लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तहसीलदार के वसूली नोटिस को ठहराया अवैध!

लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लखनऊ में तहसीलदार की वसूली नोटिस को अवैधानिक ठहरा दिया है। कोर्ट ने सरकार के वकील से पूछा था कि आखिर किस कानून के तहत यह वसूली नोटिस जारी की गयी थी। जिसका जवाब देते हुए सरकारी वकील ने 17 फरवरी, 2020 के लखनऊ सिटी, ईस्ट के एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के आर्डर का हवाला दिया था। बाद में जब यह पता चला कि उस आदेश को भी पूर्व आईजी एस आर दारापुरी ने कोर्ट में चुनौती दे रखी है तो कोर्ट ने मामले को खारिज कर दिया। और उसी कोर्ट में सुनवाई के लिए ले जाने की छूट दे दी जहां इसकी पहले से सुनवाई हो रही है।

पूरा मामला यह है कि एस आर दारापुरी को लखनऊ में  19 दिसंबर, 2019 को हुए सीएए विरोधी प्रदर्शन के मामले में दिनांक 18, जून, 2020 को तहसीलदार सदर का राजस्व संहिता, 2006 की धारा 143(3) के अंतर्गत रुo 64,37,637 का दूसरे कई लोगों के साथ वसूली का नोटिस मिला था जिसमें कहा गया था कि यदि उन्होंने 7 दिन के अन्दर उक्त धनराशि जमा नहीं की तो उनके विरुद्ध गिरफ्तारी, संपत्ति कुर्की एवं नीलामी की कार्रवाई की जाएगी।

इस पर दारापुरी ने तहसीलदार को उत्तर दिया था कि वर्तमान में उनकी वसूली पर रोक सम्बन्धी याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट में विचाराधीन है और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोरोना संकट के दौरान सभी प्रकार की वसूली/कुर्की पर 10 जुलाई तक रोक लगा रखी है जो अब 31 जुलाई तक बढ़ गयी है। परन्तु इसके बाद भी 7 दिन के बाद तहसीलदार तथा एसडीएम सदर उनके घर पर आ कर उनके परिजनों को गिरफ्तार करने तथा उनके घर को सील/कुर्क करने की धमकी देते रहे। दारापुरी का कहना है कि उनकी पत्नी काफी लम्बे समय से लीवर, हृदयघात तथा शुगर की मरीज़ है जिसकी हालत अति नाज़ुक है तथा डाक्टरों ने उनको पूरी तरह से बेड रेस्ट दे रखा है परन्तु यह सब बताने के बावजूद भी तहसील के अधिकारी घर आ कर बराबर घुड़की धमकी देते रहे जिससे उनकी हालत में और भी गिरावट आई है। 

 दारापुरी ने बताया कि तहसील के अधिकारियों की उपरोक्त उत्पीड़न की कार्रवाई को देखते हुए उन्होंने तहसीलदार के उपरोक्त नोटिस को दिनांक 5/7 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दे दी कि उक्त नोटिस ही अवैधानिक है क्योंकि राजस्व संहिता की जिस धारा 143(3) के अंतर्गत उक्त वसूली नोटिस दिया गया है, राजस्व संहिता में वह धारा ही नहीं है। यह नोटिस जिस प्रपत्र 36 में दी गयी है उसमें 15 दिन का समय है जिसे मनमाने ढंग से 7 दिन कर दिया गया। उनकी इस याचिका की पहली सुनवाई 10 जुलाई, 2020 को हुई थी जिसमें कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि वह बताये कि घटना के समय कोई ऐसा कानून था जिसके अंतर्गत ऐसी वसूली की कार्रवाही की जा सकती है।

निस्संदेह उक्त तिथि में ऐसा कोई कानून अस्तित्व में नहीं था, केवल मायावती के शासनकाल का एक अवैधानिक शासनादेश है जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। इस मामले की अगली सुनवाई 14/7 पर कोर्ट ने वसूली नोटिस को अवैधानिक बताते हुए यह आदेश दिया कि क्योंकि उक्त वसूली नोटिस एडीएम नगर, लखनऊ के मुख्य आदेश दिनांकित 17/2/2020 के अनुक्रम में है, जिसे प्रार्थी द्वारा याचिका संख्या 7899/2020 द्वारा डिवीज़न बेंच में चुनौती दी गयी है, अतः इस मामले को भी वहीं पर उठाया जाये। अब इस मामले की सुनवाई 17/7 को निश्चित है। 

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इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि राजस्व संहिता की धारा 171(ए) में स्पष्ट कहा गया है कि 65 वर्ष की आयु वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है लेकिन उन्हें आज भी इसकी धमकी दी जा रही है। इसके साथ ही राजस्व संहिता की धारा 177 में स्पष्ट प्रावधान है कि वसूली हेतु किसी बकायेदार का रिहायशी घर कुर्क नहीं किया जा सकता। परन्तु इसके बावजूद उनका घर कुर्क करने की बराबर धमकी दी जा रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि उनके विरुद्ध लगाये गए फर्जी मुकदमे में अभी तक किसी भी अदालत में दोष सिद्ध नहीं हुआ है बल्कि अभी तो मुकदमे की सुनवाई भी शुरू नहीं हुयी है लेकिन फिर भी उनके विरुद्ध उत्पीड़न की उक्त कार्रवाही की जा रही है। इसी तरह की अवैधानिक कार्रवाई अन्य कई व्यक्तियों के खिलाफ भी की गयी है और एक रिक्शा चालक को जेल में निरुद्ध किया गया है। 

उन्होंने कहा कि इस बात से बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि उनके विरुद्ध वसूली की उपरोक्त कार्यवाही पूर्णतया अवैधानिक है तथा यह उनके राजनीतिक उत्पीड़न करने के इरादे से की जा रही है।

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