ताक़त नहीं, हिम्मत देखिए हुज़ूर!

हमारे स्कूल-कॉलेज के दिनों में पटना का माहौल कुछ ऐसा था कि हम सामान्य घरों के ‘अच्छे’ माने जाने वाले बच्चे भी मार-पीट से ज्यादा अलग नहीं रह पाते थे। कब, किसकी कौन सी बात दूसरे को खटक जाएगी, वह मुद्दा बन जाएगी और दो लोग आपस में उलझ पड़ेंगे, समझना मुश्किल था। एक बार अगर ठन गई, तो फिर पीछे हटना अपनी शान के खिलाफ होता था। तो बहस का गाली-गलौज में बदलना और फिर मार-पीट शुरू हो जाना लाजिमी होता था।

अगर दो करीबी दोस्तों में ऐसा हुआ तब तो बाकी दोस्त बीच-बचाव की भूमिका में आ जाते और स्थिति ज्यादा बिगड़ने से पहले संभाल ली जाती थी। लेकिन अगर टकराव दो अलग क्लास, स्कूल या मोहल्ले के लड़कों में हुआ, तब बात बिगड़नी तय होती थी। वजह यह थी कि उस स्थिति में बीच-बचाव की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती थी।

दोनों समूहों के लड़कों के सामने मुख्य सवाल सही और गलत का नहीं, बल्कि अपने और पराये का होता था। अपने दोस्त का साथ देना और हर हाल में देना सबसे बड़ा मूल्य हुआ करता था। वरना, ‘गद्दारी’ का ऐसा दाग लगता जिसे छुड़ाना मुश्किल होता था।

उसी माहौल में एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मोहल्ले पुनाईचक के दो दोस्त शास्त्रीनगर से गुजर रहे थे कि वहां एक मैदान में क्रिकेट खेलते कुछ लड़कों ने उन्हें देख लिया और उनकी ओर दौड़े। इन दोस्तों में से एक को तत्काल बात समझ आ गई। उसने दूसरे से कहा, ‘तुम तुरंत यहां से निकल जाओ, मैं अब बुरी तरह पिटने वाला हूं। वह पूरा ग्रुप मुझे ही पीटने आ रहा है। परसों मेरा उनमें से एक लड़के से झगड़ा हो गया था।‘

दूसरा शांति से बोला, ‘घबराओ मत, ऐसा ही होगा तो साथ में पिटेंगे और क्या।’

देखते-देखते 12-15 लड़कों के उस समूह ने इन दोनों को घेर लिया। पहले उन दोनों लड़कों में बहस शुरू हुई जिनके बीच असल झगड़ा था।।

‘तुमने उस दिन मुझे क्यों मारा था?’

‘तुमने मुझे गाली क्यों दी थी?’

अभी ये बातें चल ही रही थीं कि उस ग्रुप के एक लड़के ने साथ लाए विकेट से पुनाईचक वाले लड़के के कंधे पर प्रहार करने की कोशिश की, पर कर नहीं सका। दूसरे दोस्त की एक शानदार किक ने विकेट को उसके हाथ से दूर फिंकवा दिया।

सब भौंचक्के ही थे कि इस दूसरे दोस्त की कड़कदार आवाज गूंजी, ‘देखो, जो भी समस्या है उस पर बात करो। शांति से बात करोगे तो सुनेंगे, लेकिन अगर बिना सोचे-समझे मार-पीट की तो आज भले हम पिट जाएं, इतना तय है कि जो हाथ सबसे पहले उठेगा, वह नहीं बचेगा। चाहे जब मौका मिले, उसे हर हाल में तोड़ देंगे।‘

इस आवाज का तत्काल असर यह हुआ कि जिस लड़के ने विकेट मारने की कोशिश की थी, उसे उसी ग्रुप के एक सदस्य ने थप्पड़ रसीद कर दी, कि जब बात हो रही है तो हाथ क्यों उठाया तुमने।

उसके बाद बातचीत हुई दोनों पक्षों में और ‘थोड़ी इसकी गलती है थोड़ी उसकी’ के तर्क से मामला सुलझ गया।

नियम-कानून, संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधियों-मर्यादाओं से अनजान उन बच्चों का मूल्यबोध भी तब खास विकसित नहीं था। फिर भी, यह घटना बताती है कि लड़ाई चाहे छोटी हो या बड़ी, वह केवल घातक हथियारों और बड़ी फौजों के सहारे नहीं जीती जाती। हिम्मत, हौसला और अक्ल किसी भी जीत की बुनियाद होती है। बुरी से बुरी हालत में भी पूरी ताकत से लड़ने का संकल्प ही किसी पक्ष को विजेता बनाता है।

इसीलिए ऐसा होता है कि जो ताकत देखकर पक्ष चुनते हैं, वे अक्सर न घर के रह जाते हैं और न घाट के। चाहे मामला आस-पड़ोस के झगड़ों का हो या बड़े-बड़े देशों के बीच होने वाली जंग का।

(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)

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