श्रीलंका में वाम गठबंधन को हासिल अभूतपूर्व जनादेश बहुत कुछ कहता है 

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कल सुबह तक यह स्पष्ट हो गया था कि 7 सप्ताह पूर्व राष्ट्रपति चुनाव में नेशनल पीपुल्स पॉवर (एनपीपी) के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी, अनुरा दिशानायके को जो जीत हासिल हुई थी, वह महज इत्तेफाक नहीं था। 

संसद की कुल 225 सीटों में 159 सीट पर जीत हासिल कर एनपीपी दो-तिहाई बहुमत के लक्ष्य को हासिल कर पाने में कामयाब रही है।  

इस ऐतिहासिक जीत की सूत्रधार एक ऐसी पार्टी रही है, जिसका श्रीलंका की राष्ट्रीय राजनीति में कई दशक से कोई बोलबाला नहीं रहा था और यह हाशिये की पार्टी मानी जाती थी। 

जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) की अगुवाई वाले नेशनल पीपुल्स पावर (एनपीपी) गठबंधन को एक के बाद एक कर आम जनता ने जैसा शानदार जनादेश दिया है, उसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही हो।

एनपीपी गठबंधन में भले ही जेवीपी एक प्रमुख दल की भूमिका में है, लेकिन कुल 21 संगठनों, नागरिक समूहों, ट्रेड यूनियनों एवं दलों के इस समुच्चय की शुरुआत 2019 में ही हो गई थी, हालांकि अभूतपूर्व सफलता उसे इस वर्ष ही मिल सकी है। 

2020 के संसदीय चुनावों में इस मोर्चे ने एसएलपीपी (श्री लंका पोदुजना पेरामुना) को टक्कर देने की कोशिश की थी, लेकिन एनपीपी को महज 3 सीटों से संतोष करना पड़ा था। 

श्रीलंका के संसदीय इतिहास में अभी तक जिन भी दलों का कब्जा रहा है, वे सभी एलीट (अभिजात्य) समूहों और वंशजों पर आधारित दल रहे हैं। गोटाबाया राजपक्षे के नेतृत्व में श्री लंका के संविधान में बीसवें संशोधन (20A) का संसद में एनपीपी नेता अनुरा दिशानायके ने जमकर विरोध किया था।

लेकिन दो तिहाई बहुमत के साथ तत्कालीन राजपक्षे सरकार इस पारित कराने में सफल रही। इसके साथ ही श्री लंका में शक्तियां राष्ट्रपति के हाथों में आ गईं और इसके बाद का इतिहास तो हम सभी जानते हैं। 

पिछले 3 दशकों से नस्लीय और जातीय हिंसा से घिरे श्रीलंका की अर्थव्यवस्था और समाज की स्थिति 2 वर्ष पूर्व घुटनों के बल आ गई, जब राष्ट्रपति राजपक्षे की मनमानेपूर्ण फैसलों और कोविड-19 महामारी की दोहरी मार से श्रीलंका में मुद्रा स्फीति, विदेशी कर्ज और आवश्यक पेट्रोल-डीजल के आयात के लिए विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह से खाली हो गया।  

दक्षिण एशिया में अपेक्षाकृत बेहतर अर्थव्यवस्था होने के बावजूद कैसे एक देश नस्लीय और जातीय हिंसा का शिकार होकर दिवालिया घोषित कर दिया गया, श्री लंका इसकी जीती-जागती मिसाल बन गया था। 

आम जनता की आशा और आकांक्षाओं को ताक पर रखकर इसके शासकों के लूट और भ्रष्टाचार और पारिवारिक सत्ता की एक ऐसी विरासत पेश की थी, जिसे बनाये रखने के लिए सिंहली-तमिल और बाद के दौर में सिंघली-मुस्लिम जातीय हिंसा को जमकर प्रश्रय दिया गया। 

भयानक मुद्रास्फीति और बर्बादी के खिलाफ 2022 में जो जन-विद्रोह श्रीलंका में उभरा, उसकी चपेट में राजपक्षे की सरकार को इस्तीफ़ा ही नहीं देना पड़ा बल्कि देश छोड़कर भागने के लिए भी मजबूर होना पड़ा।

हालांकि, देश को अराजकता की स्थिति से बचाने के नाम पर गोटाबाया राजपक्षे के विश्वासपात्र और अनुभवी नेता, रानिल विक्रमसिंघे को संकटकालीन राष्ट्रपति के तौर पर देश की कमान सौंप दी गई। 

वास्तव में देखें तो 2020 के संसदीय चुनाव में एनपीपी को जो 3 सीटें हासिल हुई थीं, उनमें से एक पर अरुणा दिशानायके और हरिणी अमरसुरिया विजयी हुई थीं, जो वर्तमान में देश की प्रधानमंत्री हैं। 

2022 में जब आम जनता सड़कों पर थी, उस दौरान जेवीपी और एनपीपी ने सक्रिय रूप से आन्दोलनकारियों के लिए धरना स्थल और आधारभूत स्तर पर सहयोग का काम कर अपने आधार को विस्तारित करने में अहम भूमिका अदा की थी। 

सितंबर में जब अरुणा दिशानायके को राष्ट्रपति पद पर जीत हासिल करने में सफलता प्राप्त हुई थी, तो भारत में कई वाम कार्यकर्ताओं का मत था कि जेवीपी जो कि 60 और 70 के दशक में एक अल्ट्रा लेफ्ट संगठन हुआ करता था, उसने संसदीय राजनीति में सफलता हासिल करने के लिए अपने भीतर काफी समझौता किया है।

इसके साथ ही जेवीपी के पूर्व इतिहास को लेकर भी संदेह जताया जा रहा था, कि इसके द्वारा सिंहली राष्ट्रवाद को प्रमुखता दी गई और श्रीलंका में तमिलों के नरसंहार में इसकी भूमिका रही है। 

यह वास्तव में एक ऐसा आरोप है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन महत्वपूर्ण यह नहीं है कि आप क्या थे, बल्कि आप क्या हैं और क्या करने जा रहे हैं, यह मायने रखता है। अतीत की गलतियों से सीखने और व्यापक जनभागीदारी को आधार बनाकर यदि बहुसंख्यक आबादी को कोई दल या मोर्चा गोलबंद करने में सफल रहता है, तो हमें उस पर भी ध्यान देना चाहिए। 

जाफना जैसे तमिल बहुल क्षेत्र में एनपीपी की जीत 

इस चुनाव का महत्व एनपीपी की जीत के प्रसार और भौगोलिक विस्तार में भी निहित है। तमिलों का घर कहे जाने वाले और श्रीलंकाई तमिल अरासु काडची का गढ़ माने जाने वाले उत्तरी प्रांत के जाफना एवं वन्नी में एनपीपी का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है।

बट्टिकलोआ को छोड़कर, मुसलमानों की बड़ी आबादी वाले पूर्वी इलाके और बहुसंख्यक पहाड़ी तमिलों के दबदबे वाले मध्य प्रांत के नुवारा एलिया जिले में एनपीपी शीर्ष पार्टी बनकर उभरी है। 

इस प्रचंड जीत को इस अर्थ में भी देखा जा सकता है कि एनपीपी को एक जिले के अलावा बाकी सभी जिलों में जीत हासिल हुई है।  इस जीत के साथ, एनपीपी ने वह उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसे पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे 2010 के चुनाव में लिट्टे की हार के बाद भी हासिल कर पाने में सफल नहीं हो सके थे।

वैकल्पिक आर्थिक-राजनीतिक मॉडल और व्यापक गठबंधन बना है प्रचंड जीत का सूत्रधार 

इस ऐतिहासिक जीत के बाद जब राष्ट्रपति अरुणा दिशानायके ने इसे पुनर्जागरण की दिशा में एक बड़ा कदम बताया तो असल में वे एनपीपी के घोषणापत्र को ही दुहरा रहे थे।  जेवीपी और 20 संगठनों के गठबंधन पर एक नजर डालने पर इस बात की पुष्टि हो जाती है। 

जेवीपी के अलावा इस गठबंधन के नाम कुछ इस प्रकार से हैं:- Aluth Prapura, Ethera Api, Public Servants for Public Service, National Bhikkhu Front, National Trade Union Centre, Sri Lanka Communist party (alternative group), Doctors for social justice, Samabhimani Collective, United left power, Inter company Employee Union, 71 Sahodarathwaya sasadaya, Aluth Priyapath, Mass Guiding Artists, Janodanaya, National Intellectuals Organisation, Dabindu Collective, University Teachers for social justice, Progressive Women’s collective, Husmata Husmak and All Ceylon Estate Workers Union।  

इन संगठनों के नाम पढ़कर ही आप समझ सकते हैं कि कैसे समाज में मौजूद बुद्धिजीवी वर्ग, ट्रेड यूनियन, महिला संगठनों और यहां तक कि बौद्ध संगठन तक को एक व्यापक मोर्चे के तहत 2019 से एक छतरी के तहत एकजुट कर एक बड़े उलटफेर को अंजाम दिया गया है।  

असल में इस व्यापक उलटफेर को संभव ही यदि किसी चीज ने बनाया है तो वह है नेशनल पीपल्स पॉवर (जाथिका जन बलावेगाया या एनपीपी) गठबंधन के तहत एक वैकल्पिक आर्थिक-सामजिक घोषणापत्र ने। 

अगस्त 2024 को जारी एनपीपी के घोषणापत्र पर सरसरी निगाह डालने से ही पता चलता है कि यह कोई चलताऊ चुनावी घोषणापत्र न होकर श्रीलंका के हर पहलू पर जारी किया गया एक विजन डॉक्यूमेंट है। 

इस विजन डॉक्यूमेंट को तैयार करने और इसे लागू करने में इन सभी संगठनों और नागरिक समूहों की भागीदारी रहने वाली है।पीपुल्स कलेक्टिव की यह पहल नवउदारवादी अर्थनीति के बरक्श एक ऐसी सामूहिक कोशिश है, जिस पर श्रीलंका के सभी जातीय समूहों ने भरोसा जताया है।  

श्रीलंका जैसे देश, जहां की जातीय हिंसा किसी भी मायने में भारत की तुलना में कई गुना रही है। एक ऐसे देश को बारूद के ढेर से उबारकर एकजुट राष्ट्र के तौर पर सबके लिए समान अवसर और संपन्न राष्ट्र की तस्वीर खींच पाना यदि संभव है तो भारत में यह कहीं ज्यादा आसानी से संभव हो सकता है। 

भारत जैसे बहुभाषी, भौगोलिक और सांस्कृतिक विभिन्नता वाले देश में हिन्दुत्ववादी शक्तियों के लिए यह अभी भी एक दुःस्वप्न इसीलिए बना हुआ है।  

एक बात और साफ़ होती है। चाहे फ़्रांस हो या अमेरिका या श्रीलंका, दुनिया में नवउदारवादी व्यवस्था ने समाजों में इतने बड़े पैमाने पर उथल-पुथल मचा दी है कि समाज में गैर-बराबरी ने जीवन को असह्य बना दिया है। जिन्हें कल तक मध्यमार्गी दल कहा जाता था, वे आज कंजरवेटिव पार्टी से भी ज्यादा रुढ़िवादी और साम्राज्यवादी, क्रोनी पूंजी की सेवा प्रदान करने में लगी हुई हैं।  

बढ़ती असमानता से निजात पाने के लिए दुनियाभर के देशों में आम लोग जनपक्षधर दलों और नीतियों की ओर देख रहे हैं, जिसे लुभाने के लिए धुर दक्षिणपंथी दल के पॉपुलिस्ट नेता आगे आ रहे हैं, और फ़्रांस एवं श्रीलंका की तरह कुछेक देशों में ही लेफ्ट पार्टियां नए विजन के साथ मुकम्मल कार्यक्रम के साथ सामने आ रहे हैं।  

एकाधिकार पूंजीवाद ने कोविड-19 महामारी से मुनाफे की जिस दर का स्वाद चख लिया है, वह उसे और भी ज्यादा बर्बर और हिंसक बनाती जा रही है। इस मार से बचने के लिए मजदूर, किसान, बेरोजगार युवा जब विकल्प की तलाश में नजर दौड़ाता है तो उसके पास आज भी भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में वही मध्यमार्गी दल मौजूद हैं, जिनसे उसे कोई उम्मीद नहीं।  

क्या भारत का वाम-जनवादी समूह इस गैप को भरने के बारे में सोच भी रहा है? क्योंकि, शून्य (vacuum) की स्थिति कभी नहीं रहती। 90% आबादी को आज रोजीरोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर की समानता की जितनी ज्यादा दरकार है, उतनी इससे पहले कभी नहीं थी। 

इस शून्य को भरने के लिए यदि सही उत्तराधिकारी नहीं आते तो यह मौका भी हर बार की तरह धुर-दक्षिणपंथ ही लूट लेगा।  

(रविंद्र पटवाल जनचौक संपादकीय टीम के सदस्य हैं)

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