सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की मंज़ूरी के बिना एकतरफ़ा फ़ैसले लिए।
ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, साथ ही चुनाव आयोग की महानिदेशक (सूचना प्रद्योगिकी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से भी जवाब मांगा गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने कहा,”हमें नोटिस जारी करना होगा। नोटिस के बाद, अगर वे आते हैं और रिपोर्ट से पता चलता है कि चुनाव आयोग का कोई फ़ैसला न तो बहुमत से लिया गया था और न ही सर्वसम्मति से, तो उन्हें उन फ़ैसलों के बारे में सफ़ाई देनी होगी।”
याचिका में ‘को वारंटो’ (अधिकार-पृच्छा) रिट की मांग की गई थी। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने को कहा गया कि उन्होंने किस अधिकार के तहत काम किया है और कर रहे हैं, जैसे कि वे अकेले ही उस सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति का इस्तेमाल करने के हकदार हों, जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को दी गई है।
चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। जब तीनों के बीच आम सहमति नहीं बनती, तो बहुमत के आधार पर फैसले लिए जाते हैं। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने कई फैसले तब भी लिए जब दो चुनाव आयुक्त उनसे सहमत नहीं थे।
कोर्ट में राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर याचिका में सत्ता के “लगातार केंद्रीकरण”, एजेंडा और बैठकों के मिनट्स (कार्यवृत्त) की कमी या देरी, मतदाता सूची की प्रक्रियाओं में बदलाव और दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंज़ूरी के बिना अपील दायर करने का आरोप लगाया गया।
याचिका में उन 14 आपत्तियों का ज़िक्र किया गया जो दो चुनाव आयुक्तों ने 28 अक्टूबर 2025 और 14 अगस्त 2026 के बीच आयोग के नाम पर उनकी मंज़ूरी के बिना उठाए गए कदमों के खिलाफ दर्ज कराई थीं।
याचिका में कहा गया, “अगर संविधान के तहत एक बहु-सदस्यीय संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को दी गई शक्ति का इस्तेमाल असल में या वास्तव में उसके भीतर का कोई एक अधिकारी उस भागीदारी के बिना कर सकता है जिसकी ज़रूरत संविधान और 2023 के कानून में बताई गई है, तो मतदाता सूची में कौन होगा और इसलिए कौन वोट दे सकता है, यह तय करने वाले फैसले एक गंभीर संवैधानिक सवाल खड़ा करते हैं कि क्या ऐसे फैसले उस संवैधानिक प्राधिकरण द्वारा लिए जा रहे हैं जिसे संविधान ने इस मकसद के लिए बनाया था।”
याचिका में मांग की गई कि अगर यह पाया जाता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार आयोग के फैसले के बिना ऐसी सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल किया है या कर रहे हैं, तो शक्ति के ऐसे इस्तेमाल को अमान्य घोषित किया जाना चाहिए।
याचिका में यह घोषणा करने की भी मांग की गई कि स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न और एसआईआर के तहत की गई सभी कार्रवाइयां, फैसले, निर्देश और उससे जुड़े उपाय शुरू से ही शून्य और बिना कानूनी अधिकार के माने जाएं।
यह याचिका वकील सुदीप चंद्रा ने तैयार की थी और वकील मुदित गुप्ता के माध्यम से दायर की गई थी। आज याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए, वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ की धारा 16 का भी ज़िक्र किया, जो मुख्य चुनाव आयुक्त को सेवानिवृत्त होने के बाद भी सुरक्षा (इम्युनिटी) देती है।
विकास सिंह ने तर्क दिया,”यह पहले वाले अधिनियम में नहीं था।
सीजेआई कांत ने जवाब दिया,”पद पर रहते हुए सुरक्षा तो हमेशा समझी जाती है।”
हालांकि, सिंह ने कहा,”लेकिन इसमें ‘है या था’ लिखा है। यानी पद छोड़ने के बाद भी। किसी भी दूसरे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए ऐसी सुरक्षा की बात कभी नहीं सुनी गई। प्रधानमंत्री को भी ऐसी सुरक्षा नहीं मिलती।”
जस्टिस बागची ने कहा, “जजों को भी नहीं।
सिंह ने सहमति जताई और साफ़ किया कि वह अभी सेक्शन 16 को चुनौती नहीं दे रहे हैं। इसके बजाय, उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत सस्पेंड करने या उनसे मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर काम करने का अधिकार छीनने और उनकी जगह बाकी दो चुनाव आयुक्तों को काम करने की इजाज़त देने के लिए एक अंतरिम आदेश की मांग की।
उन्होंने कहा, “इस बीच, अनूप बरनवाल वाली स्थिति को बहाल किया जाए और मुख्य न्यायाधीश को सिलेक्शन कमिटी का सदस्य बनाया जाए। हम एक बहुत गंभीर स्थिति का सामना कर रहे हैं जो हमारे लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर सकती है। हमारा लोकतंत्र दुनिया भर में चुनाव कराने के तरीके के लिए जाना जाता है। 76 सालों से चुनाव आयोग का सम्मान रहा है। हो सकता है कि कुछ फैसलों पर सवाल उठे हों, लेकिन अब हम ऐसी स्थिति में हैं जहां खुद मुख्य चुनाव आयुक्त, एक संवैधानिक अधिकारी के तौर पर, उस कानून के बिल्कुल उलट काम कर रहे हैं जिसके तहत उनकी नियुक्ति हुई है। किसी अंतरिम आदेश की ज़रूरत होगी। वरना, यह सिलसिला चलता रहेगा।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा,”हमारे सामने कुछ पक्की जानकारी होनी चाहिए। आइए 10 दिन इंतज़ार करें।”
चुनाव आयोग के जिन फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन्हें रद्द करने के सवाल पर कोर्ट ने कहा,”अगर फैसलों में कुछ गलत है, तो हम उन्हें कभी भी रद्द कर सकते हैं। 1993 के संशोधन और 2023 के कानून, दोनों में इन बातों का ज़िक्र है। कामकाज के तरीके पर आम सहमति से फैसला लिया जाना चाहिए, जबकि काम बहुमत से हो सकता है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे पहले आम सहमति से फैसला लें। अगर आम सहमति नहीं बनती है, तो जैसा कि सही कहा गया है, बहुमत से फैसला लिया जा सकता है।”
इसके बाद सिंह ने बताया कि चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर कोई जवाब नहीं दिया है, बल्कि “बहुत ही अस्पष्ट भाषा में” एक प्रेस रिलीज़ जारी की है।
तब मुख्य न्यायाधीश ने कहा,”अखबार की रिपोर्ट 100 प्रतिशत सही, आंशिक रूप से सही या आंशिक रूप से गलत हो सकती है। हम आज उस आधार पर कोई आदेश नहीं दे सकते। लेकिन हम निश्चित रूप से जवाब चाहेंगे। उसके बाद, जो भी प्रक्रियात्मक ज़रूरतें होंगी, हम उनके लिए आदेश जारी करेंगे।”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि आयोग के जवाब से यह सामने आता है कि ऐसे फैसले लिए गए थे, जिनके लिए आवश्यक सर्वसम्मति नहीं थी, तो कोर्ट उन फैसलों को वापस लेने या रद्द करने पर विचार कर सकता है। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नोटिस के बाद, अगर वे आकर दिखाते हैं कि अमुक अमुक फैसले बिना सर्वसम्मति के लिए गए थे, तो हम उन फैसलों को वापस ले लेंगे।
चुनाव आयोग ने दावा किया था कि एसआईआर प्रक्रिया के लिए ऑनलाइन ‘फॉर्म 6’ के साथ जोड़े गए नए बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी थी। लेकिन आज मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के दौरान वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए रूप को मंजूरी नहीं दी है।
याचिका में गोवा और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। गोवा में 97 पात्र मतदाताओं को बहाल करने के निर्देश के बावजूद सॉफ्टवेयर में उन्हें बहाल करने की सुविधा नहीं होने का आरोप लगाया गया। पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख से अधिक अपीलों का भी जिक्र है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)