इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?

पिछले दो सालों में शहरों, खासकर दिल्ली को लेकर जितनी बात हुई है उतनी शायद ही कभी हुई हो। दिल्ली विधान सभा चुनाव में तो पर्यावरण एक मुद्दा बन गया और यमुना को साफ करना एक बड़े वायदे में बदल गया। दिल्ली के पर्यावरण को लेकर पंजाब, हरियाणा के किसानों पर कोर्ट के आदेश आये और पराली जलाना एक अपराध घोषित हो गया।

इस अपराध में किसानों को जेल तक भेजा गया और जुर्माने लगाये गये। इस बार किसानों के मुद्दे पर कोर्ट ने नरम रूख अपनाया लेकिन, इस बार दिल्ली के युवाओं और छात्रों, नागरिकों के प्रदर्शन पर पुलिस ने दमन का रूख अपनाया और बहुत से छात्रों और युवाओं को जेल भेज दिया गया। उन पर दायर आरोपों में देशद्रोह की धाराएं भी लगा दी गईं। यह कहा गया कि पर्यावरण के बहाने कोई और राजनीति की जा रही है।

हालांकि, यदि हम दिल्ली से दूर गांव की जमीनों और आदिवासी समुदायों की जमीन का अधिग्रहण किया जाता है, तब कोई और नहीं खुद सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में पर्यावरण की चिंताएं दिखती हैं। विरोध करने वालो किसानों और आदिवासियों पर भी देशद्रोह की धाराओं में आरोपित करने का इतिहास निरन्तरता लिए हुए है।

यह अलग बात है कि पर्यावरण की धाराओं का उलघंन करने के बावजूद आज तक किसी कंपनी के खिलाफ देशद्रोह की धाराएं नहीं लगाई गईं। इसके उलट पर्यावरण की धाराओं को ही हटाने के प्रावधानों पर काम किया गया। मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने तो अपनी पुस्तक ‘बैकस्टेज’ में मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली सरकार की असफलता के पीछे का बड़ा कारण इन ‘पर्यावरण प्रावधानों से न निपट’ पाने को ही मुख्य कारण बताया है।

बहरहाल, यह जो हमारे शहर हैं वे हमारी सभ्यताओं का इतिहास बताते हैं। दुनिया के इतिहास और प्रागैतिहास में जब कृषक आबादियों का घनत्व बढ़ते हुए देखते हैं और उनके रहन-सहन की समानताओं का विकास देखते हैं, तब इस आधार पर यह अनुमान लगाने लगते हैं कि सभ्यता आकार ले रही है। यह सभ्यता कुछ और नहीं शहरों का आगमन है जो कृषक आबादियों के घनत्व को गुणात्मक तौर पर बदल देती हैं।

यह एक नये के समाज का निर्माण करती है जिसमें तकनीक, संगठन, नीति-नियम से लेकर धार्मिक और सामाजिक संरचनाएं जन्म लेती हैं और आवास की भिन्न व्यवस्थाएं सामने आती हैं। यह एक खास तरह का सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पैटर्न बनाता है जिसका असर आम जीवन में दिखता है।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ों में उभरकर आई शहरी सभ्यता का विस्तार हम सिंधु बेसिन से लेकर अरावली और शिवालिक के निचले हिस्सों तक फैला हुआ देखते हैं और इसके असर को हम गंगा के ऊपर हिस्सों में भी देख सकते हैं।

इस शहरी सभ्यता के अंत के साथ हम एक नया उभार गंगा-यमुना के दोआब में मौर्यों के काल में देखते हैं जिसका असर पूरे भारत पर पड़ा। कुषाणों ने इसमें योगदान दिया। गुप्तकाल में इसने फैलते हुए स्थानीय रंग लेना शुरू किया। स्थानीय राज्यों के उभार ने एक नये तरह के शहरों को पैदा किया जिसकी राजनीति, संस्कृति, समाज का अलग-अलग रंग दिखता है। यहां भाषा नया रूप लेते हुए दिखती है और भवन, मंदिर नई शैली में बनते हुए दिखते हैं।

धर्म और साहित्य का नया रूप नये संपद्रायों को पैदा कर रहे थे। भूमि पर उत्पादक समूहों की पूरी संरचना बदल रही थी। आज भी इस दौर के शहरों, धर्म संघों, उनके निर्माणों और भाषा के विकास के चिन्हों को पढ़ा जा सकता है। इस दौर का कोई ऐसा शहर नहीं है जिसकी छाप में उस दौर को पढ़ा न जा सके। मसलन, आप ग्वालियर क्षेत्र में घूमिए, जहां किसी बहुत बड़े सम्राट ने राज नहीं किया था।

लेकिन, यदि आप वहां के मंदिरों का अध्ययन करते हुए पाएगें कि किस तरह से आदिवासी और कृषक समुदायों से जुड़ी मातृसत्तात्मक देवियां सप्तमातृका से बढ़ते हुए ये 64 की संख्या तक पहुंच गईं। यहां के शिल्पकारों ने न सिर्फ अपने नाम के अभिलेख लिखे, अपने परिवार के सदस्यों को देवताओं और राजाओं के साथ खुद को उकेरा।

सल्तनत और मुगलकाल में बहुत से पुराने शहर खत्म होने की ओर बढ़ गये और उतनी ही तेजी से नये शहरों का उद्भव हुआ। खेती और उद्योग की तकनीक में बदलाव के साथ ही नये शहरों की गतिविधियों में भी बदलाव दिखाई दिया। पूर्व-मध्यकालीन संरचनाएं इस नये दौर में संक्रमण के साथ गुजरीं। व्यापार के नये केंद्र बने। इस दौर में न तो सामंतीकरण की प्रक्रिया रुकी और न ही शहरों के नये केंद्रों का विकास रुका।

भाषा और संस्कृति इस दौर में उभरी, नये तरह के धार्मिक, सांस्कृतिक आंदोलन में और भी पुख्ता और स्पष्ट होते गये। मसलन, गुप्तकाल के अंतिम दौर में आया शंकर का अद्वैतवाद कई रूपों को अख्तियार करता हुआ न सिर्फ अपने मठों को मजबूत बनाता गया, इसने धर्म को सैन्यरूप देने के लिए अखाड़ों के निर्माण को और आगे बढ़ाया। अ

कबर और औरंगजेब के समय तक बौद्ध मठों को हम अंत होते हुए देखते है और उसकी जगह नये तरह के मठ उभरकर आते हैं। इनके केंद्र गांव में नहीं शहरों में ही थे। इनमें से बहुत से मठों को राज्य का संरक्षण भी हासिल था।

भारत में 18वीं सदी में यूरोपीय व्यापारियों की काॅलोनियां बननी शुरू होती हैं। ये अब तक पूर्ववर्ती विदेशी बसावटों से एकदम भिन्न थीं। ये पूंजीवादी संरचना में स्थापित हो रही थीं और अपने देश के बदलावों के साथ घनिष्ट तौर पर जुड़ी हुई थीं। ये पूंजीवादी संरचना में जिस तरह के शहर निर्माण में लगे और बाद में इसका विस्तार किया, उसका केंद्र भारत नहीं था। यह उनका एक ‘ट्रांजिट हाउस’ था।

1857 के बाद भी कोलकाता और 1911 में दिल्ली की ओर उनका संक्रमण इसी संकल्पना का हिस्सा था। मुंबई, मद्रास जैसे शहरों का उभार एक शहरी सभ्यता के निर्माण से अलग तात्कालिक हितों को पूरा करने वाले उत्पादक केंद्र ही अधिक थे। प्लेग की महामारी के समय में मुंबई के लोगों के साथ जिस बेरहमी से सरकार पेश आई थी, वह एक सभ्य समाज के ऊपर एक गहरा दाग है।

इसी तरह से, 1930 के दशक में जब मजदूरों का हड़ताल लंबा खिंचा तब वहां के कमिश्नर ने फैक्टरियों को लंबे समय तक बंद करने का आदेश दिया। उसका मानना था कि जिस तरह से सूर्य की रोशनी तेज से होने से बर्फ पिघलकर बहते हुए नीचे की ओर चली जाती है उस तरह से ये मजदूर काम न मिलने पर भूख के मारे गांव की ओर लौट जाएंगे।

अंग्रेजों द्वारा बनाये गये शहरों में उनके लिए आवास और भोजन की समस्या को जानबूझकर बनाकर रखा गया और उनके जीवन परिस्थिति, खासकर पानी, बिजली और दवा जैसी आपूर्ती को कमतर या नहीं के बराबर रखा गया।

अंग्रेजों के समय में गांव का अतिरिक्त सीधे जमींदारों और अंग्रेजी हुकूमत के हाथ में गया और शहर विदेशी जरूरतों के साथ उत्पादन करते रहे हैं। किसी भी देश में सभ्यता के निर्माण में इन दोनों के बीच गहन रिश्ता होना चाहिए। अंग्रेजों ने भारत में किसी सभ्यता का निर्माण नहीं किया बल्कि सभ्यता और इतिहास की परम्परा को तोड़ दिया। इन्होंने एक उपनिवेशिक सभ्यता का निर्माण किया जिनके शहरों को दो भागों में बांट सकते हैं।

पहला, उद्योगिक उत्पादन और प्रशासनिक शहरी केंद्र और दूसरा, अंग्रेजों के सानिध्य और संरक्षण में रहने वाले सामंतों की राजधानियां और शहर। ये ही दो तरह के शहर अंग्रेजों से विरासत में हासिल हुए।

इन्हीं संदर्भों में आज के भारत के शहरों का अध्ययन करना चाहिए और इसे पढ़ा जाना चाहिए। आज के शहर मूलतः प्रशासनिक कार्यवाहियों के साथ विकसित हुए हैं और समय-समय पर विभिन्न परियोजनाओं के तहत इन्हें विकास की गतिविधियों से जोड़ा जाता रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में नियोजन कम और स्वतःस्फूर्तता ज्यादा दिखती है।

मसलन, दिल्ली में औद्योगिक गतिविधियों को योजनाबद्ध तरीके से लागू करने का प्रयास दिखता है, लेकिन इसका पर्यावरण पर क्या असर होगा, इस संदर्भ में अध्ययन उपुयक्त ढंग से नहीं किया गया। 1990 के दशक से ही औद्योगिक बस्तियों को उजाड़ने का कार्य शुरू हो गया। मजदूर बस्तियों पर सरकारी बुलडोजर कभी कोर्ट के आदेश से और कभी निगम और सरकार के आदेश से ढहाये जाने लगे। यह दौर आज भी जारी है।

औद्योगिक इकाईयों को नोएडा, फरीदाबाद, सोनीपत की ओर ले जाया गया। आज उनका असर पूरे दिल्ली एनसीआर को अपनी जद में लिए हुए है। पानी का विशाल दोहन भी एक चुनौती बन गई। नदीयां या तो बेहाल हो गईं या तो साहिबी की तरह खत्म होने को अभिशप्त हो गईं। लाखों गाड़ियों का परिवहन सड़क सुधार के बावजूद रोजमर्रा के जंजाल सा बन गईं।

आज के कुछ शहर विशाल आबादी, उत्पादन की तकनीक और व्यापार, मुद्रा के केंद्र बन गये हैं। लेकिन, इन्हीं शहरों में इस विशाल आकृति के अनुरूप कोई सांस्कृतिक धारा बनकर सामने नहीं आ पा रही है।

दिल्ली के लोगों के लिए वीकेंड पर ले देकर इंडिया गेट का खुला मैदान है जहां आज कई तरह के पाबंदियां समय-समय पर लगा दी जाती हैं। लाल किला और चिड़ियाघर है। चंद लोगों के लिए मंडी हाउस पर नाटक के केंद्र और एक दो पेंटिंग के केंद्र हैं। उससे भी थोड़े से लोगों के लिए हैबिटेट सेंटर है।

बीमार होने पर भीड़ भरे अस्पताल हैं। पढ़ाई के लिए निश्चित ही कई विश्वविद्यालय हैं लेकिन उनकी फीस भरना अब आसान नहीं रहा। आवास के लिए आसमान छूती हुए मंहगे किराये या खरीद के घर हैं। आप सरकार के निर्णय का विरोध करना चाहते हैं तब लगभग 100 मीटर का जंतर-मतर पर स्थित गलियारा है लेकिन, यदि आप छोटे शहरों की तरफ बढ़ें तब वहां यह सब उपलब्ध हो, जरूरी नहीं है।

आप गोरखपुर जैसे महानगर में पार्क की तलाश में काफी मशक्कत करनी पड़ जाएगी। आजमगढ़ शहर में आईए, जहां पार्क की खोज में आप सुबह से शाम कर सकते हैं। इतिहासकार नमित अरोरा ने अपनी पुस्तक ‘इंडियंस’ में बिहार शरीफ के इसी तरह के अनुभव का काफी मार्मिक वर्णन किया है।

गाॅर्डन चाइल्ड एक महान इतिहासकार और पुरातत्वविद रहे हैं। उन्होंने मानव सभ्यता के निर्माण में शहरों के आगमन को एक ‘क्रांति’ कहा था। कार्ल मार्क्स ने पूंजीवादी उत्पादन के उभर रहे नये केंद्रों को नई दुनिया के निर्माण की आधारभूमि कहा था। दोनों ही यह बात शहर और गांव के बीच के रिश्तों में गुणात्मक बदलाव को ध्यान में रखते हुए लिख रहे थे। हमारे शहर हमारे गांव के साथ किन रिश्तों में हैं? हमारे गांव इन शहरों के साथ किन रिश्तों में हैं?

आज यह सच हो चुका है कि हमारे गांव अन्न और सब्जियों के मामले में शहरों को पूर्ण आपूर्ती दे रहे हैं। लेकिन, क्या ये शहर गांव की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं? क्या ये वहां की अतिरिक्त आबादी को रोजगार देने में सक्षम हैं? क्या ये शहर खुद अपनी ही आबादी को, जो उत्पादक आबादी है, उन्हें उनका हिस्सा दे रहे हैं?

आज जब शहरी आबादी के श्रमिक समूहों के लिए चार लेबर कोड लाया जाता है, तब उसके साथ यह जरूर देखना होगा कि इसके बदले में उसे क्या मिल रहा है? इसी तरह से जब आप कर अदा करते हैं तब यह जरूर जानना होगा कि इस अदायगी का क्या हुआ? यह किसी भी शहरी सभ्यता के निर्माण का जरूरी हिस्सा है।

शहर के नागरिक जीवन का आधार उसके सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और उसका निर्माण है। इसके लिए न सिर्फ सरकारी संस्थाएं होती हैं, गैर सरकारी संस्थाएं भी काम करती हैं। नागरिकों की पहलकदमी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। अभी दो दिन पहले संसद में यमुना की स्थिति के बारे में बताया गया जिससे साफ दिख रहा है कि इस नदी को साफ करने की दिशा में कोई खास कदम उठाया ही नहीं गया।

शहर और इसके उद्योगों को कचरे का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सीधे नदी में गिर रहा है। पानी की सफाई के यंत्र जितने बनने थे, बने ही नहीं हैं। लेकिन, नई सरकार जिस तरह से यमुना की सफाई का दावा कर रही थी, उससे तो यही लग रहा था कि थोड़ी सी कसर रह गई है। एक नदी की सफाई की हकीकत और दावे में सरकार के स्तर पर दिखने वाला यह फर्क हमें कई और जगहों पर दिखता है।

हमारे देश में शहरों का इतिहास उसके निर्माण की आधारभूमि में पढ़ा जाना चाहिए। दिल्ली इससे अलहदा नहीं है। इस शहर में रहते हुए इसका इतिहास जरूर पढ़ा जाना चाहिए और इसकी तामीर में हिस्सेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। अब तक के शासक वर्गों ने इस अपने तरीकों से बनाया जिसके अवशेष हमारे सामने है। इसे नया रूप भी दिया जा सकता है यदि हम खुद भी पहल करें और शहर को एक नई सभ्यता के वाहक में बदल दें।

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