वारदात की सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश किसके कहने पर की थी, यह भी जानना ज़रूरी है। पुलिस आयुक्त और स्वास्थ्य सचिव के संग संदीप घोष को बचाने में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एड़ी-चोटी का दम क्यों लगाया था?
क्या इनके ज़रिये चलाये जा रहे नेक्सस से उन्हें भी भारी लाभ मिल रहे हैं- इतने बड़े लाभ कि वह मुख्यमंत्री पद तक छोड़ने को तैयार थीं? फिर, सीबीआई ने भी साक्ष्य जुटाने में मेहनत और गहरी तहकीकात नहीं की। क्या राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच कोई मिलीभगत है, जैसा समाज के कई हलकों में चर्चा है?
क्या अभया को पहले ही किसी ने डिनर के साथ कोई नशीला पदार्थ दिया था, और उसे सेमिनार रूम में चैन से सोने की हिदायत दी? क्या इस नशे की वजह से वह ज़्यादा प्रतिरोध नहीं कर पायी, जैसा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ज़हिर होता है? आखिर अभया के विसेरा को जांच के लिये क्यों नहीं भेजा गया?
गवाहों का कहना है कि डिनर फूड डिलिवरी से मंगवाया गया था। तब कोर्ट में जिरह के दौरान यह सवाल क्यों नहीं पूछा गया कि उसे गवाह कैसे नहीं बनाया गया? पोस्टमार्टम में यह बात आयी है कि पीड़िता के वजाइना में कोई तरल पदार्थ पाया गया, लेकिन वह वीर्य नहीं था। तब आखिर वह क्या था? यह भी नहीं बताया गया कि पीड़ीता के गुप्तांगों में किस चीज़ से घाव किये गये। इससे पहले कि कुछ पता चलता, शव को जला दिया गया। अब क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट नये साक्ष्य प्राप्त कर पायेंगे?
पूरे मामले को अगर देखा जाये तो क्या सीबीआई की जांच और सियालदह कोर्ट का फैसला हमें किसी भी तरह संतुष्ट करते हैं? आंदोलनकारी चिकित्सक मेडिकल माफिया को टार्गेट कर रहे थे, पर उन्हें फैसले से निराशा ही हाथ लगी। अभी तक इस माफिया पर कोई निर्णायक चोट नहीं हुई है। पीड़िता के माता-पिता इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, पर उन्हें अभी लग रहा है कि संपूर्ण रूप से न्याय नहीं मिल पाया है, भले ही कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि उन्हें 17 लाख रुपये मुआवज़ा दिया जाये।
उनका यह भी कहना है कि वे हैरान हैं कि जिस ममता बनर्जी ने उस समय कुछ नहीं किया, जब उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिये थी, वही ममता संजय रॉय को शूली पर चढ़ाने के लिये बेहद उतावली दिख रही हैं। समाज के एक बड़े हिस्से में यह चिंता है कि ममता कहीं संजय को खत्म करके एक ही तीर से दो निशाने न साध रही हों- असली अपराधियों की भूमिका से ध्यान भटकाना, और उन तक पहुंचने के लिये आखरी व्यक्ति, संजय, को रास्ते से हमेशा के लिये हटा देना।
अभया के माता-पिता के वकील ने भी कठोरतम दंड की मांग की है; उन्होंने ज़ोर दिया कि “अस्पताल की सुरक्षा के लिये ज़िम्मेदार नागरिक स्वयंसेवक के रूप में रॉय के विश्वासघात के लिए कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।“ वकील का तर्क था, “उसने खुद ही उस पीड़िता के साथ जघन्य अपराध किया, जिसकी रक्षा उसे करनी थी।”
मिश्रित प्रतिक्रियाएं
कोलकाता मेडिकल कॉलेज में एनेस्थिसियोलॉजी और क्रिटिकल केयर विभाग की ऐसोसिएट प्रोफेसर कोयल मित्रा, जो डॉक्टरों के विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रही हैं, ने कहा: “हम बहुत निराश हैं कि इसे ‘रेयरेस्ट आफ़ रेयर’ केस नहीं माना गया है। अगर कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे लोगों का रक्षक माना जाता है (रॉय पहले से पुलिस बल से जुड़ा है) ऐसा जघन्य अपराध करता है, और जिसे ‘रेयरेस्ट आफ़ रेयर’ नहीं माना जाता है, तो यह बहुत आश्चर्यजनक है।“
इधर, महिला आंदोलन को भी लग रहा है कि न्याय नहीं मिल पाया; महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार की ओर से जबानी जमा खर्च ही किया गया। उन्हें लग रहा है कि अपराजिता बिल भी एक धोखा है। ‘रिक्लेम द नाइट’ आंदोलन शुरू करने वाली रिमझिम सिन्हा कहती हैं, “हम उम्मीद करते हैं कि न्यायपालिका इस मामले को सक्रिय निगरानी में रखेगी… इस जघन्य अपराध के लिए जिम्मेदार हर एक अपराधी की पहचान करेगी। कानूनी हस्तक्षेप निवारण का एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। हमें कार्रवाई योग्य सामाजिक बदलाव की भी आवश्यकता है और यह एक दीर्घकालिक संघर्ष है।“
केस का क्लोज़र नहीं हुआ
इस बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह इस मामले की सुनवाई करेगा। वह सीबीआई, पीड़िता के परिवार और अपराधी को सुनने के बाद ही तय करेगी कि राज्य सरकार की अपील स्वीकार की जायेगी या नहीं। हालांकि, सीबीआई ने यह तर्क देते हुए राज्य के याचिका दायर करने के अधिकार का विरोध किया, कि अभियोजन एजेंसी के रूप में, उसके पास यह अधिकार है कि वह अपर्याप्त सज़ा को आधार बनाकर ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दे।
पीड़िता का परिवार और अभियुक्त के पास भी यह अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी केस पर स्वयं संज्ञान लिया है, और पीड़िता के अभिभावकों की अपील सुनने के लिये 22 तारीख तय किया था, पर सुनवाई स्थगित कर 29 जनवरी की तारीख तय की गयी है। अब देखना बाकी है कि ऐसी एक घटना पर, जिसने देश की आत्मा को झकझोर दिया, इस व्यवस्था में किस हद तक न्याय की अपेक्षा की जा सकती है।
(कुमुदिनी पति महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं)
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