राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री की जंग राजनीति से प्रेरित!

महिला दिवस पर सारी दुनिया की महिलाएं जब अपने मसलों को लेकर चर्चाओं में जुटी हुई थी उसी दिन भारत की राष्ट्रपति महोदया द्रौपदी मुर्मू का मर्म विस्फोटक रुप से सामने आया। उन्होंने बंगाल के एक कार्यक्रम में राज्यपाल और मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति को रंगपंचमी पर ऐसा रंग दिया, जिसे सुनकर ऐसा लगा कि बंगाल चुनाव के मद्देनजर अपने कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ना पहुंचने पर अपमान का खेल रचा गया। एक तरह से ममता की छवि दूषित करने की चेष्टा की गई लेकिन उससे ममता का कुछ भी नहीं गया बल्कि राष्ट्रपति महोदया के कथित अपमान की बातें जो अभी दबे मुंह से सामने आती थी वो सार्वजनिक हो गईं। जो राष्ट्रपति के भविष्य लिए काफी तकलीफ़देह साबित होगा।

इसे नमक मिर्च लगाने में माहिर देश के प्रधानमंत्री ने आदिवासी महिला सहित तमाम महिलाओं का अपमान बताया है जिसने आग में घी का काम किया। और अपने मन की बात भी कह दी कि इससे तृणमूल को नुक्सान होगा। सोशल मीडिया पर वे वीडियो और चित्र सामने आ गए जब जब राष्ट्रपति महोदया का अपमान हमारे प्रधानमंत्री जी ने किया है।

याद दिलाया गया जब लालकृष्ण अडवाणी जी को भारत रत्न प्रदान किया गया तो महामहिम महोदया खड़ी हैं और प्रधानमंत्री जी कुर्सी पर अडवाणी जी के साथ आराम फरमा रहे हैं। इससे बड़ा संवैधानिक अपमान राष्ट्रपति का और क्या होगा? संविधान के मुताबिक सबसे प्रमुख राष्ट्रपति, उसके बाद उपराष्ट्रपति और तीसरे नंबर पर प्रधानमंत्री को ना केवल बैठने बल्कि चलने में भी निर्धारित किया गया है। याद यह भी कीजिए कि सेंट्रल विस्टा नए संसद भवन के उद्घाटन में भी देश की महामहिम जिनके अभिभाषण से संसद प्रारंभ होती है, उन्हें उस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया। राममंदिर के उद्घाटन में भी राष्ट्रपति महोदया की जो उपेक्षा हुई उसके पीछे एक आदिवासी राष्ट्रपति का अपमान नहीं था?

विचित्र बात है मुर्मू जी को तब अपने पद और गरिमा के अपमान का ख्याल नहीं आया। ऐसा तो कई बार हो चुका है जब राष्ट्रपति महोदया के राज्य के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नहीं पहुंचे वे जो भाजपाई थे। हाल ही में मथुरा प्रवास के दौरान राष्ट्रपति के कार्यक्रम में राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों नदारद रहे तब उन्होंने अपमान महसूस नहीं किया?

हरियाणा में भी मनोहर लाल खट्टर इसी तरह व्यवहार कर चुके हैं। पिछले महीने 13 फ़रवरी 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ब्रह्मा कुमारीज़ के एक ऑल-इंडिया कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया, और उस अवसर पर राष्ट्रपति ने गुरुग्राम स्थित ओम शांति रिट्रीट सेंटर के रजत जयंती समारोह का भी शुभारंभ किया। गुरुग्राम के कार्यक्रम में बिहार के राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान भी मौजूद थे। तब सूबे के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी नहीं आये थे। तब महामहिम कभी भावुक नहीं हुईं।

आदिवासी महिला राष्ट्रपति तब भी भावुक नहीं जब मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को नग्न कर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन हुआ। अन्तर्राष्ट्रीय जगत में अपनी धाक जमाने वाली पहलवान महिलाओं को घसीटा गया। दुनिया में ऐप्सटीन फाइल में नाबालिग बच्चियों के शोषण से सारी दुनिया कराह रही थी तब भी उन्होंने लेशमात्र चिंता नहीं जताई। फूल जैसी सुकुमार 151छात्राओं को ईरान में वहशी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार डाला वे चुप रहीं।

अब उनका भावुक होना संदेहास्पद है और राजनीति से प्रेरित है। राष्ट्रपति देश का महामहिम देश और विदेश के बारे में अपनी राय रख सकता है किंतु भाजपा काल में राज्यपाल और उपराष्ट्रपति की स्वायत्तता पर हमला होने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी इस षड्यंत्र का शिकार हुई हैं। जो लोकतांत्रिक इतिहास का एक दुखद अध्याय है।

माननीय आप बंगाल गईं सभा स्थल बदला गया, इसका दुख नहीं होना चाहिए। ये राज्य शासन का मामला है। संथाल कम या ज़्यादा पहुंचे इससे राष्ट्रपति की अवमानना नहीं होती। चुनाव थोड़ी है जो भीड़ जुटानी थी, आपका उद्देश्य बेशक राजनैतिक लाभ दिलाने का था। यह सोच ग़लत है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रपति को भाजपा के इशारे पर राजनीति में घसीटा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जिला प्रशासन ने शेयर किए गए ‘लाइन-अप’ के अनुसार ही राष्ट्रपति का स्वागत किया था और उस समय वे कोलकाता में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ धरने पर बैठी थीं।

इस घटना को भारत सरकार और अपने जिस तरह से तूल दिया है और राज्य शासन पर आरोप गढ़ा है उससे देश में सरकार और राष्ट्रपति की छवि दूषित हुई है। जहां तक प्रोटोकॉल का सवाल है। राज्यपाल आपका था उसे होना चाहिए था। किंतु कभी आपने यह सवाल नहीं उठाया इसलिए इसे बंगाल चुनाव से जोड़कर देखा ही जाएगा।

मुख्यमंत्री तो कई बार आपके कार्यक्रम में नदारद रहे। बंगाल मुख्यमंत्री से ये खीज और अपने अपमान को सार्वजनिक करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। महामहिम की गरिमा को गिराएं नहीं महोदया जी हम सबको आप पर नाज़ है।

(सुसंस्कृति परिहार ऐक्टिविस्ट और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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