Tuesday, May 30, 2023

सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था में अम्बेडकर और दलित राजनीति

डॉ. भीमराव अम्बेडकर असमानता, दासता, अन्याय, जातीय और धार्मिक उत्पीड़न जैसी सामाजिक विसंगतियों के मुखर विरोधी रहे क्योंकि इन सामाजिक विसंगतियों से उपजी पीड़ाओं को उन्होंने ख़ुद भोगा था। इसीलिए उन्होंने इन सामाजिक विसंगतियों के ख़िलाफ़ आजीवन संघर्ष भी किया। संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में समानता, स्वतंत्रता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता और बंधुता जैसे शब्दों को शामिल किया। हालांकि इन अच्छे लगने वाले शब्दों का वर्ग-विभक्त समाज में कोई बहुत ज़्यादा मूल्य नहीं होता क्योंकि वर्ग-विभक्त व्यवस्था में शासकवर्ग द्वारा ऐसे शब्दों का इस्तेमाल वास्तविक स्थिति पर पर्दा डालने और दलित-शोषित श्रमिकवर्ग को धोखा देने के लिए ही किया जाता रहा है। आज़ादी के बाद, पिछले 70 वर्षों का अनुभव इसी तथ्य को सिद्ध करता है।

दरअसल, अम्बेडकर सैद्धांतिक तौर पर व्यक्ति की स्वतंत्रता के हामी रहे जबकि मार्क्स वर्गों की स्वतंत्रता के। मार्क्स ने वर्गों के उन्मूलन में ही व्यक्ति और समाज की स्वतंत्रता को देखा और समझा क्योंकि वर्ग समाज में व्यक्ति तो स्वतंत्र होता है लेकिन वर्ग और समूह स्वतंत्र नहीं होते। लेकिन चंद व्यक्तियों की यही स्वतंत्रता शेष श्रमजीवी वर्ग की परतंत्रता का आधार बन जाती है। इसके विपरीत, वर्गों की स्वतंत्रता में निहित स्वतंत्रता के व्यापक अर्थ होते हैं क्योंकि वर्गों की स्वतंत्रता में स्वयं व्यक्ति भी स्वतंत्र होते हैं क्योंकि व्यक्ति भी स्वतंत्र हुए वर्ग की ही इकाई होता है।

इस मायने में, परंपरागत और निम्न पूंजीवादी विचारकों की ही तरह, अम्बेडकर समाज में वर्ग हैं और वर्गसंघर्ष है, इस धारणा को तो मानते हैं, लेकिन लेकिन इस वर्ग-संघर्ष को किसी अंतिम लक्ष्य तक ले जाने के कतई हामी नहीं मालूम पड़ते। इसीलिए किसी भी लक्ष्यहीन सामाजिक विचारदर्शन और संघर्ष की आत्यंतिक परिणीति यह होती है कि वह एक निश्चित बिंदु पर पहुंचकर बिखर जाता है। ऐसा ही हुआ है।

दरअसल, डॉ. अम्बेडकर ने आजीवन सत्ता परिवर्तन की राजनीति की। अन्य पूंजीवादी विचारकों की ही तरह वे व्यवस्था परिवर्तन की क्रांतिकारी राजनीति में कभी भी उत्सुक नहीं थे। वे मूलतः एक सुधारवादी नेता थे। उनका मनना था कि ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के माध्यम से वे सत्ता परिवर्तन करके इस देश के शासक बन जाएंगे। लेकिन वे शायद यह भी जानते थे कि इस ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी व्यवस्था में ऐसा होना कतई सम्भव नहीं। उन्होंने संभवतः पूंजीवाद और समाजवाद के बीच किसी तीसरी विचारधारा की कल्पना की। लेकिन वह यह बता पाने में असफ़ल रहे कि उस तीसरी विचारधारा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक आधार क्या है?

अम्बेडकर सामाजिक चिंतन में विचारों की अस्पष्टता और उनके द्वारा किये गए संघर्षों में लक्ष्यहीनता साफ़तौर पर नज़र आती है। इसी सैद्धांतिक अस्पष्टता और लक्ष्यहीनता के कारण वे दलित-मुक्ति की आकांक्षा लिए व्यवस्था के साथ विरोध और सहयोग के बीच झूला झूलते रहे। लेकिन फिर भी उनकी तीसरी विचारधारा, जो कि अवसरवाद, राजनीतिक लेनदेन, समझौता-परस्ती और राजनीतिक सौदेबाज़ी पर आधारित थी, की एक झलक उनके इस कथन में अभिव्यक्त होती है, “हमको एक तीसरी पार्टी के रूप में संगठित हो जाना चाहिए, ताकि अगर कांग्रेस के पास अबाधित रूप से बहुमत न हो, और सोशलिस्टों के पास भी उसी तरह बहुमत न हो, तो उन दोनों को चुनाव के समय हमसे वोटों की भीख मांगनी पड़े। तब हम दोनों पार्टियों के बीच शक्ति संतुलन का काम कर सकते हैं, और अपनी राजनीतिक सहायता के लिए उनके आगे अपनी शर्तें पेश कर सकते हैं।” (बाबा साहेब के पंद्रह व्याख्यान, पृष्ठ 80)

उनके द्वारा दिया गया यह अनोखा सूत्र आज दलित राजनीति का आदर्श वाक्य बन चुका है। बाद में अपनी समझौतापरस्त, मौक़ापरस्त और अवसरवादी राजनीति पर सफ़ाई देते हुए उन्होंने दलितों का आह्वान करते हुए कहा, “इसीलिए हमने मेलजोल की नीति अपनाई, और उसके फलस्वरूप एक बड़ी हद तक हमने सफ़लता भी प्राप्त कर ली। यह ठीक है कि जो कुछ हम चाहते थे, वह सब हमें नहीं मिला, लेकिन तब भी हमें बहुत कुछ मिल गया है। हमने विधान सभाओं और सरकारी नौकरियों में सुरक्षित स्थान प्राप्त कर लिए हैं, और हमारी दूसरी बहुत सी मांगें मंजूर कर ली गई हैं। पृथक प्रतिनिधित्व और पृथक चुनाव की हमारी मांग नहीं मानी गई; लेकिन इसके लिए हमें शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि दूसरे अल्पमतों को भी इस मामले में सफ़लता नहीं मिली। यह मौक़ा कांग्रेस के साथ संघर्ष करने का नहीं है। मेल-मिलाप की नीति से ही जितना भी अधिक-से-अधिक हम प्राप्त कर सकते हैं हमें प्राप्त कर लेना चाहिए।” (बाबा साहेब के पंद्रह व्याख्यान, पृष्ठ 81)

डॉ. अम्बेडकर आजीवन गांधी और कांग्रेस का घोर विरोध करते रहे और दोनों को ही दलितों का दुश्मन बताते रहे। कांग्रेस का घोर विरोध करते हुए उन्होंने दलितों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा, “कांग्रेस एक भारी संगठन है, यदि हमने उसमें प्रवेश किया, तो हम समुद्र में एक बूंद के बराबर होंगे। कांग्रेस के लोग बड़े अहंकारी हैं, आप उस संगठन में घुसकर अपने को ऊंचा नहीं उठा सकते। यदि आप कांग्रेस में शामिल होंगे, तो आप केवल अपने शत्रुओं की ही शक्ति बढ़ाएंगे।” (बाबा साहेब के पन्द्रह व्याख्यान, पृष्ठ 80)

गांधी और कांग्रेस दलित-विरोधी साबित करने के लिए उन्होंने एक पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधीजी ने अछूतों के लिए क्या किया’ भी लिखी। लेकिन कथित आज़ादी के तुरंत बाद अवसरवादी और समझौतापरस्त राजनीति को अपनाते हुए वे स्वयं कांग्रेस के नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल होने को तुरंत राज़ी हो गए। इस पर पलटी मारते हुए अजीबो-ग़रीब तर्क़ देते हुए उन्होंने कहा, “मुझसे यह पूछा जाता है कि पिछले पचीस साल कांग्रेस के साथ लड़ते रहने के बावजूद इस ख़ास मौक़े पर मैं चुप क्यों हो गया? इसके उत्तर में मेरा निवेदन है कि हमेशा लड़ते ही रहना कोई उत्तम युद्धकौशल नहीं है। हमें दूसरे तरीक़ों से भी काम लेना चाहिए।” (बाबा साहेब के पंद्रह व्याख्यान, पृष्ठ 80-81)

इस तरह हम देखते हैं डॉ. अम्बेडकर के संघर्ष की यह धारा अंततः सुधारवाद, राजनैतिक अवसरवाद, क़ानूनवाद, समझौतावाद, ढुलमुलवाद के रास्ते पर चलते हुए कुल मिलाकर कुछ छोटी-मोटी सुविधाओं और कुछ रियायतों के साथ शासकवर्ग के साथ ही घुल-मिलकर चलती हैं और तमाम वर्गीय टकरावों को धीमा करते हुए दलित-मुक्ति के तमाम प्रश्नों को हल किये बग़ैर संवैधानिक दायरों में चक्कर काटने के लिए छोड़ देती है। यह स्थिति, शोषणाधारित वर्ण और जातियों की भित्ती पर खड़ी सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को ही पोषित करने के काम में शासकवर्ग की ही मदद करने का काम करती हैं।

उदाहरण के लिए आज भी रामविलास पासवान, उदितराज, रामदास अठावले, मायावती के अलावा सैंकडों मंत्री, सौ से ज़्यादा सांसद, विधायक और अनेकों दलित नौकरशाह शासकवर्ग के साथ मिलकर दलित-शोषित श्रमिकवर्ग के शोषण, दमन और उत्पीड़न में सहभागी साबित हो रहे हैं। अतः मौजूदा दलित राजनीति समझौतापरस्त, ढुलमुलवादी, सौदेबाज़ी और अवसरवादी राजनीति का मुख्य स्रोत अम्बेडकरवादी विचारधारा में ही निहित मालूम होता है। यही कारण है कि अपने तमाम तीखे और आक्रामक संघर्षों के बावजूद अम्बेडकर शासकवर्ग को हमेशा मान्य रहे हैं।

कथित आज़ादी के पूर्व भी अम्बेडकर का रवैया बड़ा ही अजीबो-ग़रीब क़िस्म का रहा। उन्होंने आज़ादी के आंदोलन को स्वयं से दूर ही रखा। उनका मानना था कि आज़ादी के बाद सत्ता ब्राह्मणवादियों और पूंजीपतियों के हाथों में चली जाएगी जिसके कारण दलितों को आज़ादी मिलने के बावजूद न्याय नहीं मिल पाएगा। इसीलिए अवसरवादी रुख अख़्तियार करते हुए, छोटी-मोटी सुविधाओं और रियायतों को प्राप्त कर लेने की मंशा से अंग्रेजों के साथ हो लिए। इसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए अंग्रेजों के मंत्रिमंडल में भी रहे। उन्हें यह भ्रम था कि, “हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि भावी स्वतंत्र भारत में हम शासक जाति होंगे। अब हम इस बात को बर्दाश्त नहीं करेंगे कि हम ऐसी स्थिति में रहें जिसमें हमारे साथ मालिकों जैसा नहीं, बल्कि ग़ुलामों जैसा बर्ताव किया जाए। याद रहे, जब भारत में स्वराज्य-सरकार की स्थापना होगी, तो देश की राजनीतिक शक्ति के तीन हिस्सेदार होंगे: हिन्दू, मुसलमान और परिगणित जातियों के लोग।” (29 जनवरी 1944, को कानपुर में, अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन कॉन्फ्रेंस में दिया गया भाषण)

लेकिन जब शीघ्र ही उनका यह भ्रम टूटा और अंग्रेजों से भी वे कुछ प्राप्त न कर पाए तो निराश होते हुए उन्होंने कहा, “अंग्रेज़ लोगों ने अपने वचनों का पालन नहीं किया, और उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम और सिख, इन्हीं तीन जातियों को राजनीतिक सत्ता सौंपने का निश्चय किया।” (25 अप्रैल, 1948 को लखनऊ में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन कांफ्रेंस में दिया गया भाषण) इसके बाद कथित आज़ादी के तुरंत बाद समझौतावादी रुख अख्तियार करते हए उन्होंने फिर से छोटी-मोटी सुविधाओं और रियायतों के लिए नेहरू और कांग्रेस की ओर रुख किया।

पहली बात, अम्बेडकर यह समझ पाने में असफल रहे कि कोई भी शासक चाहे वह दलित हो या सवर्ण या अन्य कोई और, अनिवार्य रूप से शोषक भी होता है। शासक और शोषक कोई अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं बल्कि एक ही घटना के दो नाम रहे हैं। और इतना ही नहीं किसी व्यक्ति या समूह के द्वारा शासक होने की चाह शोषक होने की ही चाह होती है। शासक होने की चाह, मनुष्य की शोषक वृत्ति से आती है। शासक होने की चाह तभी पैदा होती है जब खुद के स्वार्थ साधने हों और दूसरों का बुरा करना हो।

इसीलिए किसी व्यक्ति या समूह की छाती पर बैठकर किसी भी बहाने शासक हो जाना कोई गौरव की बात नहीं। ऐसे में उचित और तथ्यपूर्ण यही होता कि ऐसे समाज के निर्माण की ओर क़दम बढ़ाया जाता जिसमें न कोई शोषक हो, न शोषित, न शासक हो और न ही कोई शासित और न ही कोई मालिक हो न मज़दूर हो, बल्कि सभी सामूहिक रूप से बिना किसी भेदभाव के सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा हों, जिसमें व्यक्ति, समाज के सुख और समृद्धि के प्रति उत्तरदायी हो और समाज व्यक्ति के न्यायपूर्ण और आवश्यक भौतिक ज़रूरतों और उसके आत्मिक, मानसिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हितों को पूरा करने में संलग्न हो।

अम्बेडकर यह भी समझ पाने में असफ़ल रहे कि सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद शोषण की ही चरणबद्ध व्यवस्थाएं रही हैं और इन व्यवस्थाओं का मूल आधार श्रम का शोषण और निजी संपत्ति का अधिकार रहा है। इसीलिए वर्णव्यवस्था, जातिवाद और धार्मिक उत्पीड़न, श्रम के शोषण पर आधारित इन्हीं शोषणकारी व्यवस्थाओं की ही उपज रहे हैं। ये तीनों ही व्यवस्थाएं दलित-शोषित और श्रमजीवीवर्ग विरोधी व्यवस्थाएं होने के साथ-साथ वर्ग-विभक्त समाज की शोषक और प्रभुत्वसंपन्न शक्तियां रही हैं। इन व्यवस्थाओं में व्यक्तिगत तौर पर शासकवर्ग के साथ सहयोग करते हुए एकाध दलित व्यक्ति तो शासक हो सकता है, लेकिन दलितवर्ग कभी भी शासक के स्थान पर आरूढ़ नहीं हो सकता। यह किसी भी सूरत में संभव नहीं हो सकता। इसीलिए इन तीनों व्यवस्थाओं से निज़ात पाए बिना मात्र मुक्ति छोटी-मोटी सुविधाओं और आरक्षण जैसी मामूली रियायतों के माध्यम से दलित-मुक्ति के प्रश्नों को कदापि हल नहीं किया जा सकता। यह असंभव है।

आज भी भारत में सामंती मानसिकता, पूंजीवादी शोषण और दमन पर आधारित समाज व्यवस्था अस्तित्व में है जिसको साम्राज्यवादी शक्तियां नियंत्रित किए हुए हैं और यह सर्वविदित ही है कि वर्णव्यवस्था, जातिवाद और धार्मिक उत्पीडन व शोषण और दमन के अन्य रूप भी इन्हीं शोषणकारी व्यवस्थाओं से उपजी घृणित उप-उत्तपत्तियां (by products) हैं। सामंती, पूंजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्थाओं में इस तरह की गंदगियां ऐसे ही उग आती हैं जैसे खेत में गेहूं के साथ भूसा अपने आप उग आता जो स्वयं किसान के लिए मुसीबत बन जाता है। फिर उससे निजात पाने के लिए उसे आग में जला देना किसान के लिए एकमात्र और अंतिम विकल्प रह जाता है। इसीलिए उचित होता कि अम्बेडकर अंग्रेजों पर भरोसा करने की बजाए दलितों की संपूर्ण मुक्ति के लिए ब्राह्मणवाद जैसी सामंती शक्तियों, उभरते देशी पूंजीवाद और साम्राज्यवादी शक्तियों के ख़िलाफ़ संघर्षरत क्रांतिकारी शक्तियों के साथ सहयोग करते। लेकिन क्रांतिकारी शक्तियों का घोर विरोध करते हुए वे ‘बुद्धम शरणं गच्छामि’ का उदघोष करते हुए अंततः बौद्धधर्म की शरण में जा पहुंचे।

उनका यह सुधारवादी क़दम समस्या से पलायन करने जैसा ही साबित हुआ। इतना ही नहीं विश्व में सम्पन्न हुई सामाजिक क्रांतियों का जोरदार विरोध करते हुए उन्होंने कहा, “कम्युनिज़्म जंगल की आग के समान है। जो कुछ भी उसके रास्ते में आता है, उसे जलाता, समाप्त करता चलता है। यह हो सकता है कि जो देश कम्युनिज़्म के केंद्र से बहुत दूरी पर हैं, वे यह समझते रहें कि यह जंगल की आग या तो उन तक पहुंचने से पहले ही बुझा दी जाएगी या उन तक कभी पहुंचेगी ही नहीं। लेकिन जो देश इस आग के समीप हैं, उनका क्या होगा? क्या आप आशा कर सकते हैं कि मानव अस्तित्व और यह जंगली आग दोनों साथ-साथ रह सकते हैं?” (अम्बेडकर, चीनी आक्रमण और भारत की विदेश नीति पर 26 अगस्त, 1954 को राज्यसभा में दिया गया भाषण)

इतना ही नहीं, रूसी और चीनी क्रांतियों को पराधीनता की पूर्वगामी बताते हुए उन्होंने विश्व में कम्युनिज़्म के बढ़ते प्रभाव और विस्तार पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, “मुझे लगता है कि हमारे सामने और कोई दूसरी समस्या नहीं है। एक ही समस्या है, वह है दुनिया में कम्युनिज़्म के विस्तार की…..एक ओर संसार का वह भाग है, जो पार्लियामेंटरी शासन-पद्वति और स्वतंत्र प्रजातंत्रवाद में विश्वास करता है, दूसरी ओर, संसार में जो कम्युनिज़्म फ़ैलता जा रहा है……इन्हीं दोनों का संघर्ष है।” (अम्बेडकर, चीनी आक्रमण और भारत की विदेश नीति, वही)

दरअसल, अम्बेडकर स्वभावतः और मूलतः एक सुधारवादी नेता थे। सुधारवाद की यह विशेषता रही है कि यह विरोधी वर्गों के अस्तित्व और वर्ग संघर्षों को तो मानती है लेकिन वर्ग संघर्षों को अपने अंतिम लक्ष्य तक ले जाने का कोई वैचारिक और सैद्धांतिक आधार उसके पास नहीं होता। इसलिए सुधारवाद की आत्यंतिक परिणति यह होती है कि वह कोल्हू के बैल की तरह चलता तो रातदिन है लेकिन पहुंचता कहीं भी नहीं और एक बिंदु पर पहुंचकर खुद ही बिखर कर समाप्त हो जाता है या शासकवर्ग के साथ स्वयं को समाहित कर लेता है। अब तक यही होता रहा है।

रसेल ने सुधारवाद और क्रांतिकारिता की अदभुत व्याख्या की। उन्होंने सुधारवाद और क्रांतिकारिता के फ़र्क़ को मटमैले पानी के गिलास से समझाया। क्रांतिकारी इस पानी को फेंक देने का हामी है और उसको साफ़, शुद्ध और ताज़े पानी से भरने का आहवान करता है जबकि सुधारवादी उस मटमैले पानी में ही नया साफ़ पानी मिलाने का समर्थक होता है। इसीलिए हर सुधार कार्यक्रम के बाद पानी वैसा ही मटमैला रहता है। इसीलिए अम्बेडकर का सुधारवादी दृष्टिकोण आज दलित राजनीति में सामाजिक बदलाव का नहीं बल्कि सामाजिक ठहराव का कारक बनकर प्रकट हो रहा है। कुल मिलाकर, अम्बेडकर के जीवन-दर्शन और कृतित्व की तुलना जर्मनी के सुधारवादी और पूंजीवादी सिद्धांतकार बर्नस्टीन के इस वाक्यसूत्र से की जा सकती है कि, “संघर्ष ही सब कुछ है, अंतिम लक्ष्य कुछ भी नहीं।”

लेनिन ने सुधारवाद के इस दलित-शोषित श्रमिकवर्ग-विरोधी चरित्र को उजागर करते हुए लिखा, “पूंजीपतियों के लिए यह ज़्यादा लाभदायी है कि पूंजीवादी जनतंत्र की दिशा में ज़रूरी परिवर्तन और भी धीरे-धीरे और क्रमशः फूंक-फूंक कर, कम दृढ़ता से, सुधारों के ज़रिए हों……यदि ये परिवर्तन आम जनता, यानी किसानों और ख़ास तौर से मज़दूरों की स्वतंत्रता, क्रांतिकारी कार्यवाही, पहल और शक्ति को कम-से-कम विकसित करें…..।” (लेनिन, संग्रहित ग्रंथावली, मास्को, 1947, खंड 1, पृष्ठ 369)

सुधारवाद की इस भूमिका की तीव्र भर्त्सना करते हुए लेनिन ने कहा था, “मज़दूरों के लिए इस बात में ज़्यादा फ़ायदा है कि पूंजीवादी जनतंत्र की दिशा में जो परिवर्तन ज़रूरी हैं, वे क्रांति के ज़रिए हों और सुधारों के ज़रिए न हों। सुधारों का तरीक़ा देर लगाने का तरीक़ा है, मामला टालने के तरीक़ा है, जातीय जीवन के सड़े-गले तबक़ों के दर्दनाक, धीमे-धीमे घुलने का तरीक़ा है। सर्वहारा और किसानवर्ग भी इस सडांध से सबसे पहले तकलीफ़ उठाते हैं। क्रांतिकारी तरीक़ा तुरंत चीरफाड़ का तरीक़ा है, जो सर्वहारा वर्ग के लिए सबसे कम दर्दनाक है। यह तरीक़ा गलते हुए हिस्सों को सीधे हटा देने का तरीक़ा हैं, यह तरीक़ा राज्यतंत्र और उसके साथ चलने वाली घृणित, घटिया, सड़ी हुई और छूत फ़ैलाने वाली संस्थाओं को कम-से-कम रियायतें देने का और उनका कम-से-कम लिहाज़ करने का तरीक़ा है।” (लेनिन, संग्रहित ग्रंथावली, मास्को, 1947, खंड 1, पृष्ठ 369)

इसके विपरीत, डॉ. अम्बेडकर ने सुधारवाद का पुरजोर समर्थन करते हुए रूसी और चीनी की शोषित और पीड़ित श्रमजीवी जनता द्वारा की क्रांतिकरी कार्यवाईयों की कटु आलोचना करते हुए मार्क्सवाद जैसे दलित-शोषित समर्थक क्रांतिकारी विचार दर्शन के विकल्प के तौर पर बुद्ध और बौद्धधर्म को पेश किया। यह भटकाव अंततः सामंती-पूंजीवादी शोषक व्यवस्था केके लिए ही फायदेमंद साबित हुआ। यही कारण है आज भी दलित आंदोलन अपनी कोई दिशा और लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पा रहा है।

फलस्वरूप, तमाम अम्बेडकरवादी दलित नेता आज शासकवर्ग की विभिन्न राजनैतिक पार्टियों व उनके दलित-विरोधी कार्यक्रमों के पिछलग्गू बने हुए हैं। इसी कारण, उनसे जुड़ी हुई दलित जनता भी संविधान में आस्था रखते हुए शासकवर्ग की विभिन्न राजनैतिक पार्टियों का वोट बैंक बनी हुई हैं। यही नहीं इसी दिशाहीनता के कारण उनका एकमात्र कार्य सिर्फ़ और सिर्फ़ हर वर्ष एक बार अम्बेडकर जयंतियां ही मनाना और भंडारे करना भर रह गया है। इस स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए शासकवर्ग दलितवर्ग को चुनावी राजनीति में इस्तेमाल करते हुए अपने वर्गहितों को अक्षुण्ण रख पाने में फ़िलहाल सफ़ल रहा है।

दूसरी ओर, क्रांतिकारी वामपंथी शक्तियां अपने तीव्र आंतरिक अंतर्विरोधों और वर्ण व जातिवाद के प्रश्नों अपनी सैद्धांतिक और सांगठनिक रूप से इतनी कमज़ोर हैं कि वे फ़िलहाल इस सैद्धांतिक दिशाहीनता से पैदा हुई शून्यता को भर पाने में असमर्थ दिखाई देती हैं। इसीलिए अम्बेडकर, उनका सुधारवाद और संविधान आज भी दलित-शोषित श्रमजीवी जनता की श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं।

लेनिन ने इसी तरह की स्थिति का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया था- “जो लोग केवल वर्गसंघर्ष को मानते हैं…..वे सम्भवतः अभी पूंजीवादी चिंतन और पूंजीवादी राजनीति के दायरे में ही चक्कर काट रहे हैं। केवल वर्गसंघर्ष को मानना उसे एक ऐसी चीज़ बना देना है जो पूंजीपतिवर्ग को मान्य होती है।” अतः यह स्थिति निश्चित रूप से दलित शोषित-श्रमजीवी जनता की मुक्ति की नहीं बल्कि उसकी परतंत्रता को बनाये रखने की सूचक है। इसीलिए लेनिन ने वर्गों के अंतरों से उपजी तमाम समस्याओं को सीधे तौर पर वर्गों के ख़ात्मे से जोड़ा। उन्होंने लिखा, “वर्गों के उन्मूलन का अर्थ है कि उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का स्वामित्व हो तथा उत्पादन के साधनों के संदर्भ में, सभी नागरिकों को समानता प्राप्त हो। इसका अर्थ यह हुआ कि सभी नागरिकों को राष्ट्रकृत उत्पादन के साधनों पर, सार्वजनिक मिल्कियत वाली भूमि पर तथा सार्वजनिक मिल्कियत वाले कारखानों आदि में काम करने का समान अवसर प्राप्त हो।” (लेनिन, संकलित रचनाएं, खंड 20, पृष्ठ 146)

लेनिन आगे कहते हैं, “एंगेल्स हज़ार बार सही थे, जब उन्होंने लिखा था: वर्गों के उन्मूलन के बिना समानता सबसे ज़्यादा मूर्खतापूर्ण, सबसे ज़्यादा बक़वास भरा पूर्वाग्रह है।” (लेनिन, संकलित रचनाएं, खंड 8, पृष्ठ 343)

याद रहे, तमाम दलित जातियां सर्वहारावर्ग या शोषितवर्ग का महत्वपूर्ण और अति शोषित और पीड़ित हिस्सा रही हैं। जातियों, वर्णों और धर्मों का उदभव और विकास वर्ग-विभक्त समाज में मौजूद श्रम के शोषण और निजी संपत्ति की ही उपज रहे हैं। श्रम के शोषण और निजी संपत्ति वर्गविभक्त समाज के गहने है क्योंकि श्रम के शोषण और निजी संपत्ति के बग़ैर वर्गों के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वर्गों की मौजूदगी से उपजी तमाम तरह की असमानताओं आधार ही श्रम के शोषण, दमन और निजी संपत्ति के अस्तित्व पर टिका हुआ है। इसीलिए जातियां, वर्गों से अलग कोई तथ्य नहीं हैं, बल्कि शूद्र वर्ण और तमाम कथित निम्न जातियां मूलतः शोषितवर्ग का ही अभिन्न अंग रही हैं। इसीलिए जातियों और वर्णों का उन्मूलन वर्गों के ख़ात्मे के साथ ही सम्पन्न हो सकता है।

जाति, वर्ण, धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर किसी भी संघर्ष के द्वारा दलित-मुक्ति की समस्या को कदापि हल नहीं किया जा सकता। लेकिन अम्बेडकर वर्गों के अस्तित्व के ऐतिहासिक और मूल आधार को समझ पाने में पूर्णतया नाक़ाम रहे हालांकि वे आजीवन यही दोहराते रहे कि- “कम्युनिस्ट दर्शन पर जितने ग्रंथ मैंने पढ़े हैं उतने भारत के समस्त कम्युनिस्ट नेताओं ने भी नहीं पढ़े होंगे।” (अम्बेडकर, लखनऊ भाषण, दिनांक 25.4.1948)

अम्बेडकर, दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की मुक्ति के वास्तविक विचार दर्शन, मार्क्सवाद को नकारते हुए ढाई हजार वर्ष पुराने बुद्ध और बौद्धधर्म की शरण में चले गए। उनका मानना था कि बुद्ध और बौद्धधर्म की शिक्षाओं के माध्यम से शोषकवर्ग का हृदयपरिवर्तन किया जा सकता हैं। लेकिन वे स्वयं आजीवन गांधी, नेहरू, कांग्रेस और शोषकवर्ग का हृदय-परिवर्तन कर पाने में असफ़ल रहे। उनके हृदय-परिवर्तन का सिद्धांत ऐतिहासिक तथ्यों के सर्वथा विपरीत विचार था क्योंकि मनुष्य जाति के सम्पूर्ण इतिहास में ऐसा एक भी दृष्टांत नहीं मिलता जिसमें किसी बुद्धपुरुष या धार्मिक उपदेशों से अभिभूत होकर शासकवर्ग ने दलित-शोषित श्रमिकवर्ग को सत्ता सौंपी हो। व्यक्तिगत रूप से अपवाद स्वरूप हो सकता है कि दो-चार व्यक्तियों का हृदय-परिवर्तन हुआ हो, लेकिन दो-चार व्यक्तियों के बदल जाने से कोई व्यवस्था नहीं बदल जाती।

समस्या की जड़ें किसी व्यक्ति में नहीं बल्कि व्यवस्था की आधासरभूत संरचना में निहित रही हैं। इसीलिए यह मामला व्यक्तिगत न होकर पूर्ण रूप से व्यवस्थागत रहा है। इसीलिए अम्बेडकर यह क़दम दलित-मुक्ति के वास्तविक प्रश्नों को ठोस अर्थों में हल करने की बजाए पलायनवाद की ओर कूच कर गया। और इस तरह दलित मुक्ति का प्रश्न एक बार फिर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भटकावों का शिकार होकर बिखर गया।

यह बात सच है कि मौजूदा वर्गविभक्त सामंती मानसिकता तथा श्रम और श्रमिक के शोषण और दमन पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था में चुनाव लड़कर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक इत्यादि बनने की प्रक्रिया का हिस्सा बन जाना सही अर्थों में कोई राजनीति नहीं होती बल्कि इस तरह की कवायदों को सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था की गंदगी के इलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। यह राजनीति शोषकों के द्वारा दलित-शोषित श्रमिकवर्ग के शोषण और दमन का यंत्र बनकर रह गई है। निश्चित ही ऐसी राजनीति के द्वारा चंद शोषक व्यक्तियों के समूह का तो ‘कल्याण’ तो सकता है लेकिन आम श्रमजीवी जनता उनके इस कथित ‘कल्याण’ के कारण हमेशा ही कंगाली और बदहाली का शिकार होती रही है। इस तरह की राजनीति दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की राजनीति कैसे हो सकती है? इसे तो गंदनीति कहा जाना चाहिए। जिसे दलित शोषित श्रमिकवर्ग के भीतर मौजूद जाति चेतना और धर्मचेतना की मौजूदगी और वर्ग चेतना के अभाव के कारण शासकवर्ग द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है और यह स्थिति वर्तमान में स्वयं कथित रूप से अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान द्वारा संचालित है।

सही मायनों में राजनीति तो वही है जो वर्ण, जाति, धर्म और संप्रदाय पर आधारित न होकर वर्ग संघषों पर आधारित हो और जिसका अंतिम लक्ष्य वर्गों का सदा के लिए उन्मूलन करना निर्धारित हो। शेष सब राजनीति के नाम पर गंदगी भर ही है। इसी सामंती-पूंजीवादी राजनीतिक गंदगी में आजकल पलास्टिक का नक़ली फूल कमल खिला हुआ है जिसमें से दुर्गंध उठती मालूम होती है। इसीलिए विरोध राजनीति का नहीं बल्कि इसी तरह की जनविरोधी राजनीति और राजनितिज्ञों का होता है न कि वास्तविक और क्रांतिकारी राजनीति का। और यह विरोध होना भी चाहिए। बहुत ज़रूरी है।

(अशोक कुमार रिटायार्ड अधिकारी हैं।)

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