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देश भर के थानों और सभी जांच एजेंसियों के दफ्तरों में छह हफ्ते में लगें सीसीटीवी कैमरे: सुप्रीम कोर्ट

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 16 सितंबर 2020 को लोकसभा में बताया था कि उसके पास हिरासत में यातना देने पर एक कानून लाने की कोई योजना नहीं है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इसकी काफी हद तक भरपाई बुधवार को अपने एक आदेश से कर दी, जिसमें कहा गया है कि केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सुनिश्चित करें कि सभी केंद्रीय जांच एजेंसियों और सभी राज्यों के प्रत्येक पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और थाने का कोई भी एरिया सीसीटीवी के कवरेज से बाहर न रहे। सभी एंट्री और एग्जिट पर सीसीटीवी की नजर होनी चाहिए। मेन गेट के अलावा सभी लॉकअप में उत्तम कोटि के सीसीटीवी कैमरे होने चाहिए। अगली सुनवाई 27 जनवरी 2021 को होगी।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि गिरफ्तार करने और पूछताछ करने का अधिकार रखने वाले केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), नार्कोटिक कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), राजस्व गुप्तचर निदेशालय (डीआरआई) और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालयों (एसएफआईओ) सहित सभी जांच एजेंसियों के उन सारे कार्यलयों में अनिवार्य रूप से सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, जिनमें पूछताछ होती है और आरोपियों को रखा जाता है।

इसके साथ ही देश भर के पुलिस थानों में भी सीसीटीवी कैमरे लगाने का उच्चतम न्यायालय ने निर्देश जारी किया है। उच्चतम न्यायालय ने देश भर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि सही भावना से कोर्ट के आदेश को लागू कराया जाए। उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले मानव अधिकारों के हनन पर अंकुश लगाने के लिए थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था।

जस्टिस रोहिंटन फली नरिमन, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी पुलिस थानों में प्रवेश और निकासी के स्थान, मुख्य प्रवेश द्वार, हवालात, सभी गलियारों, लॉबी, स्वागत कक्ष क्षेत्र और हवालात कक्ष के बाहर के क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य रूप से लगे हों।

पीठ ने कहा कि सीसीटीवी सिस्टम में नाइट विजन सुविधा के साथ ही आडियो और वीडियो की फुटेज की व्यवस्था होनी चाहिए और केंद्र तथा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए ऐसा सिस्टम खरीदना अनिवार्य होगा, जिनमें कम से कम एक साल और इससे ज्यादा समय तक सीसीटीवी कैमरों के आंकड़ों को इकट्ठा रखने की सुविधा हो। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इसके अलावा, केंद्र सरकार को भी यह निर्देश दिया जाता है कि सीसीटीवी कैमरे और रिकार्डिंग उपकरण सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, एनआईए, नार्कोटिक कंट्रोल ब्यूरो, राजस्व गुप्तचर निदेशालय, संगीन अपराध जांच कार्यालय, ऐसी दूसरी एजेंसियां, जिन्हें पूछताछ करने और गिरफ्तार करने का अधिकार है, के दफ्तरों में भी लगाए जाएं।

पीठ ने कहा कि हालांकि इनमें से अधिकांश एजेंसियां अपने दफ्तरों में ही पूछताछ करती हैं, सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य रूप से ऐसे सभी कार्यालयों में लगाए जाएंगे जहां आरोपियों से पूछताछ की जाती है और उन्हें हवालात की तरह ही रखा जाता है।

पीठ ने कहा है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, कैबिनेट सेक्रेटरी या फिर होम सेक्रेटरी हलफनामा दायर कर बताएं कि अदालत के आदेश के पालन के लिए एक्शन प्लान क्या है और टाइम लाइन क्या होगी। अदालत ने इसके लिए छह हफ्ते का वक्त दिया है।

पीठ ने कहा है कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सुनिश्चित करें कि हर पुलिस थाने में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और थाने का कोई भी एरिया सीसीटीवी की कवरेज से बाहर न रहे। सभी एंट्री और एग्जिट पर सीसीटीवी की नजर होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि मेन गेट के अलावा सभी लॉकअप में सीसीटीवी होने चाहिए। साथ ही सभी कोरिडोर, लॉबी, रिसेप्शन, इंस्पेक्टर के कमरे, सब इंस्पेक्टर के कमरे, ड्यूटी रूम और थाने के कैंपस भी सीसीटीवी के निगरानी में रहेगा।

पीठ ने कहा है कि सीसीटीवी नाइट विजन वाला होना चाहिए और इसमें वीडियो और ऑडियो फुटेज हों। जहां भी देश भर में थानों में नेट और बिजली की उपलब्धता नहीं है, वहां बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की होगी। बिजली के लिए सोलर और विंड एनर्जी की व्यवस्था की जाए। सीसीटीवी क्लियर विजन वाला हो और सीसीटीवी का डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर हो। सीसीटीवी का डाटा 18 महीने तक प्रिजर्व हो ऐसी व्यवस्था की जाए।

पीठ ने कहा है कि अगर बाजार में 18 महीने तक डाटा प्रिजर्व करने वाला उपकरण उपलब्ध न हो तो राज्यों को ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि वह सबसे ज्यादा समय तक प्रिजर्व करने वाले उम्दा किस्म के सीसीटीवी की व्यवस्था करें, लेकिन रिकॉर्डिंग एक साल से कम वाला न हो। साथ ही राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हलफनामा दायर कर बताएं कि उन्होंने सबसे उम्दा किस्म के सीसीटीवी कैमरे बाजार से लिए हैं।

पीठ ने कहा है कि जहां भी थाने में किसी के साथ बल प्रयोग किया गया हो कोई जख्मी हो गया हो या कस्टोडियल डेथ का मामला हो तो वह शिकायत कर सकता है। शिकायत न सिर्फ एनएचआरसी में बल्कि ह्ययूमैन राइट्स कोर्ट के सामने भी की जा सकती है। कमीशन या कोर्ट थाने से सीसीटीवी फुटेज के लिए समन कर सकता है। जांच एजेंसी के लिए सीसीटीवी फुटेज संरक्षित किया जाएगा।

पीठ ने कहा है कि प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार मिला हुआ है और साथ ही संवैधानिक अधिकार है। इसी अधिकार के संरक्षण के लिए ये तमाम आदेश पारित किए गए हैं। 3 अप्रैल 2018 को उच्चतम न्यायालय ने आदेश पारित किया था, लेकिन अभी तक कुछ खास नहीं हो पाया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का आदेश मौजूदा सरकार और संबंधित अथॉरिटी सही भावना से लागू कराएं। डीजी को निर्देश दिया जाता है कि एसएचओ को निर्देश दें कि इस बात को सुनिश्चित करें कि सीसीटीवी वर्किंग कंडिशन में हो और एसएचओ डाटा और रखरखाव के लिए जिम्मेदार होगा।

उच्चतम न्यायालय ने हिरासत में यातनाओं से संबंधित मामले पर विचार करते हुए इसी साल जुलाई में 2017 के उच्चतम न्यायालय  के उस आदेश का संज्ञान लिया था, जिसमें मानवाधिकारों का दुरुपयोग रोकने और घटना स्थल की वीडियोग्राफी करने के लिए सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने और एक केंद्रीय निगरानी समिति तथा प्रत्येक राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश में निगरानी समिति गठित करने का आदेश दिया गया था। इस मामले में 16 सितंबर, 2020 को पीठ ने पुलिस स्टेशन में सीसीटीवी कैमरों की हालत पर जानकारी मांगी थी। पीठ ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों से 24 नवंबर तक इस पर जवाब देने के लिए कहा था। पीठ के आदेश का पालन ढाई साले के बाद भी न हो पाने के बाद पीठ ने इसे महज छह सप्ताह के भीतर पूरा करने के लिए कहा है।

गौरतलब है कि गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने 16 सितंबर 2020 को लोकसभा में बताया था कि भारतीय दंड संहिता इस तरह के अपराधों के लिए सजा प्रदान करती है, और इसके लिए अलग कानून लाने की कोई योजना नहीं है। राज्य मंत्री ने डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में यह बात कही। कनिमोझी ने पूछा था कि क्या सरकार पुलिस और सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा हिरासत में व्यक्तियों की यातना को रोकने के लिए एक कानून लाने पर विचार कर रही है, लेकिन इस आदेश से उच्चतम न्यायालय ने थर्ड डिग्री, फोर्थ डिग्री पूछताछ पर केन्द्रीय और प्रादेशिक जांच एजेंसियों की चूड़ी जरूर कस दी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 3, 2020 3:59 am

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