मार्च 2023 में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास अधिकारी संकटग्रस्त यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) को नई दिल्ली में 9, रफ़ी मार्ग स्थित कार्यालय, जो संवाद समिति का मुख्यालय भी है, खाली कराने का आदेश देते हैं। यूएनआई इसके ख़िलाफ़ दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाती है और उसे अप्रैल 2023 में स्थगन आदेश मिलता है। अगले महीने यानी मई में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) से यूएनआई के कॉर्पोरेट इंसोल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) का आदेश आता है।
अक्टूबर 2022 में यूएनआई की यूनियन ने कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों के 103 करोड़ रुपए के बकाये के लिए एनसीएलटी का रूख किया था। एनसीएलटी का आदेश यूनियन के उसी आवेदन पर आया था।
यूएनआई का सीआईआरपी शुरू होने पर इंसोल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड की धारा 14 के कारण दिल्ली उच्च न्यायालय में चल रहे मामले पर मोर्टेरियम लग जाता है। सीआईआरपी प्रक्रिया फ़रवरी 2025 में समाप्त होती है और एनसीएलटी स्टेट्समैन लिमिटेड समूह का 72 करोड़ रुपए का रेजोल्यूशन प्लान स्वीकार करता है। इस तरह यूएनआई का मालिक स्टेट्समैन समूह बन जाता है।
उसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित मामले में फिर सुनवाई शुरू होती है और फैसला 20 मार्च 2026 आता है जिसमें उच्च न्यायालय यूएनआई की याचिका ख़ारिज करते हुए सरकार को यूएनआई कार्यालय खाली कराने का आदेश देता है। पुलिस उसी शाम यूएनआई कार्यालय पहुँचती है और पत्रकारों और कर्मचारियों को दफ़्तर से बाहर निकालकर दफ़्तर सील कर देती है।
यूएनआई जो एक मीडिया संस्थान है, और इसका मालिक स्टेट्समैन समूह वीडियो के साथ बयान जारी करता है जिसमें पुलिस पर कर्मचारियों से बदसलूकी के आरोप लगाएं जाते हैं. यूएनआई इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला भी करार देता है। यूएनआई जो बयान जारी करता है उसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश का ज़िक्र नहीं है।
यूएनआई के बयान और वेबसाइट पर खबर से भी ऐसा आभास मिलता है कि पुलिस बिना किसी नोटिस या सूचना के घुस आई और अदालती आदेश का हवाला तो दिया लेकिन आदेश दिखाया नहीं और दफ़्तर खाली कराया गया।
जाहिर है, इसकी सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया होनी ही थी और राजनीतिक दलों से लेकर पत्रकारों, जिनमें एजेंसी से अतीत में जुड़े पत्रकार भी शामिल थे, पत्रकार संगठनों के बयान आने लगे। इन बयानों में भी इसे प्रेस की आज़ादी पर हमले से लेकर पुलिस के रवैये की निंदा की गई और साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार के मीडिया पर लगातार कसे जा रहे शिकंजे से लेकर एजेंसी को अदानी के हवाले करने की कोशिश करार देने समेत तमाम बातें की गई।
ज़्यादातर प्रतिक्रियाओं का तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी सरकार पिछले ने पिछले 11 सालों में मीडिया के बड़े हिस्से को “गोदी मीडिया” बनाने का पाप किया है और आलोचनात्मक वैकल्पिक (डिजिटल मीडिया) को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पुलिस द्वारा पत्रकारों और कर्मचारियों के साथ बदसलूकी करने की भी आलोचना की जा सकती है, की ही जानी चाहिए। इतना कहने के बाद यह कहना ज़रूरी होगा कि इस घटना का “प्रेस की आज़ादी पर हमले” से कोई संबंध नहीं है।
यूएनआई का दफ़्तर कोई सरकार के ख़िलाफ़ खबर देने या “एंटी-एस्टेब्लिशमेंट” रूख अपनाने के लिए नहीं सील किया गया। यूएनआई और इसके मालिक स्टेट्समैन मुख्यधारा के मीडिया का ही हिस्सा हैं और यह ओपन सीक्रेट है कि मुख्यधारा का मीडिया मोदी सरकार के आगमन के बाद से ही सरकार विरोधी तेवर त्याग चुका है।
फिर सीआईआरपी प्रक्रिया के बाद भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 (2013 में संशोधित अधिनियम की धारा 8) के तहत ‘नॉट फॉर प्रॉफिट’ कंपनी नहीं रह गई, यह विभिन्न मीडिया समूहों के प्रतिनिधियों के यूएनआई निदेशक मंडल द्वारा संचालित होने के बजाय स्टेट्समैन समूह की मिल्कियत वाली इकाई बन गई।
यूएनआई का दफ़्तर ज़मीन विवाद को लेकर लगभग तीन साल चली कानूनी लड़ाई में उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सील किया गया। विवाद संक्षेप में यह था कि ज़मीन यूएनआई (2024 वर्ग मीटर) के साथ-साथ प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया (620 वर्ग मीटर) की भी थी। ज़मीन आवंटन की शर्तों में एक शर्त कार्यालय की इमारत का निर्माण करना भी था। पीसीआई पिछले कुछ वर्षों से इमारत बनाए जाने पर ज़ोर दे रहा था लेकिन यूएनआई इमारत निर्माण की स्थिति में नहीं था।
अंतत: पीसीआई ने केंद्रीय आवास एवं शहर निर्माण मंत्रालय से गुहार लगायी और कई दौर के पत्राचार, बैठकों के बाद सरकार ने यूएनआई से ज़मीन खाली करने को कहा, जिस पर कि यूएनआई ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।
अब इस मामले के सबसे दिलचस्प पहलू पर आते हैं। स्टेट्समैन ने भले यूएनआई सीआईआरपी में सफल रेजोल्यूशन आवेदक के रूप में 72 करोड़ के रेजोल्यूशन प्लान के साथ खरीदी लेकिन उसमें यह ज़मीन शामिल ही नहीं थी, हालांकि सीआईआरपी शुरू होते समय और सीआईआरपी की प्रक्रिया के दौरान उसके क़ब्ज़े में ज़रूर थी। ज़मीन का आवंटन रद्द हो चुका था और उस पर उच्च न्यायालय ने केवल स्थगन लगाया था, अंतिम निर्णय तो अब जाकर आया।
सीआईआरपी के दौरान जो यूएनआई की संपत्तियों का वैल्यूएशन किया गया, तो ज़मीन और इमारतों को मिलकर फेयर वैल्यू अधिकतम 54 करोड़ 31 लाख 21 हज़ार 396 रुपए और लिक्विडेशन वैल्यू अधिकतम 42 करोड़ 62 लाख 19 हज़ार 281 रुपए थी। इसमें दिल्ली की ज़मीन शामिल नहीं थी क्योंकि इसका मूल्य सैकड़ों करोड़ में होना चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक ख़बर के अनुसार ज़मीन का मूल्य 410 करोड़ रुपए आंका गया है। दिल्ली की ज़मीन को वैल्यूएशन में शामिल किया गया होता रेजोल्यूशन प्लान सिर्फ़ 72 करोड़ का नहीं हो सकता था।
अब इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर आते हैं। एनसीएलटी में यूनियन ने जब आवेदन दिया था तो कर्मचारियों का बकाया 103 करोड़ रुपए बताया गया था। सीआईआरपी शुरू होने के बाद रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने जब क्रेडिटर्स से दावे मंगवाए तो 700 से ज़्यादा कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों, ने लगभग 107 करोड़ के दावे प्रस्तुत किए (कुल दावे 129 करोड़ के थे)। इनमें 104 करोड़ के दावे एडमिटेड थे।
इसकी एवज़ में 72 करोड़ के रेजोल्यूशन प्लान में केवल 23.33 करोड़ रुपए कर्मचारियों/पूर्व कर्मचारियों को मिले। इनमें से भी यदि कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों की ग्रेच्युटी (जो स्टैच्यूटरी ड्यू मानी जाती है) की रकम 15 करोड़ निकाल दी जाये, तो बकाया वेतन व अन्य भतों के एवज़ में बकाया का केवल लगभग 8 से 9 फ़ीसदी ही भुगतान किया गया। जबकि बकाया में बड़ा हिस्सा वेतन का ही था।
अब यह बकाया वर्षों से यूएनआई कर्मचारियों को वेतन समय से न देने, सेवानिवृत्त होने पर ग्रेच्युटी समेत कोई भुगतान न करने से जमा हुआ था, जो यूएनआई प्रबंधन के कुप्रबंधन का नतीजा था।
एनसीएलटी का फैसला फरवरी में आया और उस पर अपालेट ट्रिब्यूनल ने मई में मुहर लगाई। मई में यूएनआई के कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों का रेजोल्यूशन प्लान के अनुसार बकाया भुगतान किया गया। कर्मचारियों ने डेढ़ दशक में नासूर बन चुकी समस्या का जैसा तैसा ही सही हल निकलने पर राहत की सांस ली तब स्टेट्समैन ने सभी कर्मचारियों की छुट्टी कर दी। जी हां, इस्तीफा ले लिया।
एक महीने में पत्रकारों और ग़ैर पत्रकार कर्मचारियों को मिलकर लगभग 150 कर्मचारियों का इस्तीफा लिया गया। संस्थान को चलाए रखने के लिए इनमें से कुछ पत्रकारों को कंपनी में दोबारा कॉन्ट्रैक्ट पर रख लिया गया और कुछ नई भर्तियां की गईं। जबकि रेजोल्यूशन प्लान में कहा गया था कि कर्मचारियों को निकाला नहीं जाएगा।
और अंत में, यूएनआई 2010 से संकटग्रस्त था। कर्मचारियों को वेतन का भुगतान समय पर नहीं मिल रहा था। मासिक वेतन भुगतान में देरी का आलम यह था कि पंद्रह साल में छह साल (72 महीने) का वेतन बकाया हो गया था! इसके अलावा सेवानिवृत्त होने, नौकरी छोड़ने, यहां तक कि मर जाने पर भी ग्रेच्युटी समेत कोई भुगतान नहीं होता था। अदालती लड़ाइयां जीतने के बाद भी कोई भुगतान नहीं होता था।
ग्रेच्युटी के भुगतान न करने के मामले में ही संस्थान के तत्कालीन निदेशकों के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी हो चुका था। अंत में, यूनियन एनसीएलटी में भी जाने को तब मजबूर हुई जब एक ब्यूरो प्रमुख स्तर के कर्मचारी ने चेन्नई में कार्यालय में फंदा लगाकर आत्महत्या की।
इस सबके लिए कुप्रबंधन जिम्मेदार था यानी प्रबंधक, संचालक, मालिक जिम्मेदार थे और यूएनआई के प्रबंधन का नियंत्रण किसके पास था? अर्थात इसके संचालक, मालिक (शेयरधारक और निदेशक मंडल) कौन थे? हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, एबीपी मणिपाल मीडिया जैसे अखबार चलाने वाले बड़े-बड़े कॉरपोरेट मीडिया समूह! यूएनआई का नया मालिक स्टेट्समैन भी इनमें शामिल था।
यूएनआई के वर्तमान कर्मचारियों के साथ एकजुटता ज़ाहिर करते हुए भी यह कहना पड़ेगा कि अगली बार जब कोई कॉर्पोरेट मीडिया समूह अपनी जमीन या कोई सुविधा छिनने पर “प्रेस की आजादी पर हमले” का शोर मचाए तो उससे यह जरूर पूछिएगा कि अपने कर्मचारियों, पत्रकारों को सम्मान से आजीविका कमाने, जीने की आजादी की कितनी गुंजाइश उन्होंने छोड़ रखी है?
(लेखक दिसंबर 1999 से जून 2025 तक यूएनआई की हिन्दी सेवा यूनीवार्ता में काम कर चुके हैं और इस समय जनचौक से मुंबई से सहयोगी के रूप में जुड़े हुए हैं।)