रिपोर्ट को नकार कर सरकार तानाशाही का प्रमाण दे रही!

स्वीडन के वी-डेम इंस्टिट्यूट की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक दुनिया में 92 ऐसे देश थे जहां तानाशाही (ऑटोक्रेसी) शासन है, जबकि 87 देश लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले थे। वहीं भारत अभी भी ‘चुनावी तानाशाही’ (इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी) की श्रेणी में बना हुआ है, जिसमें उसे 2017 में शामिल किया गया था।

 दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले “चुनावी तानाशाही” देशों में भारत को शामिल किया गया है।2025 के अंत तक दुनिया के पांच सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से चार—भारत, चीन, इंडोनेशिया और पाकिस्तान को तानाशाही शासन वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका भी तेजी से तानाशाही की दिशा में बढ़ रहा है।

पिछले कुछ माह में, भारत की पहले से ही संकटग्रस्त प्रतिष्ठा को दो और झटके लगे हैं। विश्व भर में स्वतंत्रता और लोकतंत्र की स्थिति का आकलन करने वाले दो प्रमुख वैश्विक संगठनों, वाशिंगटन स्थित फ्रीडम हाउस और स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय स्थित वैराइटीज ऑफ डेमोक्रेसी (वी-डेम) ने अपने वार्षिक आकलन जारी किए हैं। दोनों रिपोर्टों में भारत की स्थिति में भारी गिरावट आई है।

विदित हो, पिछले 2017 साल तक फ्रीडम हाउस ने भारत को ” स्वतंत्र ” देश के रूप में सूचीबद्ध किया था। नवीनतम रिपोर्ट में, इसने देश की स्थिति को “आंशिक रूप से स्वतंत्र” की श्रेणी में डाल दिया है। वी-डेम की रिपोर्ट तो इससे भी आगे बढ़ गई; इसने भारत को “चुनावी तानाशाही” के रूप में सूचीबद्ध किया, जो पिछले साल के उसके मूल्यांकन से भी नीचे है, जिसमें देश की स्थिति को “अत्यधिक अनिश्चित” बताया गया था।

एक महीने पहले, भारत ईआईयू के लोकतंत्र सूचकांक में दो पायदान नीचे खिसककर 167 देशों में से 53वें स्थान पर आ गया था और उसे “दोषपूर्ण लोकतंत्र” कहा गया था।

विदेश मंत्रालय ने कहा , “फ्रीडम हाउस के राजनीतिक निर्णय उनके नक्शों की तरह ही गलत और विकृत हैं।” इसे “पाखंड” बताते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा , “…दुनिया में कुछ ऐसे स्वघोषित संरक्षक हैं, जिन्हें यह बात पचाना बहुत मुश्किल लगता है कि भारत में कोई उनकी स्वीकृति नहीं मांग रहा है, उनके मनचाहे खेल को खेलने को तैयार नहीं है।”

उन्होंने कहा, “इसलिए वे अपने नियम, अपने मापदंड बनाते हैं, अपने फैसले सुनाते हैं और फिर ऐसा दिखाते हैं जैसे यह किसी तरह का वैश्विक अभ्यास हो।” 

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में ईआईयू के लोकतंत्र सूचकांक में भारत की रैंकिंग दो पायदान नीचे खिसककर 167 देशों में से 53वें स्थान पर आ गई और उसे “दोषपूर्ण लोकतंत्र” कहा गया । इसके बाद मोदी सरकार ने उनकी कार्यप्रणाली और नमूना आकार के बारे में जानने के लिए उनसे संपर्क किया , लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

सरकार ने ईआईयू से कोई प्रतिक्रिया न मिलने का फायदा उठाते हुए राज्यसभा सचिवालय से तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद द्वारा लोकतंत्र सूचकांक पर पूछे जाने वाले प्रश्न को अस्वीकार करने का अनुरोध किया, यह कहते हुए कि, “इसमें तुच्छ मामलों से संबंधित जानकारी शामिल है और ऐसे मामले उठाए गए हैं जो उन निकायों या व्यक्तियों के नियंत्रण में नहीं हैं जो प्राथमिक रूप से भारत सरकार के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं “।

अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंकों के निष्कर्षों को खारिज करते हुए, मोदी सरकार ने लगातार अपनी छवि सुधारने और परिणामों को चुनौती देने के प्रयास किए हैं। 

लेकिन ये सच है कि भारत में तानाशाही रवैए के शिकार लोकतांत्रिक चुनाव हो रहे हैं। सन् 2017 के बाद सम्पन्न चुनावों में तानाशाही का बोलबाला रहा अब वह इतना बढ़ चुका है कि चुनाव आयोग खुद ब खुद बंगाल में भाजपा की जीत का ऐलान कर रहा है। इसका मतलब क्या इस बार चूनाव आयोग ने चुनाव की पूरी तैयारी कर ली है और चुनाव मात्र लोकतांत्रिक दिखावे के लिए हो रहा है।

हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि स्वतंत्र चुनाव आयोग के गठन की प्रक्रिया से कैसे माननीय सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस को हटाया गया और अपने मंत्री को उस जगह बिठाया और तीन सदस्यीय कमेटी में वे दो और प्रतिपक्ष नेता। भला दो पर अकेले प्रतिपक्ष नेता क्या कर सकता है यहीं से चुनावी मनमानी शुरू हुई जिसने अब देश को चुनावी तानाशाही के हवाले कर दिया है। रिपोर्ट पूर्णतः सच है।इसको नकारना ही तानाशाही का प्रमाण है।वरना ऐसी घोषणा चुनाव से पूर्व आयोग कैसे कर सकता है।

(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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