निजीकरण का दुष्प्रभाव है अडानी ग्रुप का लखनऊ एयरपोर्ट पर चार्ज बढ़ाना

मोदी सरकार के हर निर्णय में जनता को ठग कर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की नीयत छिपी होती है। मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता फकीर प्रधानमंत्री के सबसे घनिष्ठ अमीर मित्र अडानी और अंबानी को लाभ पहुंचाना होता है। गौतम अडानी देश के ऐसे उद्योगपति बनकर उभरे हैं जो लगातार प्रधानमंत्री से निजी संबंधों का फायदा उठा रहे हैं। 2014 और 2019 के आम चुनाव में अडानी ने जितना मोदी के लिए तामझाम किया उससे कहीं गुना वह सरकार से वसूल रहे हैं। मोदी भी हैं कि देश के संसाधनों को अडानी पर ऐसे लूटा रहे हैं कि जैसे वे उनके निजी हों। नये कृषि कानूनों के माध्यम से देश की खेती को कब्जाने में लगे अडानी ग्रुप ने अब एयरपोर्टों पर भी लूटखसोट का खेल शुरू कर दिया है। वह भी तब जब कोरोना कहर के चलते देश में काम धंधे पूरी तरह से चौपट हो चुके हैं। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। यह लूटखसोट अडानी ग्रुप ने रामराज वाले प्रदेश उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू की है। भले ही लोग कारोना के कहर के साये में जी रहे हों पर अडानी ग्रुप ने लखनऊ एयरपोर्ट पर 10 गुना तक चार्ज बढ़ाकर अपनी नीयत को दर्शा दिया है। इतना ही नहीं अडानी ग्रुप अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले देश के अन्य सभी एयरपोर्टों पर चार्ज बढ़ाने जा रहा है। अब देखना देश के उद्धारक प्रधानमंत्री हर बार की तरह चुप्पी साध लेंगे।


दरअसल अडाणी समूह की अडाणी इंटरप्राइजेज एयरपोर्ट को मैनेज करने का काम करती है। वह एयरपोर्ट अथॉरिटी को लखनऊ के लिए प्रति यात्री 171 रुपए का पेमेंट करती है। अहमदाबाद के लिए 177 और जयपुर के लिए 174 रुपए का पेमेंट किया जाता है। लखनऊ में सालाना 55 लाख यात्री एयरपोर्ट पर आते और जाते हैं। मतलब सालाना 94 करोड़ रुपए एयरपोर्ट अथॉरिटी को अडाणी की ओर से मिलते हैं। लखनऊ एयरपोर्ट का फायदा अडाणी से पहले सालाना 79 करोड़ रुपए था। निजीकरण की जमीनी हकीकत यह है कि सरकारें निजी कंपनी को ठेका देकर एक मुश्त रकम बांध लेती हैं। वह रकम उसके होने वाले फायदे से ज्यादा होती है। सरकारों के इस खेल का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है। निजी कंपनी फायदा लेने के चक्कर में जहां अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण करती हैं वहीं जनता पर दूसरे बोझ लाद देती हैं। वैसे तो निजीकरण का काम काफी समय से चल रहा है पर मोदी सरकार के साथ ही भाजपा शासित प्रदेशों में अब निजीकरण का काम बहुत तेजी से चल रहा है। यहां तक देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाले रेलवे का भी बड़े स्तर पर निजीकरण हो रहा है। इसमें भी अडानी ग्रुप सक्रिय भूमिका निभा रहा है।


उदाहरण के तौर पर नोएडा प्राधिकरण ने घरों से कूड़ा उठाने का ठेका आजकल एक निजी कंपनी को दिया हुआ है। यह कंपनी जहां कूड़े से मोटी कमाई कर रही है वहीं नोएडा के हर सेक्टर में हर घर से फ्लोर वाइज उगाही भी कर रही है। मतलब यह कंपनी नोएडा प्राधिकरण को प्रति माह या प्रति वर्ष एक मोटी रकम देती होगी और प्राधिकरण ने इस कंपनी को लोगों से खुली लूट की छूट दे रखी है। मोदी सरकार ने देश में ऐसी व्यवस्था कर दी है कि यदि निजीकरण पर अंकुश न लगा तो महानगरों व शहरों में अब आम आदमी का रहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा। यही निजीकरण जब गांवों में पहुंचेगा तो समझिये गांवों, खेत-खलियान के नाम से जाने जाने वाले कृषि प्रधान इस देश का ये लोग क्या स्वरूप बना देंगे।


गौतम अडानी ने प्रधानमंत्री से अपने निजी संबंधों का इस्तेमाल करते हुए वर्ष 2019 में देश के 06 एयरपोर्ट के संचालन का टेंडर हासिल कर लिया था, वह भी 50 साल तक के लिए। लखनऊ के अलावा जयपुर, अहमदाबाद, गुवाहाटी, मैंगलोर और तिरुवनंतपुरम आदि हवाई अड्डों के संचालन और प्रबंधन का ठेका अडानी ग्रुप के पास सुरक्षित है। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए लिखा है कि ‘जब मोदी सरकार ने अडानी को नियमों का उल्लंघन करते हुए 06 हवाई अड्डो का नियंत्रण दे दिया तो वह हवाई अड्डों पर शुल्क में 10 गुना तक बढ़ोतरी करने लगें।


दरअसल एयरपोर्ट प्राइवेटाइजेशन के बाद से लगातार एयरपोर्ट चार्ज बढ़ते रहते हैं और इसका एयरलाइंस कंपनियां विरोध भी करती रहती हैं। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन एंड फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस ने दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू और हैदराबाद में इस तरह के भारी-भरकम चार्ज का विरोध भी किया था। साल 2018 में सरकार ने बिडिंग नियमों में कुछ बदलाव भी किया था। इसमें रेवेन्यू के बंटवारे को लेकर बदलाव यह किया गया कि यह हर पैसेंजर के रेवेन्यू मॉडल पर तय हो। दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल पर दिए गए हैं।

This post was last modified on June 2, 2021 9:42 pm

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