Thursday, February 9, 2023

विक्रम सिंह

ज़मीन की कमी नहीं, शासकों का वर्ग हित है देश में भूमिहीनता का मुख्य कारण 

आजादी के 75 वर्षों के बाद भी एक तरफ बड़ी जमींदारी और दूसरी तरफ भूमिहीनता का उच्च स्तर भारत के कृषि प्रधान समाज की विशेषता है। यह केवल दावा नहीं है बल्कि देश की सच्चाई है जिसकी पुष्टि भारत...

खाद्यान्न की कमी नहीं बल्कि पूंजीवादी मुनाफा है बढ़ती भुखमरी का कारण

प्रकृति की गोद में आदि मानव के रूप में अपना जीवन शुरू कर आधुनिक इंसान ने अथाह प्रगति कर ली है। प्रकृति से संघर्ष की प्रक्रिया में संसाधनों को अपने जीवन को सुरक्षित करने के लिए उपयोग करने में...

आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है

जब भी हमारे देश में जाति, जातिगत हिंसा और जातिगत भेदभाव की बात शुरू होती है तो यह आरक्षण तक पहुंच जाती है और अंतत: जनता के इतने बड़े हिस्से का ऐतिहासिक उत्पीड़न चर्चा से गायब हो जाता है...

संविधान दिवस के नाम पर मनु के विचार की जयकार

हमने अपने देश की स्वाधीनता एक लम्बी लड़ाई के बाद हासिल की है जिसमे देश के सभी समुदायों ने अपना योगदान दिया है। इस लम्बे और बलिदानों से भरे स्वाधीनता आंदोलन में हम केवल अंग्रेजो के खिलाफ ही नहीं...

आजादी का अमृत महोत्सव में कहाँ है खेतिहर मज़दूर

आज़ादी का ख्याल ही बहुत खूबसूरत है। हालांकि यह बात अलग है कि हमारे देश में आज़ादी के 75 वर्ष तक पहुंचते पहुंचते 'आज़ाद ख्याल' नाक़ाबिल-ए- बर्दाश्त हो गया है। अगस्त महीने में हमारे देश में आज़ादी का उत्सव...

उत्तर प्रदेश में रोजगार की कब्र पर बनते मंदिर

नरेन्द्र मोदी की सरकार के एक बेहूदा निर्णय ने देश के नौजवानों को सड़कों पर आंदोलन के लिए मज़बूत कर दिया है। केंद्र सरकार के सेना में अग्निपथ योजना के जरिये चार सालों के लिए भर्ती के निर्णय के...

मनरेगा: न मज़दूरी बढ़ी-न काम के दिन, ऑनलाइन हाज़री का फ़तवा आया

पिछले कुछ दिनों में हमारे देश में एक अलग ही तस्वीर उभर कर आ रही है। किसने सोचा था कि रामनवमी के त्यौहार का साम्रदायिक उन्माद फैलाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। टेलीविज़न पर और सोशल मीडिया...

किसान आंदोलन को मुस्तैदी से करनी होगी अपनी ‘जीत’ की रक्षा

हमारे देश में एक बहुत ही प्रचलित कहावत है "चोर चोरी से जाए पर हेरा फेरी से नहीं"। ऐसा ही कुछ हाल केंद्र में भाजपा सरकार का है। हालाँकि सरकार की कारगुज़ारी इस कहावत से कहीं गहरी, सोची समझी...

सामाजिक न्याय: आज़ाद भारत में मनु के द्रोणाचार्य

मानव समाज में शोषण के अनेक रूप रहे हैं जिसमें अलग अलग तरीकों से एक इंसान दूसरे इंसान का शोषण करता रहा है। इन सब रूपों में मूलत: उत्पादन के साधनों और मानव श्रम से पैदा अतिरिक्त पर मिल्कियत...

मेरिट की सामंती अवधारणा के खिलाफ है नीट पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

आज के दौर में मेरिट के नाम पर आरक्षण पर चौतरफा हमला हो रहा है और मेरिट की सामंती व्याख्या की जाती है जिसमें छात्रों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि को जानबूझ कर नज़रअंदाज किया जाता है। ब्राह्मणवादी...

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‘उफ़! टू मच डेमोक्रेसी’: सादा ज़बान में विरोधाभासों से निकलता व्यंग्य

डॉ. द्रोण कुमार शर्मा का व्यंग्य-संग्रह ‘उफ़! टू मच डेमोक्रेसी’ गुलमोहर किताब से प्रकाशित हुआ है। वैसे तो ये व्यंग्य ‘न्यूज़क्लिक’...