यूँ तो चुनाव तो पांच राज्यों में हो रहे हैं लेकिन चर्चा में बंगाल कुछ ज्यादा ही है। यह चर्चा सिर्फ इसलिए कि बंगाल में क्या टीएमसी जीत का चौका मारने के लिए तैयार है या फिर बीजेपी इस बार ममता बनर्जी को बेदखल कर देगी। इस बात में कोई शक नहीं कि ममता आज भी बंगाल में चुनावी पार्टियों के बीच सबसे मजबूत और लोगों की पसंद वाली पार्टी है लेकिन बीजेपी जिस अंदाज में लगातार विस्तार करती जा रही है और बंगाल के भद्र लोगों के बीच उसकी पहुँच बढ़ती जा रही है, ऐसे में किसी उलटफेर की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता।
अगर चुनाव संभावनाओं का खेल है तो यह मान लेना चाहिए कि इस बार के चुनाव में कुछ भी संभव है। बीजेपी का चुनावी तंत्र और चुनाव आयोग का खेल सफल हुआ तो बंगाल के चुनावी परिणाम कुछ भी हो सकते हैं।
बंगाल का असली खेल इस बार राज्य के भूगोल में छुपा हुआ है। हर क्षेत्र की अपनी कहानी है और अपने दर्द और मुद्दे भी। फिर सामाजिक समीकरण तो हैं ही। ऐसे में इस बार का चुनाव सामाजिक समीकरणों, क्षेत्रीय असमानताओं और राजनीतिक पुनर्संतुलन की परीक्षा बनता दिख रहा है। इसी खेल में ममता की अपनी धमक और धौंस है तो बीजेपी की तैयारी भी कम नहीं दिख रही।
बिहार चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी को मजबूती मिली है और उसे लगने लगा है कि थोड़ा ज़ोर लगाया और रणनीति सही रही तो बंगाल में उसकी सरकार बन सकती है और एक बार सरकार बन गई तो आगे की कहानी खुद ही बन जाएगी। ममता बीजेपी के इस खेल को समझ रही है। अब मैदान में जब दो धुरंधर आमने-सामने हों बाजी की निर्णायक जनता बन जाती है। यही वजह है कि टीएमसी और बीजेपी वाले जनता के साथ हर मनुहारी की कोशिश भी लगे हैं।
चुनाव में कांग्रेस और वाम दल भी अपनी ताकत के साथ मैदान में हैं। पिछले चुनाव में इनकी करारी हार हुई थी। इस बार क्या होगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन सच तो यही है कि कांग्रेस और वाम दल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
क्षेत्रवार बात करें तो उत्तर बंगाल बीजेपी का गढ़ माना जाता रहा है। यही वह इलाका है जहाँ से बीजेपी को काफी सीटें मिलती रही है और यही वजह है कि इस इलाके को अलग करके बीजेपी बिहार के कुछ इलाकों के साथ एक छोटा राज्य बनाने की बात करती रही है ताकि इस इलाके की पूरी राजनीति पर उसका कब्जा हो जाए। इस इलाके में दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, मालदा और दिनाजपुर आते हैं। पिछले चुनाव में बीजेपी ने यहाँ से बड़ी जीत हासिल की थी और खासकर कूचबिहार और अलीपुरद्वार में बीजेपी ने एकतरफा जीत हासिल की थी। लेकिन क्या इस बार भी ऐसा संभव है?
टीएमसी की पूरी नजर इसी इलाके पर लगी हुई है। ममता हर हाल में इस इलाके में बीजेपी को ख़त्म करने को तैयार है ताकि उसकी आगे की रणनीति ही ख़त्म हो जाए। चूँकि यह गोरखा बहुल इलाका है और यहाँ की अपनी राजनीति है। इसलिए ममता बनर्जी ने एक सधी चाल के साथ यहाँ के राजबोंग्सी समुदाय के साथ गठजोड़ किया है। इस इलाके में यह समुदाय काफी मजबूत है और इस समुदाय को किंगमेकर भी इस इलाके में कहा जाता है।
जानकार मान रहे हैं कि अनुसूचित जाति का यह समुदाय वाकई में ममता के साथ खड़ा हो गया तो बीजेपी का गढ़ ध्वस्त हो सकता है और ऐसा हुआ तो फिर बीजेपी को काफी मुश्किलें हो सकती है। लेकिन यह सब संभावनाओं का खेल है। उधर चाय बगान इलाकों में भी बीजेपी की पकड़ अब पहले जैसी नहीं रही। बीजेपी यहाँ फिर से मजबूत होने की कोशिश जरूर कर रही है लेकिन टीएमसी यहाँ भी दांव खेल रही है। अगर ममता का दांव चल गया तो बीजेपी की परेशानी यहाँ भी बढ़ सकती है।
बंगाल का एक बड़ा क्षेत्र जंगलमहल का है। यह आदिवासी इलाका है और यहाँ की राजनीति कुछ ढंग की है। इस इलाके में बीजेपी की बढ़त रही है लेकिन पिछले चुनाव में टीएमसी ने बीजेपी के उभार को यहाँ रोक दिया था और बीजेपी से कई सीटें झटक ली थी। पुरुलिया, बांकुरा, पश्चिम मेदनीपुर और झारग्राम का यह इलाका जंगलमहल के नाम से जाना जाता है। इस बार टीएमसी आदिवासी समाज को एक साथ रहने के लिए हेमंत सोरेन को भी मैदान में उतार रही है।
लेकिन चूँकि इन इलाकों में संघ की मजबूत पकड़ है, ऐसे में जंगलमहल के इलाके में सत्ता की लड़ाई इस बार दिलचस्प होने की सम्भावना है। अगर इस इलाके में बीजेपी कुछ बेहतर कह जाती है तो ममता की मुश्किलें बढ़ सकती है और टीएमसी ने बीजेपी को मात दी तो बीजेपी के मनसूबे ख़राब हो सकते हैं। याद रहे जंगलमहल में कुर्मी जाति की आबादी कोई 50 लाख से ज्यादा बताई जाती है और अब यह समुदाय एसटी का दर्जा मांग रहा है। जो भी दल इनकी मांग के करीब पहुंचेगा उसे लाभ मिलना तय है।
उधर, नदिया और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय ने 2019 के बाद भाजपा का खुलकर समर्थन किया था, खासकर नागरिकता संशोधन कानून के कारण। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। मतुआ वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटने के आरोपों ने असंतोष पैदा किया है। टीएमसी इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा के भीतर मतुआ नेतृत्व में दरारें भी सामने आई हैं।
मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना समेत कई जिलों में मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2021 में इन इलाकों में टीएमसी ने लगभग एकतरफा जीत दर्ज की थी। लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। एसआईआर को लेकर टीएमसी ने आक्रामक रुख अपनाया है और इसे भाजपा व चुनाव आयोग की साजिश बताया है। दूसरी ओर ओवैसी की पार्टी और आईएसएफ के साथ ही अन्य छोटे दलों की मौजूदगी मुस्लिम वोटों के बंटवारे का कारण बन सकती है।
और ऐसा हुआ तो इसका लाभ बीजेपी को मिल सकता है।
उधर, कोलकाता और हावड़ा के आसपास के शहरी क्षेत्र, दक्षिण बंगाल और ‘रार बंगला’ (पूर्व व पश्चिम बर्धमान, बीरभूम, हुगली) टीएमसी के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते हैं। 2021 में यहां टीएमसी ने 140 में से 100 से ज्यादा सीटें जीती थीं। भाजपा इस बार इन इलाकों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। गैर-बांग्लाभाषी मतदाताओं तक पहुंच, महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे और बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित अत्याचार जैसे विषयों को चुनावी नैरेटिव में शामिल किया जा रहा है।
बीजेपी ने इन इलाकों में मजबूत पकड़ बना ली है और इस बार यही वह इलाका है जहाँ बड़ी लड़ाई होने की सम्भावना है। इस इलाके में अगर बीजेपी ने टीएमसी को धक्का दिया तो खेल ख़राब होगा और बीजेपी का रास्ता साफ़ हो सकता है।
बंगाल का यह चुनाव एक ‘यूनिफॉर्म स्विंग’ का चुनाव नहीं है। हर क्षेत्र अपनी अलग कहानी कह रहा है—कहीं जातीय समीकरण हावी हैं, कहीं धार्मिक, तो कहीं स्थानीय मुद्दे। टीएमसी के पास सत्ता, संगठन और नेतृत्व का लाभ है, लेकिन भाजपा की आक्रामक रणनीति मुकाबले को कड़ा बना रही है। वहीं, अगर विपक्षी वोट बंटते हैं, तो इसका सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिल सकता है।
(अखिलेश अखिल पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)