मोदी के नफरती चुनाव प्रचार अभियान के पीछे क्या है?

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पोलैंड से होलोकास्ट सर्वाइवर एब फॉक्समैन ने कहा था, “ऑस्चविट्स में गैस चैम्बर और शवदाहगृह ईंटों से नहीं शब्दों से शुरू हुए थे… बुरे शब्दों, नफरती शब्दों, एंटीसेमिटिक शब्दों, पूर्वाग्रहों से भरे शब्दों से। और फिर चुप्पियों शब्दों के अभाव में ही हिंसा को बढ़ावा दिया गया।”

विश्व के सबसे घनी आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री के शब्दों और चुप्पियों से ही भारत की सबसे बड़ी धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी यानि 20 करोड़ मुसलमानों के लिए इसके शत्रुतापूर्ण और भय से युक्त भूमि के रूप में बढ़ने को समझा जा सकता है।

2024 के भारतीय राष्ट्रीय चुनावों में चुनाव प्रचार अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उग्र नफरती भाषणों की शृंखला से उठा धूल का गुब्बार अभी थमा नहीं है और यह लंबे समय तक रहने वाला है।

पांच और वर्षों तक शासन करने के लिए वोट मांगते समय अपने भाषणों में मोदी ने भारतीय मुस्लिमों को जानबूझकर ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले, घुसपैठिये और वोट जिहाद करने वाले करार दिया।

हिन्दुत्व दक्षिणपंथी प्रचार मशीन आम तौर पर मुस्लिमों पर लव जिहाद, भूमि जिहाद, कोरोना जिहाद, मज़ार जिहाद और यहां तक कि थूक जिहाद समेत कई तरह की जिहाद की साजिश रचने का आरोप लगाती है पर वोट जिहाद तो नई ईजाद ही है। उनकी पार्टी के लिए वोट करना हिन्दू धर्म और भारत देश के प्रति निष्ठा का संकेत है। विपक्ष के लिए वोट करना दोनों के लिए खतरा और एक खतरनाक साजिश है।

मुस्लिमों पर निशाना साधने के लिए वैसे मोदी ने हिन्दुत्व के जाने-माने दुष्प्रचार को ही दोहराया और ऐसे दावे किए कि वह हिन्दू बहुल भारत में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए दोनों तरीकों से साजिश कर रहे हैं, यानि ज्यादा बच्चे भी पैदा कर रहे हैं और बांग्लादेश जैसे मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों से घुसपैठ भी कर रहे हैं। इन तरीकों के जरिए वह देश में हिन्दू बहुसंख्यकों को आबादी के मामले में पीछे छोड़ना चाहते हैं।

लेकिन, प्रमाण ऐसे दावों को स्पष्ट तौर पर झुठलाते हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में गैरकानूनी प्रवासी बहुत कम संख्या में हैं। मुस्लिमों में अपेक्षाकृत बड़े परिवार आकारों की इस अनुभवजन्य सच्चाई को लेकर कोई साजिशकारी या सांस्कृतिक सोच नहीं है। आखिरकार, देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल जम्मू एवं कश्मीर में प्रजनन दर 1.4 ही है जो राष्ट्रीय प्रजनन दर 2 से कम है। तमिलनाडु में मुस्लिमों के परिवार का आकार बिहार के हिन्दू परिवारों से छोटा है। आबादी के कई अध्ययनों ने स्थापित किया है कि हिंदुओं और मुस्लिमों का प्रजनन व्यवहार एक जैसे आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर एक जैसा ही है। चूंकि हिंदुओं के मुकाबले मुस्लिमों में गरीबी और अशिक्षा अपेक्षाकृत ज्यादा है, इसलिए उनके परिवार बड़े होते हैं।

इसके अलावा, परिवार का आकार मुस्लिमों समेत सभी समुदायों में कम हो रहा है। मुस्लिमों में 1992 के 4.4 से प्रजनन दर 2019-20 में घटकर 2.3 हो गई। वास्तव में परिवार के आकार में गिरावट की दर मुस्लिमों में हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा है। इसके अलावा, यह असंभव ही है कि मुस्लिम आबादी के मामले में हिंदुओं से ज्यादा हो जाएं, वह भी ऐसे देश में जहां (2011 की जनगणना के अनुसार) हिन्दू आबादी का 80 फीसदी और मुस्लिम केवल 14 फीसदी थे। लेकिन, नफरती भाषण पर सच की असुविधा कहां लगाम लगा सकती है।

हालांकि, मोदी के नफरती बयानों को राष्ट्रव्यापी और अंतर्राष्ट्रीय सनसनी आंशिक रूप से बेवजह है। आखिरकार मोदी द्वारा नफरती बयान देना कोई नई बात नहीं है। 2024 चुनाव प्रचार के दौरान मोदी के नफरती बयानों में मुस्लिमों और उनके प्रमुख विपक्षी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के खिलाफ नफरती पूर्वाग्रह फैलाने में नया कुछ नहीं है। इसके विपरीत, यह पूर्वाग्रह उनके सार्वजनिक बयानबाजी का हिस्सा रहे हैं। जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उन बारह वर्षों में भी ऐसे बयान आते थे। लेकिन जब वह भारत के प्रधानमंत्री बने, तो तभी से उन्होंने सावधानी बरती कि मुस्लिमों के खिलाफ उनके हमले ढंके-छिपे हों। 2024 के भाषणों में नया यह है कि मोदी भारतीय मुस्लिमों को एक सड़कछाप कट्टरपंथी की भाषा में नंगे रूप में ट्रोल कर रहे हैं। इसके साथ उन्होंने आखिरकार उस झीने आवरण को हटा दिया है जो मुस्लिमों के लिए देश के नेता के रूप में एक दशक में उनके पूर्वाग्रहों और नफरत के नंगेपन को छिपाए हुए था।

यह बयान भारतीय लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण पल को रेखांकित करते हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि किसी प्रधानमंत्री ने इस खुले तौर पर भारतीय नागरिकों के एक वर्ग को विषैले, पूर्वाग्रहों, नफरत और झूठ से बदनाम किया हो। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि किसी प्रधानमंत्री ने अपने राजनीतिक विपक्ष को बदनाम करने के लिए ऐसे झूठ ईजाद किए हों। उनकी टिप्पणियों की देश में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो निंदा हो रही है, उसे नजरंदाज करते हुए मोदी नफरती झूठ बोलना जारी रखे हुए हैं।

लेकिन, अब तक उन्होंने जो झीना आवरण पहन रखा था, उसके पीछे देखें तो मुस्लिमों के प्रति उनका द्वेषभाव उनके सार्वजनिक भाषणों से कभी गैरहाजिर नहीं रहा। वरिष्ठ पत्रकार ज्योति पुनवानी ने नरेंद्र मोदी के 2013 से नफरती भाषणों का संकलन किया है। उनका संकलन बताता है कि मोदी के नफरती भाषणों में भारतीय मुस्लिमों को बदनाम करना आम बात है। दूसरी बात वह विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस पर सत्ता में बने रहने के लिए मुस्लिम वोट हासिल करने के उद्देश्य से मुस्लिमों के प्रति “नरम” रुख अपनाने और हिंदुओं से अन्याय करने का आरोप लगाते रहे हैं।

2013-14 में असम और बंगाल में भाषणों से लेकर राजस्थान में 2024 में भाषण तक मुस्लिम विरोधी नफरत का एक सूत्र जो समान है वह यह झूठ है कि देश में आए मुस्लिम “घुसपैठिये” हैं। देश में आने वाले कुछ (हिन्दू बंगाली पढ़ें) धार्मिक उत्पीड़न से प्रताड़ित होकर आए हैं और “मां भारती” को इनका खुली बाहों से स्वागत करना चाहिए। अन्य (मुस्लिम बंगाली पढ़ें) को कांग्रेस गैरकानूनी रूप से लाई है अपना वोट बैंक बनाने के लिए। यह घुसपैठिये “यहां जन्मे लोगों का रोजगार और हक छीन रहे हैं” और इन्हें यहां से निकाल बाहर करना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में एक भाषण में, उन्होंने खुल कर कहा कि बांग्लादेश से आए उन्हीं लोगों का स्वागत है जो “दुर्गाष्टमी मनाते” हैं। जब वह प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में थे, उनके एक ऐसे बयान, जो उन्होंने पश्चिम बंगाल में दिया था और असम में बांग्लादेश से कथित घुसपैठ की आलोचना की थी, के कुछ दिनों बाद 1 मई 2014 को सशस्त्र उग्रवादियों ने असम के बक्सा जिले में एक बंगाली मूल के मुस्लिमों के गांव में गोलीबारी की, जिसमें 45 लोग मारे गए। इनमें अधिकांश महिलायें और बच्चे थे। इस हिंसक घटना की तथ्य शोधक समिति के सदस्य के रूप में मैं वहां गई थी।

प्रधानमंत्री रहते मोदी के एक दशक के भाषणों में भारतीय मुस्लिमों की अहसान फ़रामोशी के बारे में कई और आरोप हैं और यह दावे भी कि विपक्षी पार्टियों ने इनकी अनदेखी की है अपना मुस्लिम वोट बैंक बनाए रखने के लिए। वह आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस “धर्मनिरपेक्षता के बुर्के” में छिपती रही है।

यह विचार कि मुस्लिम भारत के अन्य नागरिकों से कमतर हैं मोदी के राहुल गांधी पर इस तंज से भी सामने आता है कि उन्होंने मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण केरल के वायनाड को चुना। यह ऐसा ही है कि मुस्लिम मतदाताओं पर निर्भरता हिन्दू वोट चाहने के मुकाबले कम वैध है। और मोदी हिन्दू-विरोधी होने को लेकर कांग्रेस का मज़ाक उड़ाते समय अपनी हिन्दू पहचान को उछालते हैं। वह मालेगांव में आतंकवादी हमले की आरोपी को 2019 आम चुनाव में भाजपा प्रत्याशी बनाने को सही ठहराते हुए कहते हैं कि “यह उन्हें जवाब है जिन्होंने 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति को बदनाम किया है… और उन्हें आतंकवादी कहा है।” वह अयोध्या में राम मंदिर का उल्लेख ऐसे करते हैं जिसके लिए “करोड़ों भारतीयों” ने “हजारों वर्ष” इंतजार किया।

जब नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के खिलाफ सभी धर्मों के लोगों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए, उन्होंने कपड़ों से प्रदर्शनकारियों को पहचानने की बात कही, जिससे उनका आशय था कि केवल मुस्लिम विरोध कर रहे थे।

पिछले एक दशक में मोदी ने मुस्लिमों के खिलाफ जो आरोप लगाए हैं उनमें यह दावे शामिल हैं कि मुस्लिम काजीरंगा नेशनल पार्क में गैंडों का शिकार करते हैं; कि आतंकी हिंसा को व्यापक मुस्लिम समर्थन है; कि हिन्दू लड़कियों को मुस्लिम युवा छेड़ते हैं, परेशान करते हैं जिसकी वजह से “हमारी बहू- बेटियां” स्वतंत्र रूप से कहीं आ-जा नहीं सकतीं और उनके अभिभावकों को “सिर झुककर” यह सहना होता है; और गैर भाजपा सरकारें मांस निर्यात के लिए सब्सिडी बढ़ाती जा रही हैं और दूध देने वाले पशुओं, खासकर गायों के पालन के लिए सब्सिडी नहीं देतीं। मोदी अक्सर “पिंक रेवलूशन” की बात करते हैं, जो जानवरों के मांस और मांस निर्यात के संदर्भ में है।

मोदी देश की तीन सबसे बड़ी बुराइयों के रूप में वंशवाद (कांग्रेस के नेहरू-गांधी परिवार नेतृत्व के लिए कोडवर्ड), भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण (यह भारतीय मुस्लिमों के विकास और सरंक्षण के लिए नीतियों और कार्यक्रमों के लिए कोडवर्ड है) का ज़िक्र करते हैं। कांग्रेस (सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी) द्वारा अपने चहेते “वोट बैंक” (मुस्लिम पढ़ें) के प्रति तुष्टीकरण का आरोप लगाते कभी थकते नहीं हैं। सांसदों को मोदी के लिखे एक पत्र में कांग्रेस पर मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टीकरण के आरोप के गरिमापूर्ण जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने घोषणा की कि कांग्रेस का वोट बैंक देश के लोग हैं।

2024 चुनावी भाषणों में मोदी के दावे खास नुकीले होने लगे, जिस दौरान उन्होंने स्पष्ट झूठ दोहराया कि कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में हिन्दू महिलाओं की बचत और आभूषण (शादी के पवित्र प्रतीक मंगलसूत्र समेत) छीनकर मुस्लिमों को देने का वादा किया है। सार्वजनिक कथनों में सच से वफ़ा का प्रदर्शन मोदी नहीं ही करते लेकिन यह झूठ अलहदा ही था क्योंकि कांग्रेस घोषणापत्र में एक बार भी मुस्लिम शब्द नहीं था और संपत्ति के पुनर्वितरण की बात नहीं करता।

वह लगातार “वोट बैंक राजनीति”- अधिकांशत: उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं होता- का ज़िक्र करते हुए ऐसी नीतियों की बात करते हैं जो खास मुस्लिमों को लाभ पहुंचाने वाली और हिंदुओं को इन लाभों को वंचित करने वाली की ही जाति हैं। उदाहरण के लिए, 2017 में उन्होंने घोषणा की कि एक गांव में यदि कब्रिस्तान बनता है तो शमशान भी बनना चाहिए। कहने का मतलब यह था कि गैर भाजपा सरकारें हिंदुओं के मरने के बाद भी उनसे भेदभाव करती हैं। यदि रमजान में अबाधित बिजली मिलती है तो दिवाली में भी मिलनी चाहिए। उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया कि गैर भाजपा सरकारें इन तरीकों से धार्मिक समूहों के बीच भेदभाव करती हैं लेकिन उनका मकसद पूरा हो चुका था, हिंदुओं के प्रति स्थायी अन्याय की भावना उकसाने का।

वह यह आरोप भी लगाते हैं कि कांग्रेस अनुसूचित जातियों और पिछड़ों के समूहों से शिक्षा और नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण छीनकर “एक खास समुदाय” या अपने “चहेते समूह” अर्थात मुस्लिमों को देना चाहती है। यह 2024 चुनावों में मोदी द्वारा बार-बार दोहराया जाने वाला झूठ है वंचित समूहों के हिन्दू मतदाताओं को डराने के लिए।

मोदी के करीबी धन्ना सेठ गौतम अडानी के खरीदे जाने से पहले एनडीटीवी ने 2009 से 2022 तक “वीआईपी नफरती भाषणों” पर एक रिपोर्ट दी थी। यह सरकार में शामिल व संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों, केन्द्रीय व राज्यों के मंत्रियों, संसद विधानसभाओं के सदस्यों और वरिष्ठ पार्टी नेताओं समेत वरिष्ठ राजनीतिक लोगों के नफरती बयानों पर है। एनडीटीवी ने पाया कि 2014-22 के दौरान वीआईपी नफरती बयानों में 2009-2014 में नफरती बयानों के मुकाबले 1130 फीसदी वृद्धि हुई। यह तेज वृद्धि मोदी सरकार के पहले आठ वर्षों में हुई कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के पांच वर्षों की तुलना में हुई। यह भी देखा गया कि हर पांच वीआईपी नफरती भाषणों में से चार भाजपा नेताओं के थे। पिछले पांच वर्षों की तुलना में मोदी के शासन में हर महीने वीआईपी नफरती भाषण 13 गुना थे।

सबसे कुख्यात वीआईपी नफरती बयान देने वालों में मोदी के करीबी केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह थे। उन्हें 2014 में चुनाव आयोग ने फटकार भी लगाई थी जब उन्होंने मुजफ्फरनगर में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा को सही ठहराया था। उन्होंने बांग्लादेश से अवैध तरीके से आने वालों को “दीमक” करार दिया था। वायर ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के तीन महीनों में 34 बयान ट्रैक किए थे। सौ से ज्यादा उदाहरण नफरती बयान के मिले जिनमें उन्होंने मुस्लिमों को आतंकवादी, खतरनाक गिरोहबाज, माफिया, दंगाई और यौन शिकारी आदि कहा। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा लगातार अपनी सरकार द्वारा मुस्लिम मदरसे तोड़ने और मुस्लिम अतिक्रमण ढहाने की उपलब्धियों की शेखी बघारते रहे। जब सब्जियों के दाम बढ़े तो अजीबोगरीब आरोप में उन्होंने मुस्लिम उत्पादकों पर दोष मढ़ा कि उन्होंने सब्जियों का स्टॉक जमा कर रखा है कि दाम बढ़ जाएं। यह सब बिना किसी प्रमाण के था और उन्होंने उनके बहिष्कार का आह्वान कर दिया।

उल्लेखनीय यह है कि मोदी ने अपनी सरकार और पार्टी के सहयोगियों की इस नफरती बयानबाजी को रोकने की कोशिश कभी नहीं की। नफरती बयान देने वाले बल्कि पार्टी और सरकार में पद देकर और केंद्र में मंत्री बनाकर भी पुरस्कृत किए गए। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के नफरती बयानों को खुले समर्थन का संकेत साफ तौर पर नफरती बयानों का अनुमोदन भी था और प्रोत्साहन भी।

मोदी की कई बातों के लिए आलोचना की जा सकती है लेकिन वह कमजोर नहीं हैं। वह नफरती बयानबाजी पर अंकुश लगाना चाहते तो, उनकी तरफ से एक इशारा काफी होता सबको चुप कराने के लिए। लेकिन, वह कुछ नहीं बोले।

नफरती भाषणों के प्रति मोदी की कभी न खत्म होने वाली भूख का खाद-पानी क्या है? यह सच है कि मोदी के मुस्लिमों और राजनीतिक विपक्ष के प्रति झूठ से भरे नफरती बयानों में चुनाव के समय खासी वृद्धि हो जाती है। वह पूर्वाग्रहों और कट्टरपंथी व नफरती झूठ गहरे उतरते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास है कि यह उनके कट्टर हिन्दू वोट बैंक के मूल समर्थन आधार को मजबूत करेगा। उनके चेहराविहीन समर्थकों की विशाल इंटरनेट सेना, जिसमें कुछ पेड हैं और कुछ अनपेड, ने इंटरनेट को भयावह इस्लामोफोबिक झूठ से भर दिया है, पत्रकार कुणाल पुरोहित के शब्दों में यह नफरत के रोजाना डोज़ का धीमा ड्रिप है। इन ऑनलाइन नफरती पोस्ट की संख्या चुनाव से पहले बहुत बढ़ जाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि सोशल मीडिया पर मोदी ऐसे हर व्यक्ति को फॉलो करते हैं जो मुस्लिम विरोधी नफरती और विषैली पोस्ट डालते हैं।

लेकिन, यह मानना एक भूल ही होगा कि मोदी के नेतृत्व में नफरती बयानबाजी हाल के वर्षों में वृद्धि केवल एक चुनावी रणनीति है। भारतीय समाज में कुछ तो बदला है जो मोदी को वह करने देता है जो वह करते हैं।

2024 के चुनाव प्रचार अभियान में मोदी के नफरती बयानों को पूर्णता में समझने के लिए हमें यह भी याद रखना होगा कि मुस्लिमों के प्रति नफरत हिन्दुत्व परियोजना के मूल में वैसे ही है जैसे नाजी परियोजना में यहूदियों के प्रति नफरत थी। आरएसएस नरेंद्र मोदी का वैचारिक ध्रुवतारा है, जिस पार्टी और हिन्दुत्व कॉडर सेना का वह नेतृत्व करते हैं, इस्लामोफोबिया आरएसएस का प्रमुख विचारधारात्मक आधार है।

एक बार फिर से पोलिश होलोकास्ट सर्वाइवर एब फॉक्समैन की चेतावनी याद करें कि नरसंहार शब्दों – बुरे शब्दों, नफरती शब्दों… पूर्वाग्रह भरे शब्दों से ही नहीं शब्दों के अभाव यानि चुप्पी से भी शुरू होता है।

मोदी के नेतृत्व में नफरत और भय का माहौल, जिसमें भारत बह सा गया है, उनके “बुरे शब्दों” का भी नतीजा है और उनकी चुनिंदा चुप्पियों का भी। यह चुप्पियां ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वैसे मोदी के पास शब्दों की कमी नहीं है और यह चुप्पियां ही प्रधानमंत्री का डीफाल्ट प्रतिसाद होती हैं जब उनकी सरकार और पार्टी के सहयोगी नियमित रूप से नफरत फैलाते हैं।

होलोकास्ट सर्वाइवरों की चेतावनियों की अनदेखी अपने विनाश की कीमत पर ही कर सकते हैं। जरूरी है कि हम उनकी चेतावनियों पर ध्यान दें, इससे पहले कि कोई नरसंहार शुरू हो, जिसका आधार नफरती बयानों से तैयार किया गया है। फिर, नरसंहार की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं यदि नफरती बयानों की परियोजना का नेतृत्व कोई मजबूत नेता कर रहा हो।

(हर्ष मंदर रिटायर्ड आईएएस और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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