श्रीलंका में वामपंथी लोकतांत्रिक ताकतों की अभूतपूर्व जीत से क्या भारत समेत दक्षिण एशिया के अन्य देश सीख लेंगे?

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यह सचमुच अविश्वसनीय लगता है कि श्रीलंका में जिस पार्टी ने पिछले चुनाव में केवल 3 सीटें पाई थी, उसने न सिर्फ राष्ट्रपति का चुनाव जीत लिया, बल्कि संसद में भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर हुए चुनाव में दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर लिया।

यह 1948 में देश को मिली आजादी के बाद से किसी दल को मिला सबसे प्रचंड बहुमत है। नेशनल पीपुल्स पावर (NPP) ने 61.6% मत के साथ संसद की 225 में से 159 सीटें जीत लीं।

दरअसल यह चमत्कार जिस राजनीतिक पार्टी नेशनल पीपुल्स पावर (NPP) ने किया है, उसके कोर में तो मार्क्सवादी पार्टी JVP है, लेकिन वह तमाम छोटे दलों, जनसंगठनों, सामाजिक संगठनों और आंदोलनों का साझा मंच है।

NPP की स्थापना 2019 में हुई थी, लेकिन इसका उभार पिछले दिनों घनघोर आर्थिक संकट, सत्ताधारियों के चरम भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ श्रीलंका में हुए जनविद्रोह के गर्भ से हुआ था, जब महीनों तक जनता को खाने पीने के सामानों, दवाओं,अन्य जरूरी चीजों के लिए भारी किल्लत झेलनी पड़ी थी।

महंगाई चरम पर थी और जनता पर टैक्स का भारी बोझ बढ़ गया था। जनाक्रोश कितना जबरदस्त था, इसको इसी बात से समझा जा सकता है कि जनता तब राष्ट्रपति भवन में घुस गई थी और राष्ट्रपति राजपक्षे को देश छोड़कर भागना पड़ा था।

NPP के नेता अनुरा दिसानायके सितंबर में राष्ट्रपति चुने गए थे। लेकिन पहले राउंड में उन्हें 42% मत ही मिला था, दूसरे वरीयता के वोट से वह विजयी हुए थे। संसदीय चुनाव में NPP की जीत व्यापक जीत है। दरअसल परम्परागत राजनीतिक दलों और चेहरों से ऊबी हुई जनता ने जैसे मन बना लिया था कि अब बहुत हो चुका।

केवल बट्टीकलोवा को छोड़कर उसे 22 में से 21 इलेक्टोरल जनपदों में जीत मिली है। राजपक्षे की पार्टी का सफाया हो गया, उसे मात्र दो सीटें मिलीं। तमिल बहुल आबादी वाले जाफना और वानी जिले में भी तमिल पार्टियों को हराकर NPP जीतने में सफल हुई।

ठीक इसी तरह मुस्लिम बहुल अमरा और त्रिंकोमाली जिलों में भी वह जीतने में कामयाब रही। दक्षिणी जिलों के साथ-साथ केंद्रीय अंचल के तमिल प्लांटेशन मजदूरों के बीच भी उसे व्यापक समर्थन हासिल हुआ।

दरअसल 2022 के जनविद्रोह में अपने ताकतवर हस्तक्षेप से NPP अपनी यह छवि बनाने में सफल हुई की जनता के आर्थिक अधिकारों, आजीविका तथा राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली वह सबसे सशक्त और इकलौती ताकत है।

संसद के चुनाव जीतना राष्ट्रपति दिसानायके के लिए बेहद जरूरी था क्योंकि इसके बिना वह अपनी वैकल्पिक नीतियों को न लागू कर सकते थे, न राजनीतिक सुधार के लिए आवश्यक कदम उठा सकते थे। वे पंगु होकर रह जाते। इसलिए राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने संसद भंग करके नए चुनाव का ऐलान कर दिया।

प्रचंड बहुमत के साथ उनकी सरकार बन गई है। अमरसूर्या के नेतृत्व में 21 सदस्यीय मंत्रिमंडल बन गया है। चुनाव से पूर्व तक राष्ट्रपति दिसानायके ने अपनी सर्वांगीण नीतियों की घोषणा नहीं किया था।

लेकिन अब वे ऐसा कर सकते हैं। एक समय उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति के पास जो असीमित अधिकार हैं, वह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। अब देखना होगा कि राजनीतिक सुधारों के अपने वायदे के अनुरूप वह इसमें किस तरह का बदलाव करते हैं।

जाहिर है सबसे बड़ी चुनौती जबरदस्त महंगाई और जीवन स्तर में गिरावट से जूझ रही आम जनता को राहत देने की है।

इसमें एक बड़ी बाधा IMF से पिछले दिनों श्रीलंका ने जो 2.9 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया है, उसके कारण सरकार पर लदी हुई तमाम शर्तें हैं, मसलन यह कि सरकार जनता के ऊपर किया जाने वाला खर्च कम करेगी, जनता पर austerity measures थोपेगी।

जबरदस्त महंगाई और बेकारी से जूझ रही जनता को राहत देने के लिए सरकार को इन शर्तों से अपने को मुक्त करना होगा। राष्ट्रपति दिसानायके ने वायदा किया था कि वे IMF से कर्ज की शर्तों पर फिर से बातचीत करेंगे।

जाहिर है इसके लिए वैश्विक वित्तीय पूंजी नई सरकार पर उन शर्तों को मानने का दबाव बनाएगी, जिसका सरकार को मुकाबला करना होगा। नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने देश को जिस अंधी गली में फंसा दिया है, वहां से निकालने के लिए विकास का वैकल्पिक जनपक्षीय रास्ता तलाशना होगा।

अब तक सत्तारूढ़ रहा वहां का अभिजात्य शासक वर्ग जिस चरम भ्रष्टाचार में डूब गया था, उससे देश को उबारना होगा। Super rich तबकों द्वारा चुराई गई राष्ट्रीय सम्पदा को जब्त करना होगा। लोकतांत्रिक अधिकारों तथा नागरिक स्वतंत्रताओं को बहाल करना होगा।

सबसे बड़ी बात यह कि धार्मिक व उपराष्ट्रीय समुदायों के एथनिक संघर्षों से श्रीलंका को लंबे समय तक जूझना पड़ा। 1983 से 2009 तक चले गृहयुद्ध में एक लाख के आसपास लोग मारे गए थे।

संतोष की बात है कि इस बार देश में जनता के सभी तबकों ने, तमिलों और मुसलमानों ने भी NPP को समर्थन दिया है। नई सरकार को आश्वस्त करना होगा कि उनके नागरिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। सत्ता के तमाम स्तरों पर उनकी भागेदारी को सुनिश्चित करना होगा।

नई सरकार को आज की भू-राजनीतिक परिस्थिति की जटिलताओं के अनुरूप, जहां भारत जैसा विशाल देश उसका पड़ोसी है, अपनी समुचित विदेश नीति भी तय करना होगा।

JVP के महासचिव ने NPP की जीत को देश की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ करार दिया है। “पुरानी विशेषाधिकार संपन्न, पारिवारिक नियंत्रण वाली, अभिजात्य के प्रभुत्व वाली राजनीति जो जनता के धन पर निर्भर थी, उसका अंत हो गया है।

76 साल से देश की बागडोर जिन पार्टियों के हाथ में थी, जनता ने उन्हें शिकस्त दिया है। उन्होंने कहा कि जनता को हमारे खिलाफ भड़काने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं। उत्तरी पूर्वी जिलों में भी हमें शानदार जीत मिली है। बागानों वाले इलाके में तमिल मजदूरों के बीच भी हमें भारी समर्थन मिला है।

हमारे खिलाफ कहा गया कि अगर वे जीत गए तो धर्म मानने की इजाजत नहीं देंगे, तुम्हारी दो कारों में से एक ले जायेंगे, देश की शांति भंग हो जाएगी, रूपये का अवमूल्यन हो जाएगा, देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, खून खराबा होगा। लेकिन लोग समझ गए कि यह सब झूठ है।

परिणामस्वरूप संसद के चुनाव में हमारा वोट राष्ट्रपति चुनाव से भी बढ़ गया और विरोधियों के वोट में पहले की तुलना में भारी गिरावट हो गई।

उत्तरी पूर्वी जिलों की जनता ने ऐसे नेता पर भरोसा किया जो दूसरे इलाके से आता है। 80% सरकारी कर्मचारियों का भी हमें समर्थन हासिल हुआ। उन्होंने वायदा किया कि जनाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता का इस्तेमाल किया जाएगा।

लाख टके का सवाल यह है कि अपने पड़ोसी देश में हुए इस अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम से दक्षिण एशिया के अन्य देशों की जनता क्या सीख लेगी?

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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