एप्सटीन फ़ाइलों का खुलासा: अमानवीकरण के विरुद्ध वैश्विक विद्रोह

दुनिया भर में स्त्रियों का अमानवीकरण किया जा रहा है। और दुनिया को लगा कि वह इससे नज़रें फेर सकती है। सत्तारूढ़ लोगों का विश्वास था कि बाहुबल, धनबल और रसूख़ के दम पर वे जवाबदेही से बच जाएंगे। वे ग़लत थे। एप्सटीन फ़ाइलों से लेकर काबुल की सड़कों तक, भारतीय अदालतों से जहाँ बलात्कारियों को सहज ही ज़मानत मिल जाती है, दक्षिण कोरिया के “4बी” आन्दोलन तक — हर जगह महिलाएँ सत्ता के सामने सच बोल रही हैं।

वे बर्बरता का शिकार हो रही हैं, धमकाई जा रही हैं, उन पर हमले हो रहे हैं। इसके बावजूद वे ओझल हो जाने को तैयार नहीं हैं। यह केवल जीवित रहने मात्र का संघर्ष नहीं, बल्कि वर्चस्व के विरुद्ध अवज्ञा, सज़ा माफ़ी के सामने बेअदबी, उत्पीड़न के खिलाफ बग़ावत, और नफ़रत व स्त्रीद्वेष के विरुद्ध प्रतिरोध है। यह स्त्रियों का वैश्विक विद्रोह है, जो न्याय, गरिमा और अपनी मानवीय पहचान की मान्यता की माँग उठा रहा है।

दुनिया केवल तमाशबीन नहीं रही। वह जाग रही है।

एप्सटीन फ़ाइलें निंदाजनक घटना से कहीं ज़्यादा हैं। वे केवल निजी अपराधों की झलक नहीं हैं। वे एक ऐसी व्यवस्था को बेनकाब करती हैं जो शोषकों के बचाव के लिए खड़ी है।

वे दिखाती हैं कि पूँजीवाद व्यवस्था को किस तरह सड़ा रहा है और अमानवीकरण की मशीनरी कैसे काम करती है—जहाँ धन अपराधों की ढाल बनता है, रसूख़ क़ानून को मोड़ देता है ताकि न्याय से महरूम किया जा सके, बाहुबल उन महिलाओं को धमकाता है जो आवाज़ उठाने का साहस करती हैं, और सत्ता महिलाओं की गरिमा को मिटाने की साज़िश रचती है।

राजनेता, व्यवसायी, अभिजात वर्ग और विभिन्न उद्योगों के उच्च-प्रोफ़ाइल पेशेवर एक-दूसरे से याराना, जबकि पीड़ितों को सार्वजनिक रूप से सदमे को बार-बार जीने के लिए मजबूर किया जाता है।

अफ़गानिस्तान में, तालिबान के शासन तले स्त्रियों को सार्वजनिक जीवन से सोचे समझे तरीक़े से मिटाया जा रहा है। क़ानून शरीर और आवाज़ दोनों पर ही पुरुषों की जकड़ को और मज़बूत बनाते हैं। घरेलू दायरे में पुरुष वर्चस्व को सामान्य बनाया जाता है, जबकि महिलाओं की आज़ादी गुनाह है। पितृसत्ता स्त्रियों के शोषण के लिए शासन करती है।

भारत में बर्बरता चौंकाने वाली दण्डमुक्ति के साथ जारी है। पीड़िता इंसाफ़ को हारते देखती हैं। बलात्कारियों और हत्यारों को आसानी से ज़मानत मिल रही है और वे खुलेआम घूम रहे हैं। कुछ को मालाएँ पहनाकर सम्मानित किया जा रहा है। हिंसा को पुरस्कृत किया जा रहा है। जो पीड़िता बोलने का साहस करती हैं, उन्हें कठोर सज़ा दी जाती है। ख़ामोशी थोप दी जाती है। महिलाओं की सुरक्षा के उपाय मानो लुप्त हो चुके हैं।

यह बिखरी हुई घटनाओं की श्रृंखला नहीं है। ये एक बीमार व्यवस्था के लक्षण हैं। यह एक वैश्विक पैटर्न है। बाहुबल, धनबल, अभिजात्यवाद और पौरुष एकजुट होते हैं, जबकि जवाबदेही ग़ायब हो जाती है। महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा आकस्मिक नहीं है; उसे निर्मित किया जाता है।

सत्ता के गलियारों, अदालतों, संसदों, पुलिस थानों और घरों में पुरुषों की रक्षा के लिए व्यवस्थाएँ बनायी जाती हैं। समाज को इस प्रकार ढाला जाता है कि अभिजात वर्ग का प्रभुत्व बना रहे। नियम, संस्कृति और संस्थाएँ इस तरह निर्मित की जाती हैं कि शीर्ष पर बैठे लोग नियंत्रण बनाए रखें, जबकि महिलाएँ उन व्यवस्थाओं में रास्ता तलाशती रहें जो कभी उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनायी ही नहीं गयीं।

वैश्विक स्तर पर शक्तिशाली लोग अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगे रहते हैं। व्यवस्था इन्सानों, मानवीय मूल्यों या समाज की नैतिक संरचना की रक्षा नहीं करती। सत्ता का उपयोग शक्तिशालियों को बचाने के लिए किया जाता है। पैसे को धनी लोगों की रक्षा के लिए जुटाया जाता है। रसूख़ को प्रभावशाली पुरुषों की सुरक्षा के लिए हथियार बनाया जाता है। बाहुबल का उपयोग महिलाओं को डराने और दबाने के लिए किया जाता है।

सब कुछ पितृसत्ता को बनाए रखने और पुरुष वर्चस्व को स्थायी करने के लिए रचा गया है। संस्थाएँ झुक जाती हैं। बयान तोड़े-मरोड़े जाते हैं। जवाबदेही इतनी हल्की कर दी जाती है कि अन्ततः ग़ायब हो जाती है। व्यवस्था विफल नहीं होती; वह ठीक उसी तरह काम करती है जैसे उसे बनाया गया है। वह अपनी ही कुरूपता की रक्षा करती है, भले ही वही कुरूपता पूरे समाज को क्षीण कर दे।

और इसी कुलीनतंत्रीय संरचना में सच छिपा है: यह आकस्मिक विफलता नहीं है। यह सुनियोजित संरक्षण है—एक किला, जिसे शक्तिशाली, प्रभावशाली और धनवान लोगों ने ख़ुद को नतीजों से बचाने के लिए बनाया है।

पितृसत्तात्मक वर्चस्व उस पैटर्न को मजबूत करता है जिसमें सत्ता में बैठे पुरुष मिलकर सुनिश्चित करते हैं कि महिलाओं की आवाज़ें दबा दी जाएँ, उनके शरीर वस्तु बना दिया जाये, और उनके दर्द को मिटा दिया जाए। अदालतों से लेकर कॉर्पोरेट कक्षों तक, सोशल मीडिया से निजी क्लबों तक, नियम एक ही हैं: शिकारी की रक्षा करो, पीड़िता को दण्डित करो।

और जब स्त्रियाँ बोलती हैं? उन पर सन्देह किया जाता है, अविश्वास जताया जाता है, शर्मिंदा किया जाता है, डराया जाता है और झूठा करार दिया जाता है। क़ानूनी व्यवस्था उत्पीड़कों से अधिक उनके चरित्र पर हमला करती है। घर में परिवार, प्रतिष्ठा और सामंजस्य बचाने के नाम पर उन्हें चुप करा दिया जाता है। सार्वजनिक जीवन में उन्हें ट्रोल किया जाता है, धमकाया जाता है और निशाना बनाया जाता है। जीवित बचना अपराध बन जाता है। बोलना विद्रोह बन जाता है। सत्य वक्ता के विरुद्ध हथियार बना दिया जाता है।

स्त्रीद्वेष इसी तरह ख़ुद को बनाए रखता है—स्त्रियों का अमानवीकरण करके, उन्हें वस्तुओं, सौदेबाज़ी की इकाइयों और प्रतिष्ठा के ज़ोखिमों में बदलकर। समाज को इस तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि वह अपराधियों से अधिक पीड़िताओं की जाँच करे। चुप्पी को पुरस्कृत किया जाता है। साहस को दण्डित किया जाता है।

इसके बावजूद, धन, सत्ता और प्रभाव के इस सुदृढ़ जाल के बाद भी महिलाएँ ग़ायब होने से इनकार करती हैं। दुनिया भर में महिलाएँ बोल रही हैं। वे दस्तावेज़ बना रही हैं। वे गवाही दे रही हैं। वे संगठित हो रही हैं। वे प्रतिरोध कर रही हैं। वे मुक़दमे लड़ रही हैं। वे रैलियाँ निकाल रही हैं। वे लिख रही हैं। वे एकजुटता के मंच बना रही हैं। कोई राज्य, कोई अदालत, कोई शासन, कोई अरबपति उन्हें चुप नहीं करा सकता।

फ्रांस में गिज़ेल पेलिकोट ने चुप रहने से इनकार कर दिया। उनके मामले में तकनीक ने उत्पीड़न को महज़ रिकॉर्ड नहीं किया; वह उसकी सहभागी बन गयी। स्त्रीद्वेष स्क्रीन और परछाइयों के माध्यम से संचालित हुआ, निजी हिंसा को तमाशे में बदलते हुए, अन्य शिकारियों को भाग लेने, उपभोग करने और अपमानित करने के लिए आमंत्रित करते हुए। जो छुपकर किया गया था, उसे अधिकार की तरह प्रसारित किया गया।

लेकिन जब वे सामने आईं, उन्होंने उस झूठ को बेनक़ाब कर दिया। बोलना केवल जीवित रहना नहीं था; वह प्रतिरोध था। वह उस संस्कृति में एक दरार थी जो स्त्रियों से अपेक्षा करती है कि वे अपने विरुद्ध किये गये अपराधों की शर्म ख़ुद झेलें। जब उन्होंने कहा, “शर्म को पक्ष बदलना चाहिए,” तो वह कानाफूसी नहीं थी, बल्कि उत्पीड़क व्यवस्था को ललकार थी। उन्होंने जवाबदेही वहीं लौटा दी जहाँ उसे होना चाहिए—अपराधियों और उस व्यवस्था पर जो उनकी रक्षा करती है।

उनके शब्द केवल गवाही नहीं थे; वे अभियोग थे। उन्होंने अपराधबोध को आत्मसात करने से इनकार कर दिया। यह मौन पीड़ा के युग के अन्त की घोषणा है।

गिज़ेल पेलिकोट का साहस, तालिबान के दमन के बीच अफ़गानी महिलाओं का प्रतिरोध, एप्सटीन पीड़ितों का दृढ़ निश्चय कि धन उनकी कहानियों को दफ़न नहीं कर सकता, और दक्षिण कोरियाई महिलाओं का “4बी” आन्दोलन—जो विवाह, मातृत्व, डेटिंग और विषमलैंगिक मानदण्डों को जड़ स्त्रीद्वेष के विरोध में अस्वीकार करता है—मिटाया नहीं जा सकता।

ये कार्रवाइयाँ पुरुष-प्रधान दुनिया को ख़ुद पर विचार करने के लिए विवश कर रही हैं। दुनियाभर में उठती महिलाओं की सामूहिक आवाज़ न्याय, गरिमा और स्त्रियों की पूर्ण मानवता की मान्यता की खुली और प्रखर माँग है।

ये आवाज़ें केवल उत्पीड़न का प्रतिरोध नहीं कर रहीं; वे दुनिया की पुनर्कल्पना कर रही हैं। अपने सपनों, आशाओं और अटूट आकांक्षाओं के माध्यम से स्त्रियाँ एक बेहतर दुनिया के निर्माण पर ज़ोर दे रही हैं—केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए। वे ऐसे समाज की कल्पना करने का साहस कर रही हैं जो नारीवादी मूल्यों पर आधारित हो, जहाँ सत्ता शिकार न करे, इंसाफ़ भेदभाव न करे, और मानवता पर कोई समझौता न हो।

यह केवल अन्याय के विरुद्ध विद्रोह नहीं है। यह परिवर्तन की प्रक्रिया है। चाहे महिलाओं को दबाने के लिए व्यवस्थाएं कितनी ही मज़बूत क्यों न बनायी गयी हों, प्रतिरोध और मजबूत होगा।

क्योंकि महिलाएँ न खामोश होंगी, न मिटाई जा सकेंगी। महिलाएँ उठ खड़ी होंगी।

(अधिवक्ता डॉ. शालू निगम का लेख काउंटर करेंट्स से साभार। अनुवाद: वृषाली श्रुति। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)

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