Thursday, December 2, 2021

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बरनाला बन गया किसानों और मजदूरों की एकता का स्तंभ

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पिछले हफ्ते पंजाब के बरनाला में नए कृषि कानूनों के खिलाफ आयोजित रैली में यह पहली बार हुआ कि किसान यूनियनों और मजदूर संगठनों द्वारा एक संयुक्त प्रदर्शन का आयोजन किया गया। इस मजदूर-किसान महारैली का आयोजन भारतीय किसान यूनियन (उग्राहा) और पंजाब खेत मजदूर यूनियन (पीकेएमयू) द्वारा आयोजित किया गया था, और यह अब तक की पंजाब में आयोजित सबसे विशाल रैलियों में से एक है। किसानों द्वारा जहां हरे झंडे आसमान में लहराए जा रहे थे, वहीं मजदूरों द्वारा गर्व के साथ अपने लाल झंडों को फहराया जा रहा था।

किसान यूनियनों ने दावा किया है कि तकरीबन दो लाख किसानों और मजदूरों ने इस महारैली में शिरकत की, जिसके लिए करीब नौ लाख स्क्वायर फीट की जगह बनती है। प्रदर्शन स्थल पर करीब 500 ट्रैक्टर और ट्राली ट्रैफिक जाम में फंसे होने के चलते नहीं पहुंच सके, वरना यह भीड़ कहीं और ज्यादा होनी थी। दुनिया की मानी जानी समाचार एजेंसी रायटर ने इस सभा को स्थान दिया है और रायटर इंडिया के मुताबिक जिसने इस पर एक लेख लिखते हुए वीडियो शेयर किया है, जिसमें बताया गया है कि पुलिस के सूत्रों से भारत के उत्तरी हिस्से में पंजाब राज्य में इस रैली में 1,30,000 किसानों के शामिल होने की खबर है।

https://cdn.substack.com/image/twitter_name/w_36/ReutersIndia.jpgReuters India @ReutersIndia

Up to 130,000 farmers gathered in India’s northern Punjab state, demanding the repeal of new farm laws enacted by Prime Minister Narendra Modi’s government which they say will hurt them and benefit large corporations. Read more reut.rs/3ujJtuc

पीएमकेयू के राज्य अध्यक्ष जोरा सिंह नसराली ने इस रैली के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि इसने अपने लक्ष्य की पूर्ति कर ली है। उन्होंने कहा, “इन कानूनों से श्रमिकों के ऊपर प्राणघातक हमला होने जा रहा है, जबकि भाजपा लोगों के बीच में भ्रम फैला रही थी कि इस कानून के जरिये जमींदारों से जमीन छिन जाने वाली है और इसे भूमिहीनों के बीच में बांट दिया जाएगा। अधिकतर खेत-मजदूरों के इन प्रदर्शनों में शामिल न होने के पीछे यह भी एक वजह थी, क्योंकि उन्हें इन कानूनों के बारे में वास्तविक जानकारी नहीं मिल पा रही थी।”

उन्होंने आगे बताया, “इस बात को ध्यान में रखते हुए हमने सोचा कि हमें पंजाब के 32 प्रतिशत भूमिहीन दलित आबादी को भी एकजुट करने, उन्हें नए कानूनों की हकीकत से रूबरू कराने और किसानों के विरोध प्रदर्शन को समर्थन देने की जरूरत है, क्योंकि इससे वे भी प्रभावित होने जा रहे हैं। मुझे लगता है कि हमने इस लक्ष्य को हासिल कर लिया है।”

जाति का प्रश्न अभी भी भारतीय राजनीति और समाज में एक महत्वपूर्ण रोल अदा करता है। नसराली के अनुसार बीजेपी इस बीच में आंदोलन के दौरान लोगों के बीच में जातीय आधार पर विभाजन के प्रयास में लगी हुई थी। उन्होंने कहा, “भूमिहीनों और जमींदारों के बीच में कई वर्षों से अंतरविरोध चले आ रहे हैं और कुछ लोग इस विभाजन को भुनाने की फ़िराक में लगे हुए हैं, लेकिन जब हमने दलितों को इस बारे में सूचित किया कि इन कानूनों से खेत-मजदूरों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ने जा रहा है तो फिर वे भी इन नए कृषि कानूनों की मुखालफत में एकजुट हो रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि इस बीच कई लोगों ने इस बात का उल्लेख किया है कि किसानों के इस विरोध प्रदर्शन ने विभिन्न समुदायों को सफलतापूर्वक एक साथ इकट्ठा करने का काम किया है। अतीत की जातीय बेड़ियां भारत में टूट रही हैं और पंजाब के भीतर और दिल्ली के बाहर जमा किसानों के साथ कई दलितों ने यात्राएं की हैं और विरोध में शामिल होकर साझा मुद्दों को उठाने का काम कर रहे हैं। बिना खेत-मजदूरों और किसानों को एकजुट किए हम मोदी सरकार की फासीवादी और निजीकरण की नीतियों की लड़ाई को नहीं जीत सकते।

इस महारैली का आयोजन एक हफ्ते की घोषणा के भीतर ही कर दिया गया था। पीकेएमयू और बीकेयू (उग्राहन) ने पंजाब के तीन क्षेत्रों के 15 जिलों के 1,600 गांवों के किसानों और खेत-मजदूरों को इस रैली में इकट्ठा किया था। एक किसान नेता ने दावा किया कि ज्यादातर किसान पंजाब के मालवा क्षेत्र से इस रैली में शामिल हुए थे।

पीकेएमयू के महासचिव लक्ष्मण सिंह ने भी आंदोलन के भीतर एकता और उसकी मजबूती पर जोर दिया। उनका कहना था, “26 जनवरी की घटना के बाद से यह अफवाह फैलाई जा रही थी कि किसान आंदोलन अब कमजोर पड़ गया है, लेकिन इस रैली ने उन आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब दिया है। इसने साबित कर दिया है कि किसानों का यह विरोध अब पहले से अधिक तेज हो चुका है और विभिन्न पेशों में शामिल लोग और वर्ग इस रैली में एक साथ इकट्ठा हुए हैं। यदि आप नजर दौड़ाएं कि इसमें किन-किन लोगों ने शिरकत की तो आप पाएंगे कि इसमें अध्यापकों, बिजली बोर्ड के कर्मचारियों और वकीलों तक ने भागीदारी की है।”

इन कानूनों के रोजगार पर पड़ने वाले संभावित असर के बारे में बात करते हुए लक्षमण का कहना था, “फिलवक्त आप देख सकते हैं कि लाखों की संख्या में मजदूर मंडियों में काम पाते हैं। यही वजह है कि ये कानून न सिर्फ किसानों के लिए एक प्रमुख मुद्दा बने हुए हैं बल्कि इसका सीधा नाता मजदूरों के साथ भी जुड़ा है। यदि कारपोरेटीकरण करने से मंडी व्यवस्था कमजोर होती है तो ऐसे में कुछ ही लोगों के पास रोजगार रह जाने वाला है। यदि किसानों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ा तो खेत-मजदूरों के लिए अपने भोजन की व्यवस्था करने के लाले पड़ सकते हैं। दलितों के लिए यह उनके अस्तित्व का प्रश्न है।”

महारैली में शामिल होने के लिए बरनाला पहुंचे पंजाब के मुक्तसर जिले के खुनान कलां के खेत-मजदूर कला सिंह के अनुसार, “इन कानूनों से किसानों की तुलना में खेत-मजूरों पर कहीं अधिक प्रभाव पड़ने जा रहा है। पहले सार्वजिनक वितरण व्यवस्था में कई सारी वस्तुएं सस्ते दरों पर मुहैय्या कराई जाती थीं, लेकिन अब खाद्य अनाज ही मुहैय्या कराया जा रहा है। पीडीएस सिस्टम को उन्होंने पहले से खोखला बना दिया है। यदि पीडीएस वितरण को और कमजोर कर दिया जाता है, अगर एफसीआई अनाजों की खरीद बंद कर देती है तो फिर हमें अनाज कहां से मिलेगा?”

उन्होंने कहा, “हमारा मानना है कि कॉरपोरेट का यह हमला सिर्फ किसानों पर नहीं है, वरन समूचे कृषक समुदाय पर यह हमला है, इसीलिए हम कह रहे हैं कि यह सिर्फ किसानों की ही लड़ाई नहीं है। हम समझते हैं कि यह किसानों और खेत-मजदूरों दोनों के लिए ही बेहद अहम मुद्दा है। हम आशा करते हैं कि हमारी बीमारियों के लिए दवा को हासिल करने के लिए साझे संघर्ष के जरिये ही हासिल किया जा सकता है। एक बार यदि कॉरपोरेट ने बड़े पैमाने पर खेतीबाड़ी का काम करना शुरू कर दिया तो हम सभी बेरोजगार हो जाने वाले हैं।”

मजदूर नेताओं और खेत-मजदूरों से बात करने और उन्हें सुनने के बाद मैं भटिंडा के मेहराज गांव की ओर गया, जहां 23 फरवरी को नए कृषि कानूनों और किसानों की गिरफ्तारी के खिलाफ नौजवानों की एक रैली का आयोजन होने जा रहा है।

कुर्सी पर बैठकर चाय का घूंट लेते एक भूमिहीन दलित स्वर्ण सिंह, जो पेशे से दर्जी का काम करते हैं, वे चुपचाप बैठे हुए नौजवानों की टोली को एक और रैली की तैयारियों में जुटे देख रहे थे। उनका कहना था, “किसानों और खेत-मजदूरों की किस्मत एक-दूजे के साथ आपस में गुंथी हुई है। यदि किसानों को धक्का पहुंचा तो फिर खेत-मजदूरों पर भी इसका प्रभाव पड़ना निश्चित है।”

भाजपा द्वारा आंदोलन को जातीय आधार पर विभाजित करने की कोशिशों पर जब स्वर्ण सिंह से सवाल किया गया तो उनका कहना था, “भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो ब्राहमणवादी सामाजिक क्रम व्यवस्था पर यकीन करती है, और यह हमेशा से मजदूरों को निचले क्रम पर बने रहने की कोशिश में रहती है। यह पार्टी श्रमिकों के विद्रोह की चिंगारी से भयभीत रहती है।” उन्होंने आगे कहा, “बीजेपी हमें आपस में बांटना चाहती है, लेकिन हम उनकी बातों पर ध्यान तक नहीं देते। हमारे पड़ोस में एक बीजेपी कार्यकर्त्ता रहता है। वह हमसे कभी बात नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि हम उसके कहने पर नहीं चलने वाले।”
(बरनाला से संदीप सिंह की रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद)

  • रविंद्र सिंह पटवाल

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