जब अंग्रेज़ी इंग्लैंड के आम लोगों की भाषा थी, शासकों की नहीं

आज भारत में अंग्रेज़ी को सत्ता, प्रतिष्ठा और उच्च वर्ग की भाषा माना जाता है। अंग्रेज़ी जानना अक्सर योग्यता, आधुनिकता और प्रभाव का प्रतीक समझ लिया जाता है। लेकिन इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिससे बहुत कम लोग परिचित हैं। विडंबना यह है कि जिस अंग्रेज़ी को आज भारत में शासक वर्ग की भाषा माना जाता है, वह स्वयं इंग्लैंड में लंबे समय तक आम जनता की भाषा थी, जबकि शासकों की भाषा फ्रेंच थी।

1066 ईस्वी में नॉर्मन विजय के बाद इंग्लैंड पर नॉर्मन शासकों का अधिकार स्थापित हुआ। ये शासक मूलतः फ्रांसीसी संस्कृति से जुड़े थे। परिणामस्वरूप राज दरबार, प्रशासन, न्यायालय और अभिजात वर्ग में एंग्लो-नॉर्मन फ्रेंच का प्रयोग होने लगा। चर्च और विद्वानों की भाषा लैटिन थी। दूसरी ओर, इंग्लैंड का किसान, मजदूर, कारीगर, व्यापारी और सामान्य नागरिक अंग्रेज़ी बोलता था। इस प्रकार अंग्रेज़ी जनता की भाषा थी, जबकि सत्ता की भाषा फ्रेंच थी।

लगभग तीन शताब्दियों तक यह स्थिति बनी रही। लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में होती है। धीरे-धीरे अंग्रेज़ी साहित्य समृद्ध हुआ। कवियों और लेखकों ने जनता की भाषा को प्रतिष्ठा दी। प्रशासन और न्याय में भी अंग्रेज़ी का प्रवेश शुरू हुआ। अंततः अंग्रेज़ी ने फ्रेंच का स्थान ले लिया और इंग्लैंड की राष्ट्रीय भाषा बन गई। यह परिवर्तन केवल भाषाई नहीं था; यह राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी प्रतीक था।

यह इतिहास भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।

भारत में अंग्रेज़ी जनता की भाषा के रूप में नहीं आई। वह औपनिवेशिक शासन के साथ आई। अंग्रेज़ों ने प्रशासन और शिक्षा में अंग्रेज़ी को इसलिए बढ़ावा दिया कि एक ऐसा वर्ग तैयार हो सके जो शासन चलाने में उनकी सहायता करे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजनीतिक सत्ता तो भारतीयों के हाथ में आ गई, लेकिन अंग्रेज़ी का प्रभुत्व बड़े पैमाने पर बना रहा।

समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया बार-बार कहते थे कि अंग्रेज़ी भारत की मातृभाषा नहीं है। उनका विरोध अंग्रेज़ी सीखने से नहीं था, बल्कि अंग्रेज़ी के प्रभुत्व से था। उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी गहरा होगा जब शासन, न्याय और शिक्षा जनता की भाषाओं में उपलब्ध होंगे। यदि शासन की भाषा और जनता की भाषा अलग-अलग हों, तो लोकतंत्र सीमित वर्ग तक सिमटने का खतरा रहता है।

विश्व का अनुभव भी यही बताता है। फ्रांस ने फ्रेंच में, जर्मनी ने जर्मन में, जापान ने जापानी में, चीन ने चीनी में और रूस ने रूसी में विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा का विकास किया। इन देशों के नागरिक अंग्रेज़ी भी सीखते हैं, लेकिन अपनी भाषा को छोड़कर नहीं।

इंग्लैंड का इतिहास हमें यह सिखाता है कि कोई भी भाषा जन्म से महान नहीं होती। भाषा महान तब बनती है जब राष्ट्र उसे ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, न्याय और शासन की भाषा बना देता है। अंग्रेज़ी स्वयं कभी इंग्लैंड के साधारण लोगों की भाषा थी। वही भाषा बाद में पूरे राष्ट्र की शक्ति बनी।

भारत के सामने भी आज यही चुनौती है। क्या भारतीय भाषाएँ केवल घर-परिवार और भावनाओं की भाषा बनकर रह जाएँगी, या वे विज्ञान, तकनीक, न्याय, प्रशासन और उच्च शिक्षा की भी भाषा बनेंगी? यदि भारत अपनी भाषाओं में ज्ञान का सृजन करेगा, तो वह केवल भाषाई परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आत्मविश्वास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा।

इंग्लैंड ने जनता की भाषा को राष्ट्र की भाषा बनाया। भारत के सामने प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी जनता की भाषाओं को भी वही सम्मान देगा?

(इंजीनियर संतोष यादव, सामाजिक -राजनीतिक कार्यकर्ता, पूर्व प्रदेश सचिव, जेडीयू बिहार)

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