वीबी-एसए बिल 2025: ‘विकसित भारत’ के नाम पर उच्च शिक्षा का पुनर्गठन – स्वायत्तता से नियंत्रण की ओर

संसद के शीतकालीन सत्र में देश की सत्ता अपने मकसद में साफ़ और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ी है। ऐसा लगता है मानों शासक वर्ग ने ठान लिया हो कि अपने वर्गीय हितों के एजेंडे का एक हिस्सा इस वर्ष के ख़त्म होने से पहले ही लागू करना है। हालाँकि देश की जनता आशा लगाए बैठी थी कि संसद में प्रदूषण से लेकर एसआईआर तक पर चर्चा होगी, लेकिन भाजपा की प्राथमिकता देश की जनता तो कभी रही नहीं।

इसलिए चर्चा एक खास मक़सद के साथ हुई राष्ट्र गीत पर। यह भी गौर करने वाली बात है कि यह सत्र बहुत छोटा था लेकिन इसमें कई महत्वपूर्ण बिल आए जो बिना किसी या बहुत कम चर्चा के पास हुए जिनमे ग्रामीण मेहनतकश के काम के अधिकार को खत्म करने के लिए विकसित भारत- रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल 2025 पास किया गया।

मज़दूरों के साथ ही देश के छात्रों पर भी बड़ा हमला आया जब देश की उच्च शिक्षा के नियामक ढांचे को पूरी तरह से बदलने के लिए लोकसभा में 15 दिसंबर को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025 लाया गया। हालांकि संसद के अंदर और बाहर बढ़ते प्रतिरोध को देखते हुए 15 दिसंबर को इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया।

उच्च शिक्षा पर सीधा हमला

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025 के माध्यम से सरकार का मकसद उच्च शिक्षा के व्यवसायीकरण के साथ-साथ, केंद्र सरकार के हाथों में सत्ता का असाधारण केंद्रीकरण है। हालांकि इसमें कुछ नया नहीं है यह भाजपा नीत केंद्र के शिक्षा के नई शिक्षा नीति 2020 में घोषित एजेंडे को आगे बढ़ाना ही है।

भाजपा सरकार द्वारा देश के छात्रों पर थोपी गई नई शिक्षा नीति 2020 में ‘ उच्चतर शिक्षा की नियामक प्रणाली में बदलाव’ के तहत चिंता जाहिर की गई है कि हमारे देश में उच्चतर शिक्षा का नियमन अत्यधिक सख्त और अप्रभावी रहा है, जिसमें कुछ निकायों में शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण और आपसी हित–संघर्ष के कारण जवाबदेही की गंभीर कमी बनी रही है।

इसके समाधान के तौर पर 18.2. में कहा गया है कि, “उपयुक्त मुद्दों को हल करने के लिए, उच्चतर शिक्षा की नियामक प्रणाली में यह सुनिश्चित करना होगा कि विनियमन, प्रत्यायन, फंडिंग और शैक्षणिक मानकों के निर्धारण जैसे विशेष कार्य, विशिष्ट, स्वतंत्र और सशक्त संस्थाओं/व्यवस्थाओं द्वारा संचालित किए जाएंगे। यह सिस्टम में चेक-एंड-बैलेंस बनाने, निकायों के आपसी हितों में टकराव को कम करने और कुछ निकायों में शक्तियों के अत्यधिक केंद्रीकरण को ख़त्म करने के लिए आवश्यक है।

यह सुनिश्चित करने के लिए चारों सांस्थानिक व्यवस्थाएं जो इन चार आधारभूत कार्यों को करती हैं स्वतंत्र रूप से अपना काम करने के साथ- साथ साझा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए तारतम्यता के साथ काम करें। इन चार संरचनाओं को एक प्रमुख संस्था, भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग (एचईसीआई) के तहत चार स्वतंत्र व्यवस्थाओं के रूप में स्थापित किया जाएगा।”

इसलिए यह विधेयक कोई अलग थलग प्रयास नहीं है बल्कि भाजपा सरकार के पूरी शिक्षा व्यवस्था को अपने केंद्रीय नियंत्रण में लेते हुए व्यावसायीकरण और साम्प्रदायिकरण के अभियान का हिस्सा है। इस लेख में हम इस बिल के प्रावधानों और उनका उच्च शिक्षा पर प्रभाव को समझने का प्रयास करेंगे ।

क्या है इस बिल में?

इस बिल के जरिये उच्च शिक्षा के रेगुलेशन के लिए एक नई व्यवस्था बनाना है। यह बिल एक आयोग के गठन का प्रावधान करता है जिसका नाम ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ होगा। बिल की धारा 4 में घोषित उद्देश्यों के अनुसार बिल का मकसद ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान नाम की एक सर्वोच्च अम्ब्रेला बॉडी बनाना है, जो भारत में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए रेगुलेशन, मान्यता और एकेडमिक स्टैंडर्ड सुनिश्चित करने के लिए तीन परिषदों के साथ, उच्च शिक्षा के
व्यापक और समग्र विकास के लिए दिशा-निर्देश देगी’।

इसके क्या मायने है?

अभी तक देश में उच्च शिक्षा के रेगुलेशन के लिए अलग संस्थाएं है जैसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई), राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई), राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग जो पहले मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता था , बार काउंसिल ऑफ इंडिया आदि, जो उच्च शिक्षा के अलग-अलग क्षेत्रों को नियंत्रित करती है।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई), और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) का स्थान लेगा और यह बिल इन निकायों के गठन से संबंधित तीन कानूनों को निरस्त करता है।

बिल का दायरा- किन संसथानो पर लागू होगा?

साधारण भाषा में समझें तो इसके अंतर्गत सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय और कॉलेज, शिक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक दायरे में कार्यरत राष्ट्रीय महत्व के संस्थान शामिल होंगे, जिनमें आईआईटी, एनआईटी, आईआईएससी, आईआईएसईआर, आईआईएम और आईआईटीआई शामिल हैं। गौरतलब है कि अब तक, आईआईटी और आईआईएम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा विनियमित नहीं थे।

किन संस्थानों पर लागू नहीं होगा?

इसी धारा के अनुसार अधिनियम के प्रावधान फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, भारतीय पशु चिकित्सा परिषद, पुनर्वास परिषद ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग, भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए राष्ट्रीय आयोग, होम्योपैथी के लिए राष्ट्रीय आयोग, संबद्ध एवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसायों के लिए राष्ट्रीय आयोग, राष्ट्रीय नर्सिंग एवं मिडवाइफरी
आयोग, राष्ट्रीय दंत आयोग, तथा ऐसे अन्य कार्यक्रम, संस्थान, आयोग या परिषदें, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए पर लागू नहीं होंगे।

बिल की धारा 5 में इस आयोग के गठन की रूपरेखा का प्रावधान किया गया है। आयोग के तहत तीन परिषदें काम करेंगी। इस आयोग में एक अध्यक्ष और 12 सदस्य होंगे। आयोग के सदस्यों में तीनों परिषदों के अध्यक्ष, केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा सचिव, पांच प्रख्यात विशेषज्ञ, राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों के दो प्रख्यात शिक्षाविद शामिल होंगे।

आयोग के अध्यक्ष एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होंगे जिनकी नियुक्ति मानद क्षमता में की जाएगी। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार की अनुशंसाओं पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

आयोग के अंतर्गत तीन प्रमुख परिषदों का गठन किया जाएगा।

-पहली, विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद जो उच्च शिक्षा के लिए एक समान और केंद्रीय नियामक के रूप में कार्य करेगी।

– दूसरी, विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद् जो उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रत्यायन (एक्रेडेशन) की संपूर्ण प्रणाली की देखरेख करेगी।

-और तीसरी, विकसित भारत मानक परिषद, जो शैक्षणिक मानकों के निर्धारण और उनके अनुपालन को सुनिश्चित करने का दायित्व निभाएगी।

परिषदों की संरचना के अनुसार, प्रत्येक परिषद का नेतृत्व एक अध्यक्ष करेगा तथा उसमें अधिकतम 14 सदस्य होंगे। परिषदों के अध्यक्ष उच्च शिक्षा या अनुसंधान के क्षेत्र के प्रतिष्ठित और प्रख्यात व्यक्ति होंगे, जिनके पास प्रोफेसर के समकक्ष न्यूनतम दस वर्षों का अनुभव होना अनिवार्य होगा।

परिषदों के सदस्यों में प्रख्यात विशेषज्ञ, केंद्रीय उच्च शिक्षा विभाग द्वारा नामित एक सदस्य तथा अन्य दो परिषदों द्वारा नामित सदस्य शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त, नियामक परिषद और मानक परिषद में राज्य सरकारों द्वारा बारी- बारी से एक-एक नामित सदस्य भी सम्मिलित किया जाएगा।

बिल की धारा 6 के अनुसार आयोग के प्रमुख कार्यों में उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए रणनीतिक दिशा प्रदान करना, उच्च शिक्षण संस्थानों को बड़े बहु-विषयक शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों में विकसित करने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना, तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए नीतिगत और व्यावहारिक योजनाओं का सुझाव देना शामिल होगा।

आयोग, परिषदों के बीच प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करने के लिए उन्हें आवश्यक निर्देश दे सकेगा और उनके सुचारू संचालन हेतु वित्तीय सहायता भी प्रदान करेगा।

वर्तमान उच्च शिक्षा व्यवस्था पर इस बिल का प्रभाव:

देश की स्वतंत्रता के बाद यह आम सहमति बनी थी कि उच्च शिक्षा एक सार्वजनिक हित का क्षेत्र है, और इसी समझ के तहत यूजीसी प्रणाली का उदय हुआ। यह भी सच है कि यूजीसी में नौकरशाही जटिलताएँ तथा और भी कई तरह की अक्षमताएँ रही हैं, फिर भी उसकी एक वैधानिक जिम्मेदारी थी, वह केवल नियामक संस्था नहीं थी, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने की बाध्यकारी भूमिका भी निभाती थी।

यूजीसी एक संघीय ढाँचे के भीतर काम करती थी, जिसमें राज्य विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित थी, और वह विश्वविद्यालयों तथा प्रत्यक्ष कार्यकारी हस्तक्षेप के बीच एक सुरक्षात्मक दीवार के रूप में कार्य करती थी। इसके विपरीत, वीबीएसए उच्च शिक्षा में एक ऐसा नियामक राज्य स्थापित करता है, जिसकी कोई सार्वजनिक जवाबदेही नहीं है।

संघीय ढांचे पर हमला:

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है शिक्षा समवर्ती सूची में आती है। उच्च शिक्षा संस्थान, खासकर राज्य विश्वविद्यालय, अलग-अलग भाषाई, सामाजिक और आर्थिक माहौल में काम करते हैं। इसी के आधार पर देश में उच्च शिक्षा केंद्र और राज्यों के बीच एक जटिल और बातचीत वाले रिश्ते से विकसित हुई है, जिसे क्षेत्रीय इतिहास, भाषाई परंपराओं और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं ने आकार दिया है।

इस बिल का प्रस्तावित रेगुलेटरी ढांचा इस विविधता को नई दिल्ली में बनाए गए एक समान राष्ट्रीय टेम्पलेट में बदलने की कोशिश है और केंद्र से थोपी गई इस रेगुलेटरी एकरूपता से एक जैसे मॉडल को अपनाने की कोशिश में इस विविधता के खत्म होने का खतरा है।

यह बिल पूरे उच्च शिक्षा रेगुलेटरी के पूरे सिस्टम को मज़बूती से केंद्र सरकार के अधीन कर देगा। आयोग और परिषदों के सदस्यों की नियुक्तियों में राज्य सरकारों की कोई संस्थागत भूमिका नहीं यदि हम इस बिल की धारा 45 और 47 को ध्यान से देखें, तो केंद्रीकरण और भी स्पष्ट हो जाता है।

ये धाराएँ केंद्र सरकार को नीति- निर्माण का पूर्ण अधिकार देती हैं। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल की धारा 45 (1) कहती है कि “इस अधिनियम के अंतर्गत अपने कर्तव्यों के निर्वहन में, इस अधिनियम के तहत गठित या स्थापित प्रत्येक निकाय केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर लिखित रूप में दिए गए नीति से संबंधित निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होगा।”

स्वायत्तता के नाम पर केंद्र का रिमोट कंट्रोल:

यही नहीं अगर किसी मामले पर यह असहमति होती है कि वह “पॉलिसी” है या नहीं, तो इसका फैसला केंद्र सरकार करेगी, और उसका फैसला अंतिम होगा और इस आयोग और उसके परिषदों पर अनिवार्य तौर पर लागू होगा।

बिल की धारा 45 (2) प्रावधान करती है कि, “यदि केंद्र सरकार और इस अधिनियम के तहत गठित या स्थापित किसी भी निकाय के बीच इस बात को लेकर कोई मतभेद उत्पन्न होता है कि कोई प्रश्न नीति से संबंधित है या नहीं, तो इस संबंध में केंद्र सरकार का निर्णय अंतिम होगा।”

इसी में 45 (3) निर्देशित करती है कि केंद्र सरकार आयोग या परिषदों को ऐसे अन्य कार्य करने का निर्देश दे सकती है, जिन्हें वह उपयुक्त समझे। इसका मतलब है कि सरकार के स्वायत्तता के सारे दावे खोखले है। बिल के उपरोक्त प्रावधान साफ़ दर्शाते है कि केंद्र सरकार के निर्णय ही इस बिल को लागू करने होंगे।

यह केवल निर्णय थोपने तक सिमित नहीं है बल्कि जब केंद्र सरकार को महसूस होगा कि यह आयोग, सरकार के रिमोट कंट्रोल के आदेशों के अनुसार काम नहीं कर रह तो इस बिल के अनुसार उसके पास आयोग को हटाने की शक्तियां हैं।

इस बिल की धारा 47 (1) के अनुसार “यदि किसी भी समय केंद्र सरकार की यह राय बनती है कि -(क) आयोग या कोई भी परिषद इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत उस पर लगाए गए कार्यों और दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थ है; या (ख) इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित आयोग या परिषद, जैसा भी मामला हो, ने केंद्र सरकार द्वारा इस अधिनियम के तहत दिए गए किसी निर्देश का पालन करने में या इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत उस पर लगाए गए कार्यों और दायित्वों के निर्वहन में लगातार चूक की है:-

तो केंद्र सरकार, भारत के राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, आयोग या परिषदों (जैसा भी मामला हो) को ऐसे समयावधि के लिए, जो छह माह से अधिक न हो, जैसा कि आदेश में निर्दिष्ट किया जाए, निलंबित (सुपरसीड) कर सकती है।

दरअसल नियामक स्वतंत्रता विश्वसनीय शैक्षणिक शासन की एक बुनियाद है। कभी-कभी कई मुद्दों पर उसका सरकार के साथ मतभेद भी हो सकता है। सामान्यत: सरकार उसे सलाह भी देती है और नियामक आयोग सरकार को कई तरह की सिफारिशें भी करता है। लेकिन जब सरकार की सभी राय आयोग पर बाध्यकारी होगी और न मानने की स्थिति में सरकार उसे बर्खास्त कर सकती है तो नियामक संस्था का मूल कार्य, जो स्वायत्तता पर आधारित है, प्रभावित होगा।

‘भारतीयकरण’ के नाम पर हिंदुत्व का एजेंडा:

इसके अलावा नई शिक्षा नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए इस बिल में भारतीय ज्ञान, भाषाओं तथा कलाओं को बढ़ावा देने की बात की गई। इस बिल की धारा 9 में आयोग के कार्यों का प्रावधान किया गया है, जिसमें उपधारा (घ) कहती है कि बहु-विषयक उच्च शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत भारतीय (भारतीय) ज्ञान, भाषाओं और कलाओं के एकीकरण एवं संवर्धन के लिए रोडमैप तैयार करना; और (ज) कहती है कि छात्रों के सीखने के अनुभवों को समृद्ध करने और अधिगम परिणामों को प्राप्त करने के उद्देश्य से भारतीय ज्ञान, कलाओं और भाषाओं के संवर्धन हेतु शिक्षा का भारतीयकरण।

हम जानते हैं कि किसी भी देश का पारंपरिक ज्ञान और भाषाओं को वहां शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए लेकिन भाजपा काल में भारतीय ज्ञान के मायने भी बदल जाते हैं। भाजपा काल में केवल एक धर्म से संबंधित भाषा, ज्ञान और कला ही देश पर थोपे जा रहे हैं। इसका एक छोटा परन्तु बहुत ही महत्वपूर्ण उदाहरण है, एक बहुभाषीय देश पर हिंदी भाषा की शब्दावली में बनाया गया बिल थोपना।

हिंदी में लिखे जा रहे लेख में इस पर चर्चा करना ज्यादा आवश्यक हो जाता है कि इस देश में कोई एक भाषा सभी पर नहीं थोपी जानी चाहिए चाहे यह हिंदी ही क्यों न हो। दरअसल यह केवल हिंदी नहीं बल्कि बहुसंख्यक प्रचलित भाषा को थोपना है।

ग्रेडेड ऑटोनॉमी: स्वायत्तता या निजीकरण का दूसरा नाम

इसके अलावा इस बिल में ग्रेडेड ऑटोनोमी पर विशेष जोर दिया गया है। ग्रेडेड ऑटोनोमी के बारे में हम नई नीति की समीक्षा के समय काफी चर्चा कर चुके हैं। इस ग्रेडेड ऑटोनोमी के परिणाम पूरे देश में पहले से ही दिख रहे हैं। वैसे इनकी समझ के अनुसार संस्थानों की स्वायत्तता, उनके द्वारा शैक्षणिक तथा अन्य निर्णय लेना नहीं बल्कि केवल वित्तीय स्वायत्तता है जिसके तहत आपको अपने संसाधन खुद जुटाने हैं। जिसका सीधा मतलब है फीस में बढ़ौतरी और स्व- वित्तपोषित कोर्स शुरू करना।

स्वायत्तता का सही मायने हैं सिंडिकेट्स, कार्यकारी परिषद् और अकादमिक परिषद् द्वारा शिक्षण संस्थानों से जुड़े निर्णयों को लेना जो उनकी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तिथियों के अनुसार होंगे। इन निर्णायक संस्थाओं में छात्रों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। लेकिन इस बिल में, नई शिक्षा नीति की तरह ही, कहीं पर भी छात्रों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के प्रतिनिधियों का नीति निर्धारण या निर्णय लेने में किसी तरह की भूमिका का कोई प्रावधान नहीं है।

उच्च शिक्षा का केन्द्रीयकरण और यूजीसी को खत्म करने के प्रयास कोई नई बात नहीं है। इससे पहले यूपीए सरकार और बाद में बीजेपी सरकार द्वारा भी ऐसे प्रयास किए गए थे। राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा और अनुसंधान परिषद का प्रस्ताव शिक्षा जगत के व्यापक विरोध के कारण यूपीए सरकार को ख़ारिज करना पड़ा।

इसके बाद बीजेपी सरकार ने उच्च शिक्षा सशक्तिकरण नियामक एजेंसी का प्रस्ताव रखा और 2018 में भारतीय उच्च शिक्षा आयोग लाने की बात की, जिसका उद्देश्य यूजीसी और एआईसीटीई को बदलना था। सरकार की इस कोशिश को हर तरफ से आलोचना का सामना करना पड़ा था और वह आगे नहीं बढ़ पाई।

यह विचार राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान का भी एक प्रमुख हिस्सा था। यह मांग असल में भारतीय कॉर्पोरेट घरानों और विदेशी पूँजी काफी समय से करती आई है ताकि उच्च शिक्षा का पूरा नियंत्रण केंद्र के हाथों में चला जाये जिससे उन्हें अरबों रुपये के तथाकथित भारतीय उच्च शिक्षा में अनाप शनाप मुनाफाखोरी करने की खुली छूट मिल जाये।

कुल मिलाकर विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, भारतीय उच्च शिक्षा में एक बुनियादी संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है, एक ऐसे तंत्र से, जो सार्वजनिक जवाबदेही और सामाजिक दायित्व पर आधारित था, एक केंद्रीकृत, तकनीकी-नौकरशाही और बाज़ार-अनुकूल शासन मॉडल की ओर। स्वायत्तता, उत्कृष्टता और सुधार की भाषा के पीछे यह विधेयक संघवाद को कमजोर करता है, लोकतांत्रिक भागीदारी को हाशिये पर डालता है और शिक्षा के वस्तुकरण को और गहरा करता है।

सार्वजनिक उच्च शिक्षा को सशक्त करने के बजाय, यह ढांचा विश्वविद्यालयों को ऐसे विनियमित सेवा-प्रदाताओं में बदलने का जोखिम पैदा करता है, जो समाज, छात्रों और संविधान के प्रति जवाबदेह होने के बजाय मान्यता-सूचकांकों और केंद्रीय सत्ता के प्रति अधिक उत्तरदायी होंगे।

(लेखक आल इंडिया ऐग्रिकल्चर वर्कर्स यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।)

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